माटू जन संगठन ने भारी वर्षा के बाद टिहरी बांध क्षेत्र में पैदा हुए गंभीर संकट के लिए टिहरी जल विद्युत निगम (टी.एच.डीसी. ) और उत्तराखंड सरकार को दोषी ठहराया है। भागीरथी और भिलंगना के संगम पर बने इस बाँध से आसपास रहने वाले लोगों पर गंभीर संकट मँडरा रहा है। ‘माटू’ ने एक वक्तव्य जारी कर माँग की है कि बाँध के जलाशय से लगातार पानी की निकासी कर जल स्तर को 820 मीटर से कम पर लाया जाए। जलाशय के समीप रहने वाले ग्रामीणों को राहत देने और उनके पुनर्वास का काम तुरन्त किया जाए और पुलों, सम्पर्क सड़कों के निर्माण, नागरिक सुविधाएँ प्रदान करने और नई टिहरी में रहने वाले पुनर्वासित लोगों की समस्याओं का तुरंत समाधान किया जाए। सभी बेदखल हुए लोगों को तुरंत भूमि दी जाए। टी.एच.डी.सी. को दंडित किया जाए और भविष्य में उसे कोई और बाँध बनाने की अनुमति न दी जाए।
बाँध के पास 820 मीटर से 840 मीटर के बीच पिलकी, घोटी, पलापू, सोधू, स्याँसू, बधान, हदियादी और छाम गाँवों के कई परिवार ऐसे हैं, जिनका न पुनर्वास किया गया है और न वे स्वयं कहीं और जा कर बसने की सामर्थ्य रखते हैं। राज्य सरकार ने भी इन परिवारों को सुरक्षित स्थानों में पहुँचाने के अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह नहीं किया है। बाँध के जलाशय का स्तर 820 मीटर पार करने के बाद इन गाँवों और यहाँ के निवासियों के सामने डूब क्षेत्र में आने का खतरा बढ़ गया है। इनमें से कुछ पहले ही भूस्खलन के खतरे का सामना कर रहे हैं। अब इन कमजोर पड़ चुके पहाड़ों में भारी वर्षा के बाद भूस्खलन की आशंका बढ़ गई है। भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण ने सन् 2002 में एक अध्ययन के बाद चेतावनी दी थी कि इस इलाके में जल स्तर बढ़ने से ढलानों पर दबाव और अस्थिरता में वृद्धि हो सकती है। छाम गाँव के निवासियों को जल स्तर 820 मीटर से अधिक हो जाने पर घरों को छोड़ कर भागना पड़ा। चिन्यालीसौड़ के निवासी निरन्तर आतंक के साये में जी रहे हैं। टी.एच.डी.सी. लोगों के मकान भरभरा कर पानी में समा जाने जैसी दुर्घटनाओं की परवाह नहीं करती। उसने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में अपने एक हलफनामे में बयान दिया है कि भूस्खलन हो जाने के बाद ही वह भूस्खलन की समस्या से निबटेगा। केन्द्रीय जल आयोग का निर्देश है कि 48 घंटों के भीतर जल स्तर में 1.3 मीटर से अधिक की वृद्धि नहीं होनी चाहिए। परन्तु टी.एच.डी.सी. ने लगातार बेशर्मी से इस कानून का उल्लंघन किया।
समस्या की जड़ यह है कि टी.एच.डी.सी. ने कोई आपात तैयारी नहीं की। उसे ज्यादा वर्षा होने की संभावना को ध्यान में रखना चाहिए था। जलाशय में पानी बढ़ जाने के बावजूद टी.एच.डी.सी. ने 900 क्यूबिक मीटर प्रति सेकिंड से ज्यादा पानी क्यों नहीं छोड़ा ? टी. एच.डी.सी. का दावा है कि वह पानी के बहाव क्षेत्र में जान माल की सुरक्षा के लिए ज्यादा पानी नहीं छोड़ रही है, परन्तु सच्चाई यह है कि उसे नीचे कोटेश्वर बाँध स्थल में अपनी संपदा के बह जाने का डर था। टी.एच.डी.सी. ने कोटेश्वर बाँध में अभी तक जल निकासी के लिए केवल एक ही सुरंग का निर्माण किया है। इस सुरंग की क्षमता भी केवल 1180 क्यूबिक मीटर प्रति सेकिंड की है। कोटेश्वर में निर्माण कार्य में विलंब और ज्यादा निकासी सुरंग न बनाने के लिए टी.एच.डी.सी. ही जिम्मेदार है। उसकी अदूरदर्शिता की कीमत टिहरी बाँध के पास रहने वाले लोग उठा रहे हैं। वैसे भी हरिद्वार और ऋषिकेश में गंगा में जल प्रवाह में वृद्धि अलकनंदा और इसकी सहायक नदियों के कारण है न कि भागीरथी के कारण।
राज्य सरकार से अनुमति न मिलने के बाद टी.एच.डी.सी. ने गलत जानकारियाँ देते हुए 27 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट से जलाशय में 820 मीटर से अधिक पानी भरने की अनुमति मागी। जबकि होना यह चाहिए था कि मानसून से छः महीने पहले टिहरी बाँध इलाके के खतरे वाले गांवों के पुनर्वास का काम पूरा करने के बाद इस प्रकार की छूट माँगी जाती। टी.एच.डी.सी. ने 14 सितम्बर को ज्यादा वर्षा के कारण जलाशय के स्तर में कभी अचानक वृद्धि की चेतावनी जारी कर लोगों के बीच भय व आतंक फैलाने की चाल चली और पुनर्वास के प्रबंध के बिना ही लोगों को इलाके से भागने या जल प्रलय का सामना करने का डर दिखाया। राज्य सरकार ने भी इन लोगों के पुनर्वास के लिए कदम न उठा कर अपने दायित्व की अनदेखी की।