अंक 15, 15 से 31 मार्च 2012 मे विनीता यशस्वी का आलेख ‘जमीन बेचने को वे हजारो पेड़ काट सकते हैं’ दिल के कोने मे कुलबुलाने लगा। इसलिये कि हम न तो ‘पर्यावरण बचाओ’ की मुहिम मे गिने जाते है और न पर्यावरण का अन्धाधुन्ध दोहन मे लगे बिल्डरों और भू माफियाओं के साथ हैं। हमें तो यह लगता है कि दोनों समूह अपने-अपने ढंग से पर्यावरण का दोहन कर रहे हैं। सरकार भी जंगलात से घिरी वनभूमि का सदुपयोग करना चाहती है, जबकि बहुत सी महत्वकांक्षी योजनाओं पर काफी विलम्ब होता है। सरकारी और गैर सरकारी सभी चाहते हैं कि पहाड़ों मे त्वरित विकास के लिये बेरोजगारों के हित में पर्यटन और होटल उद्योग के लिये इन्हीं वनों को काटा जाना चाहिये। धरती की गर्मी बराबर बढ़ रही हे। साहसी और खतरा मोल ले सकने वाले लोग होते तो गर्मी कितनी और कैसे बढ़ रही है, इसका पता लगाने के लिये हिमालय या ठण्डे दक्षिणी उतरी ध्रु्व में अपना झंडा गाड़ दिया जाता। धार्मिक स्थलों और क्रीड़ा एवं पर्यटन को बढ़ावा देने के लिये ऊँचे हिमानी समतलों में भीड़भाड़, होटल, मनोरंजन गृह बनते जा रहे हैं। बुग्याल उजड़ रहे हैं। धार्मिक स्थलों में लोग राजा भागीरथ से भी आगे बढ़ कर हिमानी भूमि को रौंदते जा रहे हैं, जिसके प्रभाव से ग्लेशियरो व बुग्यालों को गर्म धरती सुखाती जा रही है। अब हमारे जैसे लोगों को, जो धरती की गर्मी नहीं सह सकते हैं, अपने बचाव के लिए पंचाचूली, नंदादेवी तथा सारे ही ग्लेशियरों व हिमालयी शिखरों में बसने के लिए मुनस्यारी व धारचूला के परगनाधिकारियों को इच्छुक व्यक्तियों के हित में भूमि आबंटन का कार्य प्रारम्भ कर देना चाहिये। रेत माफिया, जंगल माफिया की करतूतों से जैसा दिखाई पड़ रहा है, आम जनता का जीवन दूभर होता जाएगा। अतएव समझदार लोग व्यापक हित में समय रहते बारह हजार फुट से व्यापक भूमि आबन्टन का कार्य प्रारम्भ कर दें। बोना-तोमिक जैसे स्थानों में केला, आम, पपीता उगाया जा सकेगा।
डॉ. राम सिंह, पिथौरागढ