अंग्रेज सरकार ने उदारतापूर्वक मिशनरियों को जमीनें दी थीं और उन्होंने शिक्षा के विकास और समाज सेवा के रूप में उनका अच्छा उपयोग भी किया। पर हाल के वर्षो में अल्मोड़ा से लेकर पौड़ी तक में जिस तरह उनके चर्च द्वारा जमीनें बेचे जाने का प्रयास हो रहा है, उससे विवाद उठ रहे हैं। पिथौरागढ़ में ही दो वर्ष पूर्व भाटकोट में जो जमीनें बेची गईं, उसका ईसाई समाज ने बड़ा विरोध किया। आरोप है कि कब्रगाह तक बेच दिये गये। इसे लेकर आंदोलन हुए और हमेशा की तरह आन्दोलनकारियों को ही जेल में ठूँस दिया गया। वह जमीन किसी सेठ को बेच दी गयी और उसने बाकायदा प्लॉट बनाकर पिथौरागढ़ के असरदार लोगों को बेचे।
उसके बाद जंगलों से भरे पड़े चंडाक क्षेत्र में स्थित लैपरोसी मिशन की बारी आयी। यह सुंदर सोने के भाव वाली जगह थी और माफिया इसके लिये ललचाने लगे। राज्य बनने के बाद पहाड़ी नेताओं में जमीन हड़पने का धंधा आम हो गया है।
लैपरोसी मिशन अल्मोड़ा में 1835 और पिथौरागढ़ में 1882 में स्थापित हुआ। अमेरिका के ओहियो प्रान्त से 1891 में पिथौरागढ़ आयीं मेरी रीड ने दान में प्राप्त इस जमीन में लैपरोसी मिशन स्थापित किया। उनका देहांत 1943 में हो गया। रोगियों की सेवा के अतिरिक्त उन्होंने इस क्षेत्र में जंगल विकसित किया। उस समय वहाँ पानी नहीं था। वे दो किलोमीटर दूर से पानी लाती थीं और केतली से बूँद-बूँद इन पौंधों की जड़ों में डालती थीं। आज विभिन्न प्रजातियों के पेड़ इस सात हजार फीट ऊँचे स्थल को आध्यामिक अनुभूति प्रदान करते हैं। यहाँ देवदार, चीड़, बाँज, काफल, बुराँश, खड़ीक, तुन, आडू, सन्तरा, खुमानी, नासपाती, माल्टा, नीबू, प्लम, खुमानी आदि प्रजातियों के कुल 3473 पेड़ हैं। इसके अतिरिक्त हजारों पेड़ बेनाप जमीन में हैं।
लैपरौसी मिशन अब बंद हो गया है, मगर अस्पताल की बिल्डिंगें अभी मौजूद हैं। जमीनों की खरीद-फरोख्त के मामले में मिशन हमेशा विवाद में रहा। पहिले जनता की माँग रही कि यहाँ बेस अस्पताल बनाया जाये। इस माँग को सुना नहीं गया। बाद में इसकी कुछ जमीन में विद्युत ग्रिड बनाया गया। यह मामला भी विवादास्पद रहा। पी.डब्ल्यू.डी. पिथौरागढ़ ने इस पर आपत्ति भी की थी।
शहर के जागरूक वर्ग की मंशा है कि सरकार इस जमीन को हस्तगत कर यहाँ मेरी रीड के नाम पर एक बॉटेनिकल गार्डन, जड़ी-बूटी या योग केन्द्र खोल दे। यह ईकोटूरिज्म का भी आदर्श स्थल बन सकता है, अगर सरकार बड़े-बड़े हॉर्टीकल्चर फार्मों को बेचने की कहानी यहाँ न दुहराये।
मगर जनता डरी हुई है कि यह सुंदर स्थल कहीं किसी की व्यक्तिगत सम्पत्ति न बन जाये। एक साल से कानाफूसी चल रही है कि इस पर माफियाओं की टेढ़ी नजरें गढ़ चुकी हैं। सौदेबाजी चल गयी है। कुछ जागरूक लोगों ने पहल करते हुए तमाम पर्यावरणविदों, सम्बन्धित विभागों और शासन-प्रशासन को पत्र लिखे। छिटपुट आंदोलन भी हुआ। परिणाम यह हुआ कि प्रशासन ने फैसला यह सुना दिया कि मिशन इस जमीन को नहीं बेच सकता, क्योकि जिस उद्देश्य से यह जमीन दी गई थी, वह उद्देश्य ही समाप्त हो गया अब यह सरकार की हो गयी। यह निर्णय पिथौरागढ़ के एस.डी. एम. सदर का था जो तहसीलदार की जाँच के बाद दिया गया था कि वर्ष 1996-97 से यहाँ किसी भी पीड़ित का उपचार नहीं हो रहा है, संस्था अपने उद्देश्य में असफल रही है, कृषि के लिए दी गयी जमीन में खेती भी नहीं की जा रही है इसलिए जमींदारी विनाश एवं गैर जमींदारी विनाश की कुल 1055 नाली 03 मुट्ठी भूमि जिसमें 3473 वृक्ष हैं, को राज्य सरकार के अधीन किया जाय। साथ ही इसे भारतीय वन अधिनियम 1927 की धारा -03 एवं -4 के अर्न्तगत आरक्षित वन घोषित की जाने की संस्तुति की जाती है।
यह आदेश एक तरह से जनता की जीत है। मगर ऐसा कहा जा रहा है कि इस बेशकीमती जमीन को हड़पने को बैठे सत्ताधारी पक्ष के नेताओं को एस.डी.एम. का यह आदेश नागवारा गुजरा। वे लोग मौके की ताक में थे और जिस दिन नाचनी के पास बादल फटने का हादसा हुआ उस दिन मुख्यमंत्री के गुस्से का बादल एस.डी.एम सदर पर गिरा और उन्हें प्रोटोकॉल का पालन न करने के आरोप में सस्पेंड कर दिया गया।
मिशन वाले भी इस निर्णय से संतुष्ट नही हैं। वे कहते हैं कि यह फैसला एकतरफा है। हमारा पक्ष नहीं सुना गया। सुना है कि वे इस निर्णय के विरुद्ध हाइकोर्ट में गये हैं। यद्यपि यह न आदेश है और न फैसला। यह तो एक सामान्य जाँच रिपोर्ट है जिसके कारण मिशन इसे बेच नहीं पा रहा है। कुछ कानूनविद यह भी कहते हैं कि इसमें प्रशासन की भी ढील रही। जब 1996 से मिशन का कार्य खत्म हो गया था तो उसने क्यों नहीं इस पर लीवी सीलिंग एक्ट लगा कर कर वसूल नहीं किया।
वर्तमान में इस जमीन का मूल्य अरबों रुपयों मे जायेगा। ऐसा भी कहा जाता है कि कभी अभिनेता राजबब्बर इस क्षेत्र को देख कर इतने मुग्ध हुए थे कि उन्होंने इसे खरीदने का प्रयास किया था। अब कानूनी पक्ष क्या है, यह तो लम्बी बहस का मामला है, पर जिस तरह से राजनीति में माफिया घुस आये हैं, अभी चंडाक की स्थिति फिलहाल सुरक्षित नहीं कहा जा सकती। जो भी हो, पिथौरागढ़ की जनता ने विरोध कर के कुछ समय के लिये माफियाओं के इरादे ढीले कर दिये हैं। अल्मोड़ा और नैनीताल में भी मिशन की जमीनों की खरीद-फरोख्त के खिलाफ आवाज उठायी जा रही है।


























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