‘‘सुनो-सुनो। सभी राज्यवासियों को सूचना दी जाती है कि राज्य में बाघों की संख्या बढ़ाये जाने का विधेयक पास हो गया है। बाघों को मारने पर पाबंदी लगा दी गई है। इसलिए जो भी बाघों पर अत्याचार करेगा या फिर ‘इंक्वायरी टीम’ जिसके खिलाफ भी सबूत पेश करेगी, उसके खिलाफ कार्यवाही की जायेगी। बाघ हमारा राष्ट्रीय पशु है। इसको मारने पर राज्य की छवि पर प्रभाव पड़ सकता है। अतः जनता को सूचना दी जाती है कि बाघों को उचित मान-सम्मान दें। सुनो-सुनो-सुनो….।’’
आखिर बाघ मारने पर आदमी को सजा देना कितना जायज है। कभी बाघ आदमी को मार देता है और कभी आदमी बाघ को। ये सिलसिला सदियों से चला आ रहा है। ऐसा पहली बार हुआ है कि बाघ को मारने की बहादुरी पर पुरस्कार नहीं, सजा मिली है। बाघों की घटती हुई संख्या और आदमी की बढ़ती हुई जनसंख्या के बीच कुछ लोग बाघों को बचाने में लगे हैं और कुछ लोग घर बचाने में।
बाघ और बाघ को मारने वाले तीन हजार फिट से लेकर बारह हजार फिट तक पाये जाते हैं। बाघों को बचाने वाले एसेम्बली, संरक्षण समितियों, आन्दोलन, महकमों, जलूसों और हर उस जगह पाये जाते हैं, जहाँ बाघ ने दहशत नहीं फैला रखी हो। वहाँ न तो किसी के घर में बाघ घुसता है और न बच्चों व जानवरों की सुरक्षा में जाग-जाग कर रात बितानी पड़ती है। वहाँ सिर्फ ‘पोस्टमार्टम’ की रिपोर्ट और मुआवजे की रकम तय की जाती है। कई बाघ परिवार इससे लाभान्वित हुए हैं। हाँ, ये अलग बात है कि कभी-कभार आदमी का मुआवजा भी दे दिया जाता है।
आजकल आदमी को इतनी फुरसत कहाँ है कि बाघ का शिकार करने के लिए जंगलों की खाक छाने। हाँ बाघ जरूर गाँवों में घुस आता है। जानवर को आदमखोर कहने से पहले पूरी तहकीकात करना जरूरी है। अगर धोखे से कोई दूसरा बाघ मारा जाता है तो उसे ‘पोस्टमार्टम रिपोर्ट’ के आधार पर आदमखोर साबित किया जा सकता है। लेकिन यह सुविधा केवल सरकारी महकमों के लिए है। आदमी बाघ की खाल, नाखून और दाँत निकाल कर बाकी ‘पोस्टमार्टम’ के लिए छोड़ जाता है तो बाघ आदमी को आधा खाकर, आधा ‘पोस्टमार्टम’ के लिए छोड़ जाता है।
एक निरीह बाघिन जिसके पेट में बच्चे थे, पता नहीं क्यों एक किसान के घर में घुस आई। इसकी कीमत उसे अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। गर्भवती थी, शायद ‘फास्ट फूड’ खाने का मन कर गया हो या फिर उन दिनों ‘वर्ल्ड कप’ हो रहा था, हो सकता है कि स्कोर पूछने आई हो। चाहे वह किसी भी कारण आई हो, उसे मारा क्यों ? उसे तो भारत सरकार की ‘जच्चा-बच्चा सुरक्षा योजना’ में अस्पताल ले जाना चाहिए था। सुरक्षित प्रसव करवा कर ईनाम पाना चाहिए था। लेकिन आदमी की क्रूरता तो देखिये उसे मार डाला। इससे बड़ा महापाप कुछ नहीं हो सकता। इसके अपराधी को प्रायश्चित के लिए हरिद्वार नहीं जेल भेजा जाना चाहिए।
जानवर को जंगली या आदमखोर कहने से पूर्व हमें अपने समाज में भी एक नजर डाल लेनी चाहिए। बाघिन के मरने से कुछ दिन पहले एक गर्भवती औरत को पीट-पीट कर मार डाला। एक दूसरी गर्भवती को घर से निकाल दिया। जानवर में सबसे बड़़ी खूबी यह है कि वह ‘बेजुबान’ है, जबकि आदमी बहस के अलावा मुकदमे भी कर सकता है। आखिर हिरनों ने तो कभी बाघ के खिलाफ कहीं कोई याचिका दर्ज नहीं कराई है। आदमी को इस बात से सबक लेना चाहिए। इसीलिए कुछ लोग ‘बेजुबानों’ की जुबान सीख गये हैं, गुपचुप बाघों से समझौते करते हैं और बाघों का पता बताने वाली ‘लोमंड़ियों” को तरह-तरह के रंगों का ‘डिस्काउंट ऑफर’ देते हैं। कुछ लोग तो इससे भी आगे निकल गये हैं। उन्होंने बाघों की ‘वोटर आईडी’ बनवाकर उन्हें मतदाता सूची में डाल दिया है। मतदान के दिन वह हर आठ-दस लोगों के पीछे एक बाघ लाईन में खड़ा कर देते हैं। ऐसे ही लोग बाघों को संरक्षण देकर कई ‘सरकारी योजनाओं’ का लाभ उठाते हैं ।
बाघ समुदाय अपने बच्चों के अलावा कुछ नहीं पालता है। जबकि आदमी जानवरों के साथ-साथ गलतफहमी भी पालता है। अभी कुछ साल पहले साठ बरस की रमोती देवी ने बाघ का जमकर सामना किया और अन्त में दराँती से बाघ का गला रेत दिया। दूसरी घटना में स्कूल जाते बच्चों ने बाघ का हमला नाकाम कर दिया और उसे घेर कर मार डाला। मीडिया ने बढ़ा चढ़ा कर बहादुरी का पुरस्कार दिलवा दिया। इसी गलतफहमी में पड़कर एक परिवार ने अपने आगन में आई बाघिन को मार डाला। इस बार बाघिन का पोस्टमार्टम किया गया तो वह गर्भवती पाई गयी। सो पुरस्कार के बदले उस परिवार के वारंट निकाल दिये गये। ईनाम के लालच में वन विभाग और पुलिस की टुकडि़याँ उनकी तलाश में जुट गई। उस परिवार को लेने के देने पड़ गये! मुखिया की तलाश में औरतों और बच्चों को हिरासत में ले लिया गया। अब वो परिवार ऐसे शख्स की तलाश में जुटा है जो ‘पोस्टमार्टम रिपोर्ट’ को गलत साबित कर दे। बाकी मुर्दे की ओर से गारंटी है कि वह कुछ भी नहीं कहेगा। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ी भूमिका ‘पोस्टमार्टम’ की है। पहला सवाल ये है कि पहले मारे गये दोनों बाघों का ‘पोस्टमार्टम’ क्यों नहीं करवाया गया। इसके जवाब में तीसरे का ‘पोस्टमार्टम’ करवा दिया गया और बहादुरी पुरस्कार को ‘काल कोठरी’ में देने का फैसला किया गया।
अब सुन्दरखाल को ही ले लो। बाघों ने वहाँ आदमी की सत्ता को चुनौती दे रखी है। बड़ी बात है बाघों का आदमी द्वारा मारा जाना। वहाँ के लोगों के सामने यह पेशकश भी रखी गयी कि उन्हें दूसरे स्थान पर बसाया जाये और उपजाऊ इलाका बाघों को सौंप दिया जाय। आदमी तो बीहड़ को भी रहने लायक बना सकता है, लेकिन बाघ तो अपना इलाका बदलते रहते हैं। उन्हें आरक्षण देकर संरक्षित किया जाये। एक बार जब जंगली हाथियों ने आतंक मचाया था तो राज्य बनने के बाद एक वन मंत्री ने कह भी दिया था कि हाथियों को एक ‘बाड़े’ में बंद कर दिया जाये। लेकिन आदमी जिद्दी है। वहाँ से कहीं और जाने को तैयार ही नहीं होता है। कहता है कि मेरे बाप-दादाओं ने पीढि़यों संघर्ष करके इस जगह को रहने लायक बनाया है। आदमी मूर्ख है, नादान है। जिद में आकर सड़क में जाम लगा देता है। अब उसे कौन समझाये कि सड़क में जाम लगाने से क्या बाघ के हमले भी रुक जायेंगे। लेकिन तब बड़ा आश्चर्य होता है जब जाम लगाने के कुछ दिन बाद तक बाघ के हमले वाकई रुक जाते हैं।
अभी कुछ समय पहले की बात है। बाघ जैसे लोगों ने एक साँभर को मार गिराया। एक याचक भी लोमड़ी की तरह दुम हिलाता हुआ वहाँ जा पहुँचा। लिहाजा उसे भी एक-आध किलो ‘शिकार’ दे दिया गया। थोड़ी देर बाद वन विभाग वाले उसके घर आ धमके और अधपके मांस का ‘पोस्टमार्टम’ करवा कर उसे हिरासत में ले लिया गया। कानून सब के लिये वाकई बराबर है। जैसे आदमखोर एक बाघ होता है, पकड़ा कोई दूसरा जाता है। गोली किसी तीसरे को मारी जाती है। वैसे ही आदमी का मामला भी होता है। करता कोई है, भरता कोई और, और फँसता कोई है आखिर एक साँभर मारा गया था और किसी न किसी को तो सजा होनी ही थी। कानून भी तो कोई चीज है और उसका सम्मान करना हर नागरिक का कर्तव्य है।
मैं इस तरह की घटनाओं से बहुत डरा हुआ रहता हूँ। न तो मैं आदमी बचाने के पक्ष में हूँ और न बाघ। मैं तो खुद झंझटों से बचना चाहता हूँ। जब ‘बाघ बचाओ रैली’ निकलती है तो मैं उसमें चला जाता हूँ और जब ‘आदमी बचाओ रैली’ निकलेगी तो मैं उस में भी चला जाऊँगा। आजकल बाघिन को मारने की वजह से जगह-जगह छापे पड़ रहे हैं। आदमी की हत्या का फैसला होने में भले ही सालों लग जायें, पर जानवर के मामले में हर कोई जज बनकर फैसला सुनाने लगता है। जगह-जगह चर्चाएँ होने लगती हैं कि जिसके खिलाफ भी शक हो उसे हिरासत में लिया जा सकता है। किसी भी समय रेड पड़ सकती है। पहले सिर्फ बाघ का डर था, अब पुलिस और वन विभाग वालों ने भी बाघ की खाल ओढ़ ली है। कब कौन आ धमके, नतीजा एक ही होना है। मेरी बीबी एक दिन कोई चीज छुपाते हुए बोली, ‘‘इसे यहीं रहने देना, बाहर मत निकालना।’’ मैंने पूछा-‘‘इसमें क्या है ?’’ वो बोली-‘‘इसमें शिवजी की फोटो है। जिसमें उन्होंने बाघ की खाल लपेटी है। कहीं इंक्वायरी हो गई तो… किसी ने पूछ लिया इसके पंजे और दुम कहाँ हैं तो… तुम तो जानते हो हमसे पूरा पड़ोस जलता है। किसी ने अगर ये कह दिया, शिवजी अक्सर इनके घर आते-जाते रहते हैं तो….इसे यहाँ से बाहर मत निकालना। हाँ, तस्वीर हटाने से वहाँ जो खाली जगह बन गई है, उसे भरने के लिए ‘बराक ओबामा’ का बड़ा वाला पोस्टर ले आना।’’