15-31 मई अंक में प्रकाशित रपट ‘युगमंच का कोर्ट मार्शल’ देखा। आज के समय में जब खबरें, सामाजिक कार्य व
संस्कृति तक बिकाऊ हो चले हैं, किस तरह ‘युगमंच’ को जीवित रखा गया है, यह आप भी जानते हैं। कोई जमाना था जब नैनीताल से निकलकर प्रतिभाओं की राष्ट्रीय स्तर तक चमक किसी से छुपी नहीं है। पुरानी प्रतिभाएँ पलायन करती रहीं, बची हुई दाल-रोटी की फिराक में व्यस्त हो गई। यह देशव्यापी घटना है। हालत ये है कि नैनीताल में तो रिहर्सल या मंचन या खेलने के लिए स्थान मिलना कठिन हो गया है। युगमंच अनेकों कार्यक्रम करता है पर नैनीताल समाचार में उनकी चर्चा नहीं की जाती। आपके कला समीक्षक की रुचि थोड़ा विशिष्ट लगती है। सूचना के अधिकार की आड़ में हम आपसे यह तो जानना ही चाहेंगे कि कला समीक्षक के रूप मे जो कार्यालय प्रतिनिधि हैं, उनकी विशेषज्ञता क्या है।
बेशक प्रस्तुत नाटक में कुछ कमियाँ हो सकती हैं, होती ही हैं। कलाकारों की पूरी नयी टीम है। यह कहना कि अभिनय तो ठीक है पर अन्य सभी पक्ष कमजोर हैं, कुछ जँचा नहीं। युगमंच के अपने मूल कार्य से भटकने पर हम विनम्रतापूर्वक कहना चाहेंगे कि समय की नजाकत के हिसाब से बदलाव जरूरी होता है, अपने उद्देश्यों को पाने के लिए। होली महोत्सव, फिल्म महोत्सव व अन्य कार्यक्रमों से संस्कृति को संवारने व अभिव्यक्ति के नये आयामों का विकास प्रारंभ हुआ है। शायद यह फिल्म महोत्सव का ही दबाव था कि निर्मल पाण्डे व गिर्दा पर प्रमाणिक वृत्त चित्र बन पाये। समीक्षा में ‘युगमंच का कोर्टमार्शल’ तो कर ही दिया गया है, मगर मुकदमे में यदि युगमंच का पक्ष भी जान लिया होता तो शायद न्याय हो सकता था।
विनोद पाण्डे, अरुण रौतेला,नैनीताल
मैं ‘कोर्टमार्शल’ की आलोचना से इत्तेफाक भी रख सकता हूँ। लेकिन उन तीन पंक्तियों पर गहरा एतराज दर्ज करता हूँ जिसमें कहा गया है ‘लगता है कि होली महोत्सव, लोकगीत, लोकनृत्यों व फिल्म समारोहों की ओर बढ़ते रुझान ने इस संस्था के मूल कार्य को भटका दिया है।’ शायद आपके कार्यालय प्रतिनिधि भी जानते होंगे कि सत्तर के दशक में जब लेनिन पंत, के.पी.शाह, तारा दत्त सती, मोहन उप्रेती, गिर्दा ओर शेखर पाठक सरीखे सुचिंतित नागरिकों ने युगमंच की नींव रखी तो उनके दिमाग में पहाड़ की अपनी थाती को संजोना-सँवारना भी था। आपके प्रतिनिधि ने जिस चलताऊ तरीके से होली महोत्सव पर टिप्पणी की है उससे उनके अज्ञान पर हँसी आती है। बैठी होली की छोड़ भी दें तो खड़ी होली तो एक तरह नाट्य रूप ही है। खुद युगमंच को अपने जिस नाटक से सबसे ज्यादा शोहरत मिली, यानी ‘नाटक जारी है’, उसमें कुमाउंनी होली के ठेठर स्वांग का भरपूर कलात्मक इस्तेमाल हुआ है।
एक आखिरी बात जो युगमंच और जन संस्कृति मंच द्वारा शुरू किये प्रतिरोध सिनेमा फिल्म समारोह के प्रयोग की है। हम सभी जानते हैं कि हजारों साल की सभ्यता के इतिहास में सिनेमा सिर्फ 116 साल पुराना कला माध्यम है और यह गौरतलब है कि सिनेमा बहुत गहरे अर्थों में थियेटर से जुड़ा है। अगर थियेटर करने वाले सिर्फ थियेटर करते तो विश्व सिनेमा को स्वीडेन के महान नाटककार और फिल्मकार इंगमार बर्गमैन की कालजयी कृतियों से महरूम हो जाना पड़ता। या फिर ऋत्विक घटक की सारी फिल्मों की नाटकीयता को क्या आप सिर्फ इसलिये नहीं पसंद करेंगे कि वे प्रोसेनियम पर न होकर परदे पर उतर रही हैं ?
संजय जोशी,ई मेल से
1-14 मई के अंक में प्रकाशित अरुण कुकसाल का लेख ‘उनके परिवार को लेकर यह चुप्पी क्यों’ पढ़ा। इतने महीने बीतने के बाद भी गिरदा अनेकानेक लोगों की स्मृति में हैं, यह सुखद अनुभव है। वरना आज के समय में अच्छे-बुरे लोगों और घटनाओं को हम कहाँ याद रख पाते हैं ? उनके जाने के बाद से जितने भी संस्मरण छपे, वे सभी बहुत भावुकतापूर्ण लगे।
मेरे विचार से गिरदा को इतना याद करने के पीछे महत्वपूर्ण कारण उनका महान जन कवि और लोक गायक होने के साथ-साथ उनका आत्मीयता से भरा व्यक्तित्व और निष्कपट मन भी है। अक्सर हमारी कलम या भाषणों का हमारे हृदय के साथ तालमेल नहीं दिखाई पड़ता, क्योंकि निजी लाभ-हानि का जोड़-गणित-गुणा-भाग सच्चाई पर हावी रहता है। सार्वजनिक जीवन व आचरण में सुर व ताल अवसर के अनुसार बदल जाते हैं। लेकिन गिरदा हमेशा अपने मन की बात सुनते और कहते थे और आम लोगों की पीड़ा व आकांक्षाओं को अपनी कविताओं तथा गीतों में ऐसे प्रकट करते थे कि सुनने वालों पर गंभीर असर पड़े बिना न रहता। शायद यही कारण था कि तमाम अवगुणों के होते हुए भी गिरदा के प्रति लोगों का इतना स्नेह और आदर रहा।
मुझे भी चन्द्रशेखर तिवारी जी ने पहली बार गिरदा से मिलाया था। अल्मोड़ा की थाना बाजार में भेंट होते ही गिरदा बोले- ’’ओ चना, के खाँछै ? जलेबि ?’’ जलेबी खाने के बाद सालों बाद तक हम अक्सर गिर्दा बन कर यह डायलॉग दुहराया करते। जब उनके देहान्त का समाचार मिला, तब मैंने तिवारी जी से फोन पर सबसे पहले यही कहा कि चना, अब वो जलेबी कहाँ खाने को मिलेंगी!
कमल जोशी, अल्मोड़ा
बटरोही जी द्वारा लिखा गया पत्र ‘स्वस्ती श्री’ कालम में देखा। जहाँ तक शैलेश मटियानी की प्रतिभा को भुलाने का सवाल है, उनका साहित्य एक गंभीर शोध का साहित्य है। उनके पात्र समाज के सर्वहारा तथा सबसे निचले पायदान के लोग हैं। उनके साहित्य सृजन में सत्य का समावेश है। जो उन्होंने जीवन में भोगा, उसको समाज के दबे कुचले वर्ग में से पात्र चुनकर लिपिबद्ध किया। लोग उन्हें प्रेमचन्द के बाद का साहित्यकार मानने लगे हैं। उन्होंने साहित्यकारों की गिरोहबंदी का हमेशा विरोध किया। भारत के सर्वोच्च न्यायालय तक अपनी सत्य बात को रखने के लिये निर्भीकता के साथ अकेले डटे रहे। उनके साहित्य को सुधी पाठक पढ़ते हैं। मुझ जैसे साहित्य को कम समझने वाले व्यक्ति ने उनकी रचनायें ‘मुठभेड़’, ‘किसके राम, कैसे राम’, ‘राष्ट्रभाषा का सवाल’ तथा ‘विकल्प’ में छपने वाले कई लेख पढ़े। मैं भाग्यशाली रहा कि घंटों राष्ट्रीय सवालों पर उनसे चर्चा करने का मौका मिला। उनका पक्का सोच था कि साहित्य राजनीति की जननी है। दोनों का मूलाधार पर गहरा संबंध बना रहता है।
दान सिंह रावल ,लखनऊ