लम्बे समय के बाद नैनीताल समाचार और राजहंस प्रेस में एक साथ दो दिन के लिये ताला लगा होगा। मौका था हमारे सहकर्मी सुनील रौतेला की शादी का। हालाँकि अंतिम समय तक भी यह असमंजस बना रहा कि किस तरह उसके गाँव रौतेलाजाख जाया जाये। अन्ततः मैं, देउपा जी, खिमदा और अन्वित संपादक जी के साथ गये और जोशी जी प्रेसकर्मियों के साथ अल्मोड़ा के रास्ते शंभू राणा को अपने साथ लेकर पहुँचे।
हम लोग धानाचूली बैंड से होकर गये। मौसम काफी अच्छा था। इस रास्ते से लमगड़ा जाने में हिमालय की बहुत ही लंबी श्रृंखला अपनी भव्यता के साथ निरन्तर आपके पास रहती है। मोटर सड़क के किनारे बाहर से आकर लोगों ने बड़ी-बड़ी इमारतें भी बना दी हैं। दुबरोली पहुँचने से पहले हमें 5-6 किमी. कच्ची सड़क पर जाना पड़ा। उसके आगे का सफर पैदल तय करना था। खिमदा का आग्रह था कि पहले उनके घर चल कर थोड़ा सुस्ता लें। मालूम पड़ा कि उन्होंने पहले से ही हम सब के लिये भोजन बनवा रखा था। खाने की इच्छा तो नहीं थी, पर जब घर के कुटे लाल चावल और लोबिया की दाल हमारी नजरों के सामने आये तो सबके मुँह में पानी आ गया। मैंने और अन्वित ने तो ऐसे लाल चावल जिन्दगी में पहली बार देखे थे। और स्वाद तो एकदम निराला! गाँव के हवा-पानी का भी असर होता होगा।
फिर करीब तीनेक किमी. का पैदल सफर तय करके रौतेला जाख पहुँचे। शादी का माहौल……बैंड की जगह छोलिया नर्तक थे और साथ में दो मशकबीन बजाने वाले। बारात पास के ही एक गाँव, फटक्वाल डुँगरा, को जानी थी, अतः इत्मीनान से निकली। फटक्वाल डुँगरा एकदम सामने की धार पर दिखाई दे रहा था। हमसे कहा गया कि ज्यादा नहीं चलना है, सो हम लोग बेफिक्र हो गये। थोड़ा ही आगे बढ़े थे कि संपादक जी ने एक घर की तरफ इशारा करते हुए शंभू जी से कहा, ‘‘देखो, यहाँ मयखाना खुला है। बहुत से लोग हाथ में नोट लेकर भीतर जा रहे हैं और थोड़ी देर बाद होंठ पोंछते वापस आ रहे हैं।’’ गाँवों में शराब का जो मर्ज फैला है, उसका खालिस नमूना हमारी नजरों के सामने था। बड़े-बूढ़े तो एक तरफ, बच्चों को वहाँ जाने में कोई शर्म नहीं थी। बारात थोड़ा ही आगे पहुँची होगी, मगर बहुत से बाराती टिल्ल हो चुके थे।
आधा किमी. चलने के बाद ही एक तीखी ढलान शुरू हो गयी। चलना थोड़ा मुश्किल था और अपनी जन्मजात कमजोरी की वजह से शंभू राणा जी को तो बहुत ही ज्यादा परेशानी हो रही थी। जैसे-तैसे ढलान से निपटे तो एक सीधी चढ़ाई सामने हमारा इन्तजार कर रही थी। सुनील ने शंभू जी से कहा भी कि वे घोड़े पर चलें, वह पैदल चल लेगा। पर शंभू जी ने अपने विशिष्ट अंदाज में मना कर दिया, यह कह कर कि ‘‘लड़की वाले कहेंगे कि दिखाया किसे था और ले किसे आये।’’ खैर चलते-सुस्ताते हम लोग आगे बढ़ते रहे। इस चढ़ाई पर कोई निश्चित रास्ता नहीं रहा। जिसे जहाँ से सुविधाजनक लगा, वह उस रास्ते से चढ़ रहा था। बारात पूरी तरह बिखर चुकी थी। हमारे साथ चल रहे एक ग्रामीण ने बताया कि यहाँ सड़क न होने के कारण हमें बहुत परेशानी झेलनी पड़ती है। सबसे ज्यादा परेशानी तो उस वक्त होती है, जब कोई बीमार हो जाता है। नजदीक कोई अस्पताल भी नहीं है। उस समय तो ऐसा लगता है, जैसे मरीज के वास्ते मुर्दाघाट नजदीक है।
शाम 7 बजे बारात उस पहाड़ी की चोटी पर पहुँच गयी। बिखरे हुए सभी बाराती वहाँ पर इकट्ठा हुए और छिटपुट आतिशबाजी कर आगे बढ़े। थकान से मेरा तो बुरा हाल था। उस समय तो यही लग रहा था कि अगर पहले पता होता कि इतना खराब रास्ता होगा, तो आते ही नहीं। मगर यह भी पता चला कि पहाड़ों में लोग कितनी कठिनाइयों में रहते हैं। जनसंख्या के आधार पर परिसीमन की वकालत करने वाले तिलकराज बेहड़ जैसे लोगों को कुछ दिनों के लिये यहाँ भेज देना चाहिये।
अब तक अंधेरा गहराने लगा था और रास्ते का कुछ पता नहीं चल रहा था। सब अपने-अपने टॉर्च जला कर, अगले व्यक्ति की एड़ियों पर नजर टिकाये आगे बढ़ रहे थे। कुछ लोगों को छोड़कर ज्यादातर लोग नशे में डूबे हुए थे और जिस भाषा का इस्तेमाल कर रहे थे, उसे सुनकर शर्म ही महसूस की जा सकती थी। बिजली के एक खम्भे पर हमें कुछ रोशनी सी दिखाई दी। पूछने पर पता चला कि बिजली तो इस गाँव में है, पर नाममात्र को। रात को लैम्प ही जलाने पड़ते हैं। यहाँ तो हर चीज का हाल ऐसा ही है। हमारी फिक्र किसी को नहीं है। हमें क्या पता था कि उत्तराखंड राज्य बन जाने के बाद भी हम लोगों के साथ ऐसा ही व्यवहार होगा।
बातें करते-करते हम लोग एक घर में पहुँचे। एकबारगी लगा कि मंजिल पर पहुँच गये हैं, लेकिन तभी किसी ने कहा यहाँ पर तो बारात को सिर्फ चाय-पानी के लिये ही रुकना है। अंधेरे में सब कुछ अस्पष्ट था, उस पर से धक्का-मुक्की ने और मुश्किल की थी। युवकों को बुजुर्ग बार-बार चेता रहे थे कि आतिशबाजी सावधानी से करें। ऐसा न हो कि पेड़ों पर बने घास के किसी लूटे पर आग लग जाये। ![]()
खैर गिरते-पड़ते आखिरकार हम लोग लड़की वालों के घर तक पहुँच ही गये। वहाँ भी दिखाने के लिये बिजली तो थी, पर सारे काम पेट्रोमेक्स की रोशनी में हो रहे थे। कुछ देर हम लोग वहीं खड़े-खड़े धूलिअर्घ्य का अनुष्ठान देखते रहे। फिर कल्याण दा आग्रह कर हमें उस घर में ले गये, जहाँ हमारे रहने की व्यवस्था की गई थी। गाँवों में आज भी जिन्दा अतिथि-सत्कार की परम्परा के चलते उस परिवार ने हमारे लिये अपने घर का एक पूरा हिस्सा ही रख छोड़ा था और बिस्तर आदि का भी इंतजाम किया था। वे जिद कर रहे थे कि हमारे लिये खाना वहीं पर आ जायेगा। शंभू जी की पाँव की तकलीफ देख कर मैं और जोशी जी शंभू जी के साथ रुक गये। मगर बाकी लोग पंगत पर ही खाने के लिये गये।
खाते समय जोशी जी ने द्यूली गाँव के बारे में बताया। वे दिन में कुछ देर के लिये वहाँ गये थे। द्यूली की कुल जनसंख्या 450 है, जिसमें 300 मतदाता हैं। गाँव में समस्याओं के सिवा कुछ नहीं है। पानी के नल तो हैं पर पानी नहीं है। बिजली की लाइनें हैं, पर बिजली नहीं है। 1985-86 में विद्युत कनेक्शन मिले और 10-12 साल तक बिजली जलाई। पर उससे काम कुछ होता नहीं था और बिल 10-12 हजार रुपयों तक के आ जाते थे। कई बार विभाग से शिकायत की पर कुछ नहीं हुआ। अन्ततः बिजली कटवानी पड़ी। वहाँ के ग्राम प्रधान जीवन सिंह ने बताया कि गाँव में कोई रुकना नहीं चाहता। सभी लोग पलायन कर रहे हैं। बस महिलायें, बच्चे और बूढ़े बचे हैं। विकास के नाम पर जहाँ पानी नहीं था, वहाँ डिग्गी बना दी गई, गूलों को सीमेंट-पत्थर डाल कर सुखा दिया। भ्रष्टाचार चरम पर पहुँच गया है। जिस पार्टी की सरकार होती है उसी के लोगों को फायदा दिया जाता है। दुबरौली से 5-6 किमी. सड़क का तीन बार सर्वे भी हो गया था, पर कुछ लोगों के अड़ंगा लगा देने के कारण निर्माण कार्य अटक गया। इन गाँवों को आपस में जोड़ने वाले खड़ंजों की हालत भी बिल्कुल खस्ता है। पनार नदी से डेढ़ किमी. लम्बी सिंचाई गूलों के लिये प्रस्ताव बना कर भेजा गया है। पंचायत भवन खस्ताहल हो चुका है। यहाँ कोई मनोरंजन कक्ष नहीं है। स्वास्थ्य परिचारिका या आशा कार्यकर्ता जैसे लोग भी यहाँ नहीं आते। बीमार होने पर अल्मोड़ा या हल्द्वानी ही जाना पड़ता है। फौजी भी अपने कोटे की शराब गाँव में बेचते हैं।
हमारी यह बातें चल ही रही थीं कि बाकी लोग भी खाकर लौट आये। उनके साथ आये कल्याण दा ने और भी कई गंभीर, पर मजेदार बातें बतायीं। गाँव में खड़ंजा बनाने के लिये 50 हजार रुपया स्वीकृत हुआ। एक बी.डी.सी. सदस्य ने उनसे मस्टर रौल बनाने को कहा। जब उन्होंने काम के बगैर मस्टर रौल बनाने से इन्कार किया तो तर्क दिया गया कि सभी गाँवों में ऐसा ही हो रहा है। अन्ततः उन्होंने मस्टर रौल बना कर, मजदूरों के आड़े-तिरछे हस्ताक्षर और अंगूठे के निशान चस्पाँ कर उन्हें दे दिया। काम शुरू होते ही सात हजार रुपये का चेक लेने उन्हें ब्लॉक बुलाया पर ढाई हजार रुपया बाबू के पास रख कल्याण सिंह को लेने को कहा। तत्पश्चात् काम खत्म होने पर 25 हजार रुपये और दिये गये। 50 हजार रुपये में से उनको सिर्फ 27 हजार रुपया ही दिया गया। इस बातचीत से बहस आगे बढ़ी कि गाँवों के विकास का रास्ता क्या हो। सम्पादक जी के मुँह से बेसाख्ता निकला, ग्राम गणराज्य। गांधी जी के सपनों का भारत।
रात में नींद तो किसी को नहीं आई, इसलिये दूसरे दिन सभी जल्दी उठ कर वापसी की तैयारी करने लगे। गृहस्वामी ने बताया कि गाँव में ज्यादातर परिवार अब बाहर ही बस चुके हैं। ये लोग अब किसी कामकाज या पूजापाठ में ही आते हैं। गई रात कुछ दिखाई न देने के कारण गाँव खतरनाक लग रहा था। मगर सुबह की रोशनी में सारा लैण्डस्केप बेहद खूबसूरत हो गया था।
बारात को विदाई के लिये अभी कई घंटे रुकना था, मगर हमें जल्दी जाना था। अब हमारे सामने सबसे बड़ी समस्या थी कि वापस किस रास्ते से जाया जाये। शंभू राणा जी पिछले दिन वाले रास्ते से जाने को कतई तैयार नहीं थे। हमने बहुत से लोगों से मशविरा किया और उतने ही रास्ते हमें सुझा दिये गये। अनिर्णय में उलझ कर यही तय किया गया कि जिस रास्ते आये थे, उसी से जाना ठीक होगा। कल की तीखी चढ़ाई आज ढलान में बदल कर और भी खतरनाक हो गई थी। मगर चलने लगे तो आपस में हँसी-मजाक में कब उस तीखे ढलान से नीचे उतर गये और कब चढ़ाई को पार कर लिया, पता ही नहीं चला। सुनील के घर पहुँचे तो लगा जैसे कोई जंग जीत ली हो। पर यह अहसास भी हुआ कि जिस रास्ते ने हमें दिन में तारे दिखा दिये, उस रास्ते को स्थानीय ग्रामीण रोजाना पता नहीं कितनी बार पार करते हैं।
सुनील के घर खाना खाकर और उसकी 95 वर्षीय दादी से भेंट कर हम लोग लौट आये। यहाँ से दुबरौली का रास्ता लगभग समतल ही है, इसलिये ज्यादा परेशानी नहीं हुई। घोड़िया सड़क के अगल-बगल, कई जगह हमें बढ़े-बढ़े गड्ढे नजर आये। पहले तो इनका रहस्य हमारी समझ में नहीं आया। फिर जोशी जी ने बताया कि वर्षा का जल संचित करने के लिये ये गड्ढे बनाये गये हैं। इस तकनीक से उफरैंखाल में सच्चिदानन्द भारती ने एक सूखी नदी को जिन्दा कर एक प्रेरणास्पद मॉडल प्रस्तुत किया है। लेकिन अब यह मॉडल भी पैसा खाने का जरिया बन गया है। यहाँ पर गड्ढे बनाने के पीछे कोई योजना नहीं थी। चारों ओर पत्थर लगा कर गहरे गडढे बना दिये गये थे, जिसमें रात के समय किसी आदमी या जानवर के गिर जाने का भय बना रहता है। पानी तो खाक एकत्र होता होगा इनमें!
हम लोग दुबरोली की प्राइमरी पाठशाला के सामने से गुजरे तो सम्पादक जी वहाँ की शिक्षिका से बात करने चले गये। उसने बताया कि वह रोज अल्मोड़ा से यहाँ आती है। बहुत ही कम बच्चे यहाँ पढ़ने आते हैं। बहुत से बच्चों को उनके घर वाले आने नहीं देते और कुछ बच्चे जो आते हैं उनका ध्यान खाने की तरफ ही ज्यादा रहता है। पढ़ाई में किसी का मन नहीं लगता। उत्साही होने के बावजूद उसकी अपनी शिकायतें थी, जैसे यह कि इन बच्चों का उच्चारण साफ नहीं है। इनके बोलने में जो पहाड़ी ‘लटैक’ आता है, उसे लाख कोशिश के बावजूद ये नहीं छोड़ते। हमारे यह समझाने के बावजूद कि पहाड़ी लटैक को लेकर ऐसा हीनभाव रखने की जरूरत नहीं, यह तो हमारी विशिष्टता है, वह अपने तर्क पर अड़ी रही।