पिछ्ले अंक से आगे
मेडिकल कॉलेज के अंदर गाड़ी ले जाने की इजाजत ब आसानी मिल गयी। बाबूजी ऑफिस में जाकर पूछ आए कि इस नाम का जवान इधर किधर मिलेगा। हमारा दामाद है। बताया गया फलां ब्लॉक में। एक-डेढ़ घंटे पूरे परिसर में गाड़ी घूमती रही पर बाबूजी के बेटी-दामाद मिलकर नहीं दिये। रज्जन बाबू ने निराश होकर कह दिया कि छोड़ो यार, चलो, काफी कोशिश कर ली। अब कोई अफसोस नहीं। गाड़ी का भी काम करवाना है, आगे भी बहुत दूर जाना है। बाबूजी बोले – आये हैं तो मिल कर जायेंगे। ढूंढेंगे कैसे नहीं मिलेगा, खोद कर निकालेंगे। हम भी एक्स आर्मी मैन हैं। ऑफिस चलो, रिक्वेस्ट करेंगे कि हमें एक जवान दो। सचमुच वहाँ से एक जवान मिला जो स्कूटर में बैठ कर हमें रास्ता दिखाता हुआ चला और ऐन दरवाजे पर छोड़ गया।
मुलाकात बेहद छोटी रही। सिर्फ चाय भर पी सके। शुरू में ही जवान मिल जाता तो एकाध घंटा बैठ सकते थे। मगर मजबूरी थी। बाद में कहीं रज्जन बाबू की बहन का फोन आया कि ददा, तू सचमूच आया था या मैंने सपना देखा ?
गाड़ी गैराज में ले जाई गयी। वहाँ हमें एक नौजवान मैकेनिक मिला जो काठगोदाम का रहने वाला था। उस बेचारे को साल-डेढ़ साल के अंदर कई काम करने थे। आई.टी.आई. करनी थी, अंग्रेजी सीखनी थी और फिर ऑस्ट्रेलिया जाना था। दूसरे मैकेनिकों के साथ उसने भी गाड़ी में हाथ आजमाये और कहा कि यूँ तो गाड़ी एकदम फिट है मगर 50-60 किमी. पर इसे थोड़ा आराम देते हुए जाना। दिक्कत की कोई बात नहीं। वह मैकेनिक हमारे मेजबानों का अच्छा परिचित था। गाड़ी की जो हाल ही में सर्विसिंग हुई थी उसका गवाह था। दो एक घंटे गैराज में गुजर गये।
लगभग एक-डेढ़ बजे बाबूजी और उनके बेटाजी मोहनदा से वहीं विदा ली, सास-बहु से सुबह घर पर विदा लेली थी। हमें नासिक पहुंचना था। शहर से निकल कर जब शहर के मुकाबले कम भीड़ वाली सड़क पर आये तो पता चला कि गाड़ी का तो पिक-अप ही ठीक नहीं। ऐसे में या तो कछुए की रफ्तार से चलो या पास लेने की कोशिश में सामने वाले से जा भिड़ो। कर क्या सकते थे, चलते रहे। दो-एक घंटे बाद गाड़ी रवाँ हो गई। पिक-अप ठीक-ठाक हो गया। जहाँ जरूरत हुई सौ किमी. रफ्तार से भी दौड़ी। गाड़ी हमारे मेजबानों ने किसी फौजी से खरीदी थी। शीशे में अभी भी बांयी तरफ ‘आर्मी’ लिखा था। काफी लंबे समय से पार्किंग में खड़ी थी। दौड़ना तो क्या उसकी चहल कदमी की तक आदत छूट चुकी थी। ऐसे में पिक-अप की दिक्कत तो शुरू में होनी ही थी।
चारों ओर पहाड़ हरियाली और बीच-बीच में घुमावदार सड़क देखकर हमें हैरानी हुई। रास्ता हमें एकदम अपरिचित सा नहीं लगा, पहाड़ में ही कहीं होने का सा अहसास होता रहा। हाँ, पहाड़ वहाँ के हमारे पहाड़ों की तरह नुकीली चोटियों वाले नहीं सरकटे हैं – रेत का पहाड़ बनाकर उसका ऊपरी हिस्सा हथेली से थपथपा दीजिये। हमारे पहाड़ों को दूर से देखकर लगता है कि उनकी चोटी पर खटिया नहीं बिछाई जा सकती, जबकि उन पहाड़ों की चोटी को देख कर लगता है कि वहाँ फुटबॉल खेली जा सकती है।
रात आठ-नौ बजे के करीब नासिक पहुंचे। बहुत देर किसी सस्ते होटल की तलाश करते रहे। बमुश्किल एक तथाकथित सस्ता होटल मिला। नहाया-धोया, खाया और तीनों चित्त। दूसरे दिन पांच बजे तड़के चले। अभी ठीक से उजाला नहीं हुआ था, हल्की ठंड महसूस हो रही थी। गाड़ी में तेल कम था पर अभी न तो कोई पेट्रोल पम्प खुला था न चाय का कोई ढाबा। एक पम्प के ऑफिस का दरवाजा खुला देख कर वहां रुके, भीतर दो -एक लोग सोये पड़े थे। आवाज देकर उन्हें जगाया तो उन्होंने हमें देखकर करवट बदल ली। यकीनन गाली भी दी होगी। होटल में उतनी सुबह चाय की सुविधा नहीं थी, चाय की बड़ी तलब लगी थी, खास कर रज्जन बाबू और मुझे। डेढ़-दो घंटे चलने के बाद एक चाय की दुकान नजर आयी। दुकानदार ने पूछा कि चाय चालू या स्पेशल ? हम तीनों ने एक दूसरे की सूरत देखी और स्पेशल चाय बनवायी। उस समय तलब लगी थी इसलिये ठीक ही लगी। वर्ना चालू और स्पेशल का तजर्बा हमें पूना और नासिक के बीच हो चुका था। तब हमने सोचा था कि अगर स्पेशल ऐसी है तो साली चालू कैसी होगी ! तजर्बे के तौर पर एकाध जगह हमने चालू चाय भी पी। दुकान में कोई कैसेट बज रहा था। ताबड़तोड़ शोरनुमा ‘संगीत’ के साथ गाने वाला न जाने क्या अलाय-बलाय गाये जा रहा था जिसे सुनकर हमें हंसी आ गयी। पूर्वाग्रह रहित बिल्कुल स्वाभाविक हंसी। दुकानदार हमें घूरने लगा तो एकाएक हमारी समझ में आया कि हम गलत हंस रहे हैं। सुबह का समय है, शायद कोई भजन हो – रॉक और पॉप स्टाइल में। माता के आगे क्या है, पीछे क्या है जब हिन्दी में हो सकता है तो दूसरी भाषाओं में क्यों नहीं ?
केशव का अनुमान था कि आज शाम तक हम आगरा पहुंच सकते हैं। ठीक है भय्ये, चल आगरा पहुंचा, अच्छा हो अगर हमें अल्मोड़ा पहुंचा दे। तेरी मर्जी। गाड़ी सिर्फ तुझे चलानी है। हम दोनों तो सिर्फ भार हैं गाड़ी में। हम से अगर अचानक पूछा जाये कि फोर व्हीलर में कितने टायर होते हैं, तो हम घबरा के तीन या पांच कह देंगे। कंडक्टर होने के लिये भी रूट की जानकारी होना जरूरी है वर्ना टिकट कैसे काटेगा। हम तो सिर्फ क्लीनर हो सकते हैं। हीरो तुझे बनना है कि पूना से गाड़ी चलाकर बागेश्वर पहुंचा हूं। हमारी तो स्थिति अपाहिजों सी है। सलामत पहुंचे तो तेरी वजह से, न पहुंचे पाए तो भी तेरे कारण।
गाड़ी बढ़िया चल रही थी और माइलेज भी अच्छा दे रही थी। चलते रहे। जगह-जगह लोग मंदिर को आते-जाते, शोभायात्रा झांकिया निकालते और अबीर-गुलाल से सूखी होली खेलते नजर आये। दो-तीन घंटे बाद फिर चाय की तलब ने जोर मारा। दुकानों में चाय के लिये पूछने पर जवाब मिला कि चाय नहीं है, आज छोकरा लोगों का छुट्टी है। उस दिन दशहरा था फिर आगे एक जगह चाय मिली। चाय पी और ढेर सारा सामान खरीदा। जूस, मट्ठा, रेजर, सर ठंडा करने के लिये तेल और ऐसी ही न जाने क्या-क्या चीजें। उस दिन दोपहर का खाना खाया या नहीं, याद नहीं। काफी आगे चलकर सड़क में एकाएक हल्की सी चढ़ाई शुरू हुई। वहीं एक जगह मंदिर में दशहरे का मेला लगा था। सड़क के किनारे लगी दुकानों में गांव देहात की महिलायें व बच्चे खरीददारी कर रहे थे, खा-पी रहे थे। मंदिर किसी देवी का था और देवी का नाम किसी भूतनी से मिलता-जुलता था, याद नहीं रह गया।
सफर अच्छा चल रहा था, जिसे कहते हैं सुहावना। कैसेट प्लेयर में गाने बज रहे थे, आपस में हंसी-मजाक रज्जनबाबू बीच-बीच में पिछली सीट पर झपकी ले लेते थे। तीनों जनों की आपस में अच्छी पुरानी ट्यूनिंग…आदमी की औकात लंबे सफर में और नशे में एक हद के बाद उभर कर सामने आती है। जैसा वह वास्तव में होता है – एक तरह का नारको-एनालिसिस। दोपहर डेढ़-दो बजे का समय था, फर्राटे से भागती गाड़ी एकाएक खंखार के रुक गयी। गाड़ी सड़क से उतार कर कच्चे में खड़ी की। लगा कि शायद गरम होने से बंद हो गयी। काफी देर बोनट खोल कर इंतजार करते रहे फिर केशव ने अपनी सीमित जानकारी के मुताबिक कुछ खचर-बचर की। कोई नतीजा नहीं। वीरान सा इलाका। ट्रक वालों का जो ढाबा मृग तृष्णा सा पास नजर तो आ रहा था एक सवा किमी. पीछे रह गया था। गाड़ी को हल्की ढलान के बावजूद ढाबे तक ले जाना मुमकिन नहीं था। गाड़ी को धकेलते हुए सड़क क्रॉस करते हुए सेकंड के हजारवें हिस्से में हमारी चटनी बन सकती थी या ट्रक पलट सकता था। इत्तेफाकन वहीं पर सड़क में मोड़ था, जिसके उस पार कुछ भी नजर नहीं आ रहा था जिस कारण दुर्घटना की संभावना और भी ज्यादा थी। थकहार कर ढाबे में जाकर पूछा तो पता चला कि जिधर से हम आ रहे हैं उसी तरफ कुछ किमी. पर मैकेनिक मिलेगा। केशव ने एक बिना बॉडी वाले दैत्याकार ट्रक में लिफ्ट ली और मैकेनिक बुलाने चला गया।
रज्जन बाबू और मैं वहीं बैठे रह गये। एक टहनीनुमा जो पेड़ा था उसकी छाया के साथ-साथ सरकते रहे और ट्रकों में लदा लाखों-करोड़ों का माल-असबाब इधर से उधर होते देखते रहे। दूर जो ढाबा था वह मुझे बार-बार इशारा कर रहा था। हमारे पास एक 24-25 साल का नौजवान हाथ में नुकीला हंसिया लिये आन बैठा। वह बताने लगा कि हमारा गांव उस तरफ है, ऊपर वहां। वह घर में कपड़े सीने का कार्य करता था। शादी उसकी अभी नहीं हुई थी। घास काटने आया था। नाम उसने कुछ बताया था अपना। बताने लगा कि हमारे बाबा जब कोई मोटर इसी तरह खराब हो जाती थी तो रात भर उसकी रखवाली करते थे, सौ-पचास रु. लेते थे। काफी देर तक हम उससे बतियाते रहे – खेती-बाड़ी, गाय-भैंस न जाने क्या-क्या। ढाबे का बुलावा अनसुना करना अब मुमकिन नहीं रह गया था। मजबूरन गाड़ी बंद की और जाकर चाय पी आए।
दो-ढाई घंटे बीत चुके थे केशव को गये। हमें फिक्र होने लगी। फोन किया तो पता चला कि मैकेनिक मिल गया है आ रहे हैं। धीरे-धीरे शाम घिरने लगी, अंधेरा गाढ़ा होता जा रहा था। मोटर-गाड़ियों ने बत्तियां जला ली थी। केशव जिधर गया था उस ओर से आने वाली हर गाड़ी को हम बड़ी उम्मीद से देख रहे थे। बड़ी देर बाद एक मारूति वैन हमारे पास आकर रुकी जिसमें से केशव और दो मैकेनिक बाहर निकले। मैकेनिकों ने पहले वैन के अंदर ही रोजा खोला। गाड़ी को देख कर उन्होंने बीमारी बतायी कि इसका फलां पुर्जा जल गया है और पंखे में गड़बड़ी है। पुर्जा हम बदल देते हैं पंखे को सीधे बैटरी से जोड़ देते हैं, जब रुके तो इसे डिसकनेक्ट कर दें। बांकी सब खैरियत है। वैसे हम दुकान से बाहर जाते नहीं, मगर आप परदेसी आदमी हैं…..रोग की पहचान और निदान में एक-डेढ़ घंटा और बीत गया। सात-आठ सौ रु. का बिल बना। आशीर्वादनुमा आश्वासन मिला कि भाई साहब आराम से जहाँ तक मर्जी हो जायें, कोई दिक्कत नहीं आयेगी। यकीन न हो तो हम साथ चलें !
पांच-छः घंटों बाद फिर चल पड़े। अब सामना था गड्ढों भरी सड़क, दनदनाते फिरते ट्रकों और धुंध की तरह छायी हुई धूल का। यह सब दिन में भी था मगर रात में ज्यादा डरावना और परेशानी पैदा करने वाला होता है। ज्यादातर ट्रक वाले सिर्फ एक हैड लाइट जलाकर क्यों चल रहे थे न जाने। कनडक्टर की तरफ वाली हैडलाइट जली होने और धूल की वजह से दूर से भारी-भरकम ट्रक किसी दुपहिये का धोखा दे रहा था – मतलब कि भिड़ंत की पूरी संभावना और उस पर तुर्रा ये कि सामने वाले की आंखें चुधियाने से बचाने के लिये जो जरा रोशनी हल्की करने का नियम है, उसका मानो किसी को पता ही नहीं। न चाहने के बावजूद जब भी रात को सफर करना पड़ा, एक-दो ने ही इस नियम का पालन किया बांकी सब समरथ को दोष नहीं गोसाईं मानने वाले थे।
दर्जन भर पहियों वाले ट्रकों की रेलमपेल में मारूति-800 कार की औकात हाथियों की भगदड़ में फंसे मेंढक जितनी ही समझिये। ऐसे में अगर वह मेंढक सही सलामत अपने बिल में पहुंच जाये तो कहने वाले इसे भाग्य या संयोग कहेंगे, मैं बेहयाई कहना चाहूंगा। हम भी हयादार कहाँ थे !
दो एक घंटे चलने के बाद तय हुआ कि अब और चलना ठीक नहीं। गाड़ी एकाध बार संकेत दे चुकी थी कि तबियत उसकी बहुत अच्छी नहीं। आगे न जाने कैसी जगह हो, कहाँ फंस जाये, कहीं पर ठीक-ठीक सी जगह देख कर रुक लिया जाये। एक कस्बेनुमा जगह में वह रात बीती। उस जगह का नाम हम तीनों में से किसी को याद नहीं। हां, गैस्ट हाउस का नाम जरूर याद है क्योंकि जब बागेश्वर केशव के पास जाना हुआ, कई बार उसी नाम के गेस्ट हाउस में रुके – नीलकंठ गैस्ट हाउस। जैसा कि पहले बताया वह दशहरे यानी त्यौहार मतलब छुट्टी का दिन था। शायद इसीलिये गैस्ट हाउस वीरान पड़ा था। मात्र एक आदमी बैरा, मैनेजर, गाइड, स्वच्छक वगैरा का रोल निभा रहा था। वह नौजवान इस कदर सीधा/उल्लू का पट्ठानुमा था कि लगता था बांकी स्टाफ ने त्यौहार के दिन ड्यूटी करने के लिये उसे बली का बकरा बनाया होगा।
रज्जन बाबू के साथ जाकर वह बाहर से खाना पैक करा लाया। हमने कहा कि भय्याजी, कमरे में केबिल तो है पर टीवी नहीं तो वह जाकर टीवी उठा लाया। स्टार मूवीज में टाइटेनिक फिल्म चल रही थी। रज्जन बाबू ने बताया कि जब वे लोग खाना लाने बाहर गये तो भय्याजी ने कहा कि भय्याजी, आपको दशहरे की बधाई। आपने घर फोन करके बधाई कह दिया होगा ? रज्जन बाबू ने उसका दिल रखने को कह दिया कि हां, मैंने सुबह ही फोन कर दिया था। उस आदमी का बोलना कुछ ऐसा था जैसे गुनाह करके माफी मांगने आया हो। सोने से पहले हमने उससे कहा कि भय्याजी, सुबह को जल्दी जगा देना और चाय पिलवा देना।
सुबह पांचेक बजे दरवाजे पर दस्तक हुई। मैंने उठकर दरवाजा खोला, भय्याजी चाय लाने चले गये। करीब दस मिनट के बाद भय्याजी तंबाकू की पिण्डी की तरह सुतली से बंधी तीन पुड़िया लेकर आये कि लीजिये भय्याजी, नाश्ता कर लीजिये। पूड़ा लाया हूँ, ताजा बन रहा था। पांच रुपये का एक है। मैंने तीनों पूड़े बैग में रख लिये ताकि उसे बुरा न लगे। इतनी सुबह कुछ भी खाने का मतलब ही नहीं था। पांचेक मिनट बाद भय्याजी फिर आकर बोले कि – नाश्ता कर लिया ? चाय वाले को मैंने बाहर बिठा रखा है ताकि आप आराम से नाश्ता करलें। उसकी भलमनसाहत के कारण चाय थोड़ा ठंडी हो गयी थी। चलते वक्त उन्होंने हमें फिर कभी जरूर आने को कह कर विदा किया।
अगले अंक में जारी