उस दिन का सफर घंटों तक धूल और गड्ढों भरी सड़क में किया। धूल की वजह से शीशे चढ़े ही रहे, गाड़ियों की रफ्तार बैलगाड़ी जितनी हो कर रह गयी। मुश्किल से कई घंटों बाद पक्की सड़क के दर्शन हुए। गाड़ी ने ज्यादा तंग नहीं किया, ठीक-ठाक चलती रही। दिन के एक-डेढ़ बजे किसी जगह खाने के लिये रुके। वह मध्य प्रदेश का कोई शहर या कस्बा था। किसी अच्छे से मोटर मैकेनिक के बारे में पूछने पर पता चला कि आगे फलाँ जगह पर एक पीटर भाई है। हमें उसी रास्ते से होकर जाना था। एकाध घंटे बाद पीटर भाई के पास पहुँच गये। दो-एक घंटे पीटर भाई गाड़ी की मरम्मत करते रहे। रज्जन बाबू और मैं चाय पीते रहे। हमने वहीं से 100 ग्राम प्याज का बीज भी खरीदा, जो कि नासिक का बताया गया। हो सकता है हो, पर उसने अल्मोड़ा में अंकुर नहीं दिये। पीटर भाई ने बकौल उनके गाड़ी एकदम फिट बना दी थी। उन्होंने बताया कि आगे एक जगह पर उनके भाई का गैराज है, आप फोन नम्बर नोट कर लें। वैसे कोई जरूरत नहीं पड़ेगी लेकिन फिर भी…..
चले तो केशव ने कहा कि हाँ, अब ठीक है, गाड़ी पहले से ठीक चल रही है। स्टेयरिंग भी एकदम हल्का हो गया है। पीटर भाई हमें जानकार आदमी लगे और भले भी। शायद उन्होंने हमें ठगा भी नहीं। मोटर ठीक चलती रही। मैंने डैशबोर्ड पर बैठे गणेशजी से दोस्ती गाँठनी शुरू कर दी कि हे दुनिया के पहले स्टेनोग्राफर बाधायें हरो, सफर को स्मूथली चलने दो। क्यों हमारी कुकुरगत्त करवा रहे हो। पता नहीं उन्होंने सुना नहीं, मूड में नहीं थे या बात उनके वश के बाहर थी कि गाड़ी को फिर जुकाम की शिकायत होने लगी। दो-एक जगह चल के रुकी, मगर आखिरकार एक पुल के ऊपर रुक गयी। धकेल कर उसे पुल पार करवाया, किनारे खड़ी की। अब इससे ज्यादा भद्दा मजाक परिस्थिति किसी के साथ और क्या करेगी कि आप पुल के ऊपर ठप पड़ी मोटर के साथ हैं और नीचे जो नदी बह रही है उसका नाम ‘घोड़ा पछाड़’ नदी है।
पीटर भाई का भाई कहीं व्यस्त था और देर में आने को कह रहा था। एकाध किमी. की दूरी पर एक अनजान सी बस्ती नजर आ रही थी। वहाँ एक मैकेनिक मिल गया- राजू मैकेनिक। गाड़ी वहाँ पहुँचायी गयी। आगरा पहुँचने का सपना धरा रह गया। रात वहीं गुजरी। रज्जन बाबू और मैं किसी सस्ते से होटल या धर्मशाला की तलाश में निकले। एक धर्मशाला का कमरा पसंद कर लिया गया। वह जगह अगर ठीक याद कर पा रहा हूँ तो शायद पचौर नाम की जगह थी। पचौर से मुझे अपने एक मित्र पचौलिया की याद आयी थी, याद है।
सुबह को फिर चले। केशव ने पैंट-कमीज त्याग कर ठेठ लफंगों का सा वेश धारण कर लिया- घुटनों से जरा ऊपर तक कच्छा और बंडी। गर्मी काफी थी और बार-बार गाड़ी को प्राथमिक उपचार देने में कपड़े भी काले हो रहे थे। दिन भर चलते रहे। उस दिन गाड़ी ने ज्यादा परेशान नहीं किया। जहाँ भी गाड़ी रुकी, तेल का पाइप चूसते ही चल पड़ी। मैकेनिक की शक्ल नहीं देखनी पड़ी। ग्वालियर होते हुए शाम को आगरा पहुँचे। किसी सस्ते से होटल की तलाश में घूम रहे थे कि एक होटल के बाहर गाड़ी रुक गयी। तेल चूसने वाला फार्मूला नाकाम रहा। गाड़ी ने जिद्दी बच्चों की तरह पैर पटक दिये कि नहीं, इसी होटल में रहना है। जिद के आगे हार माननी पड़ी और उसी समय पता चला कि एक टायर भी पंक्चर हो गया है। पूरे सफर में पंक्चर होने की एकमात्र घटना थी।
होटल के बाहर हम गाड़ी में खचर-बचर कर रहे थे तो काफी देर से एक बारह-चौदह साल का बच्चा साइकिल के सहारे टिक कर हमें देखे जा रहा था। हमने सोचा बच्चा है, यूँ ही खड़ा है पर वह मोटर मैकेनिक निकला। फिर गाड़ी उसी ने ठीक की। मैकेनिक की शक्ल देखे बिना दिन नहीं बीतना था सो नहीं बीता। गाड़ी ठीक होने में काफी समय लगा। जिस होटल के बाहर गाड़ी रुकी थी, वहीं एक कमरा ले लिया। सबसे सस्ता कमरा लिया और रूखा-सूखा खाया। फिर भी खाने का बिल कमरे के किराये से ज्यादा आया। पैसे जो हमारे पास थे, वे तेजी से बिला रहे थे। हर दस-पन्द्रह किमी. पर एक मैकेनिक हमारे ही वास्ते तो दुकान खोले बैठा था। गाड़ी जो हमारे पास थी, उसका दिल कब किस मैकेनिक पर आ जाये कहना मुश्किल था। अभी काफी लम्बा सफर बाकी था। कम से कम हल्द्वानी जब तक न पहुँच जायें, घर पहुँचने का सा अहसास कैसे हो ? रज्जन बाबू के एटीएम कार्ड का भरोसा था, जिसमें पैसे नहीं थे। मगर भरोसा था, फोन करके किसी से खाते में पैसे डलवाये जा सकते थे।
पहले ही तय था कि ताजमहल देखेंगे। आगरा जाने पर ताजमहल देखने जाना एक रिवाज सा है। हम तीनों में से किसी ने भी पहले ताजमहल नहीं देखा था। मुझे व्यक्तिगत तौर पर ताज के लिये बहुत उत्सुकता नहीं थी। फिल्मों और तस्वीरों में देखा ही था। लड़कियाँ धागे से ताजमहल बुनती ही रहती हैं। ताजमहल मतलब सफेद संगमरमर से बनी एक भव्य कब्र जो एक मुगल बादशाह ने अपनी बेगम की याद में तामीर करवायी थी। इसके अलावा और क्या ? देखा तो ठीक, न देखा तो भी ठीक। मगर जब ताजमहल एकाएक सामने आया तो मैंने अपनी राय चुपके से बेहद शर्मिन्दगी और माफी के साथ वापस ले ली। ताज के सामने खड़े होकर पल भर को मेरी घिग्घी सी बँध गयी। मुझे नहीं लगता कि ताजमहल के बारे में मैं अपनी भावनायें ठीक-ठीक व्यक्त कर पाउँगा। ताज बस देखने से ताल्लुक रखता है।
खयाल आया कि प्रेम की प्रतीक यह इमारत बादशाह के खौफ या उसके प्रति वफादारी के बिना ऐसी बन पाती जैसी की बनी ? दुनिया के सारे ही आश्चर्य शायद इसी भय और वफादारी के गारे से चिने गये हैं। दूर मत जाइये, अंग्रेजों द्वारा बनाई गयी इमारतों को देख लीजिये। मान लीजिये, आज कोई ठेकेदार वैसा ठोस काम करना चाहे तो क्या विधायक, सांसद, छुटभय्ये नेता और इंजीनियर साहेबान उसकी हौसलाअफजायी करेंगे ? माफ कीजिये चौथे स्तम्भ का नाम तो छूट ही गया। सुना कि वह भी कमीशनखोरी में उतर आया है। इन महानुभावों की अपनी निजी इमारतें जितनी भव्य और ठोस होती हैं, इनके द्वारा करवाया गया सरकारी काम उतना ही घटिया और क्षणभंगुर होता है। क्योंकि भय किसी का है नहीं और ईमानदारी, नैतिकता, वफादारी नाम की चीजें हनीमून के एलबम की तरह न जाने कहाँ, किस अलमारी में पड़ी हैं, याद नहीं।
याद आया कि बिल क्लिंटन ने ताजमहल को देख कर कहा था कि दुनिया में दो तरह के लोग हैं- एक जिन्होंने ताजमहल देखा है, दूसरे जिन्होंने इसे नहीं देखा। दोमुँहा शायर ‘साहिर’ कहता है- एक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताजमहल हम गरीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मजाक और बनवा के बनवा के हसीं ताजमहल दुनिया को मुहब्बत की निशानी दी है। न जाने किस ने ताज को मुहब्बत के रुखसार (गाल) पर अटका हुआ आँसू कहा है। हमने ताजमहल के सामने खड़े होकर तस्वीर खिंचवायी और बाहर निकल आये। शहर की भीड़भाड़ से बाहर निकल कर एक जगह रुक कर चाय पी और पंक्चर टायर ठीक करवाया। इरादा आज शाम तक हल्द्वानी पहुँचने का था। पर गाड़ी का इरादा क्या था किसे पता। इंसान की आँखें और चेहरा देख कर काफी हद तक उसके इरादे पता चल जाते हैं। मगर मोटरकार का न चेहरा, न आँखें। लगभग साढ़े नौ-दस बजे का समय, धूप में गर्मी आने लगी थी। आगरा से आगे का सफर शुरू हुआ। केशव का पारा बीच-बीच में चढ़ रहा था इसलिये मैंने उसी के साथ बैठना शुरू किया। मैंने फिर गणेश जी को फुसलाना शुरू किया। गाड़ी ठीक-ठीक चल रही थी। कैसेट प्लेयर में गाने बज रहे थे। कैसेट हमारे पास सिर्फ दो ही थीं और गाने लगभग हमें याद हो गये थे। अचानक मेरा ध्यान एक चीज की ओर गया – केशव ब्रेक को पम्प करने की तरह दबा और छोड़ रहा था। गाड़ी फर्राटे से भागी जा रही थी। बात समझ में नहीं आयी। मैंने घबरा के पूछा क्या हुआ ? केशव ने लापरवाही से जवाब दिया- कुछ नहीं। मैंने मान लिया। पीछे बैठे रज्जन बाबू को कुछ भी पता नहीं चल पाया। बाद में पता चला कि उस वक्त थोड़ी देर के लिये ब्रेक ने काम करना बन्द कर दिया था।
हाथरस आ पहुँचे, काका हाथरसी का शहर। शहर में पहुँचते ही घुटने-घुटने गड्ढों में जा घुसे। दुर्घटनावश नहीं जानबूझ कर। क्योंकि कार उड़ नहीं सकती थी और हमें आगे जाना था। उन गड्ढों में इतना पानी था कि बच्चे तैराकी सीख सकते थे। गाड़ी का निचला हिस्सा पानी के भीतर किसी चीज से टकराया, गाड़ी एक धचके के साथ आगे बढ़ी, लगा कि बला टल गयी। आगे रेलवे क्रॉसिंग था। ट्रैफिक थम कर ट्रेन को गार्ड ऑफ ऑनर पेश कर रहा था। ट्रेन गुजर गयी, ट्रेफिक रेंगने लगा। हम जब पटरी के ऐन बीच में पहुँचे, गेयर बदलने के लिये जो मुदगरनुमा छड़ होती है, वह एक कर्कश आवाज के साथ तेजी से घूमी, केशव का बाँया घुटना और कैसेट प्लेयर फोड़ कर थम गयी। झन्न से कोई चीज सड़क में गिरी और गाड़ी ठप्प। गेयर बॉक्स टूट गया था। उसी का कोई छड़ जैसा हिस्सा नीचे आ गिरा। पटरी तब तक पार कर चुके थे। गाड़ी बीच बाजार में खड़ी हो गयी। गाड़ी रुकी तो मतलब पास में ही कहीं मैकेनिक को होना था, जो कि था। एकाध घंटा लगा, गाड़ी फिर चकाचक। इस बहाने मुझे और रज्जन बाबू को चाय पीने का मौका मिल गया।
गणेशजी की चमचागिरी अब तक बेनतीजा रही थी, आगे क्या फल देती। उन्हें जहाँ वे स्थापित थे उसी के बॉक्स में डाल दिया कि जाओ महाराज, हमारी ओर से थाल भर खयाली लड्डू खाओ। तुम्हारे वश का कुछ नही।
दिन में एक-डेढ़ बजे के आसपास गाड़ी को कासगंज का एक वीरान इलाका भा गया, इसलिये वह फिर रुक गयी। हम समझ गये कि यकीनन आस-पास कोई मैकेनिक होगा। केशव ने फिर एक बार हनुमान का रोल निभाया और एक ‘जुगाड़’ में लटक कर मैकेनिक नाम की संजीवनी लाने चला। मैकेनिक ने आकर दो-एक पुर्जों की माँ-बहन से अपने अंतरंग सम्बन्धों का हवाला दिया, तेल का पाईप खोल कर बोला- इसे आप चूसो, मेरा रोजा है। गाड़ी स्टार्ट। उसने तीन चीजों के पैसे लिये- दुकान से बाहर जाने के, आने-जाने में मोटर साइकिल में जो तेल लगा उसके और अपने मेहनताने के- करीब तीनेक सौ रुपये। पूछा कि भई पैसे तो तूने मनमाने के लिये मगर गारंटी क्या है ? उस मुसल्लम ईमान वाले रोजेदार ने फरमाया- भाईजान, मेरी दुकान तक गारंटी है, बांकी खुदा के निजाम में दखल देने वाला मैं कौन होता हूँ ! वह मोटर साइकिल में हमारे साथ-साथ चला। दो-एक किमी. चलने के बाद गाड़ी फिर ठप, दुकान से लगभग आधा किमी. पहले- गारंटी पीरियड में ! अब बोल भय्ये क्या कैरिया था ?
बेचारी रजिया गुंडों में घिर गयी थी। समझना मुश्किल नहीं था कि जाहिलों के बीच में आ फँसे हैं। मैकेनिक समझ कुछ भी नहीं रहा था, बस वक्त बिताई हो रही थी। नमाज का वक्त हुआ और फिर देखते ही देखते रोजा खोलने का वक्त भी आन पहुँचा। अंधेरा उतरने लगा। मैकेनिक ने पेट्रोल का पाईप खोल रखा था और मोमबत्ती बुझवायी। अंत में मैकेनिक और उसके चेले-चाँटे फिर नमाज को चले गये यह यकीन दिलाकर कि अब कोई दिक्कत नहीं आयेगी। जहाँ तक मर्जी हो जा सकते हो। दो-एक सौ रुपये फिर झाड़ लिये- बावजूद गारंटी के।
दो-तीन किमी. चलने के बाद कुत्ते की पूँछ फिर टेढ़ी। घना अंधेरा, एकदम वीरान इलाका, दूर तक किसी बस्ती का कोई निशान नहीं, मदद की कोई संभावना नहीं। पीछे लौट कर जाना हद दर्जे की बेवकूफी। खुद ही टॉर्च की रोशनी में बोनट खोल कर थोड़ा छेड़खानी की, तेल का पाइप चूसा गाड़ी चल पड़ी। हम सोच रहे थे कि कम से कम बदायूँ तो पहुँच जाये ताकि रात को रहने के लिये कोई ढंग की जगह मिल जाये और सुबह को मैकेनिक। कासगंज बदायूँ की सरहद पर कहीं थे हम। पाँचेक मिनट बाद ही गाड़ी का फिर दम फूल गया। लेकिन इस बार किसी बस्ती से 20-25 मीटर पहले। गाड़ी धकेलते हुए पहले ढाबे तक पहुँचे। ढाबे के मालिक मुकेश सिंह ने हमारी हालत पर तरस खाकर रात वहीं रुकने की इजाजत दे दी। हालाँकि मुसीबत में फँसे लोगों को पनाह देने के उनके अनुभव अच्छे नहीं रहे थे। कोई उनका मोबाइल ले भागा तो कोई बरामदे में पाखाना कर के चलता बना। मुकेश सिंह कुछ ही समय पहले तक किसी सिगरेट कंपनी में नौकर थे। मालिक से तनख्वाह को लेकर झगड़ा हो गया। सिंह साहब मालिक को ‘जहाँ से आये हो वहीं घुस जाओ’ (मूल गाली का शाकाहारी अनुवाद) जैसी असंभव राय/गाली देकर घर चले आये और ढाबा खोल लिया। दुकानदारी जैसी चीज मुकेश सिंह जैसे खरे और मुँहफट लोगों के वश की चीज नहीं होती है और न वह ढाबा चल ही रहा था। वह उनकी बेकारी का दौर था। अब पता नहीं कहाँ, कैसे होंगे। पूरे सफर में यही एक आदमी सच्चा और मददगार हमें मिला। ‘नीलकंठ गैस्ट हाउस’ वाले भय्याजी को नहीं भूला हूँ मगर वो जरा अलग चीज थे क्योंकि गाय छाप थे। रज्जन बाबू और मैं नारियल के रेशों वाली रस्सी से बुनी चारपाइयों पर बिना किसी ओढ़ने-बिछौने के सो गये। केशव ने गाड़ी की सीट को ईजी चियर की तरह फैला लिया।
सुबह को मुकेश सिंह हमारे लिये काम चलाताऊ सा (ट्रैक्टर का) मैकेनिक बुला लाये। गाड़ी को धक्का भी उन्होंने लगाया। सिर्फ खाने और चाय के पैसे लिये। चलते समय भरोसा दिलाया कि बदायूँ पहुँचने से पहले कहीं पर दिक्कत हो तो मुझे फोन कर दें। मैं मोटर साइकिल में मैकेनिक लेकर आ जाऊँगा।
उस दिन न जाने क्या बात हुई कि गाड़ी का दिल किसी मैकेनिक पर नहीं आया ! दो-चार बार जब कभी उसका दम फूला तो हमीं से संतुष्ट हो गयी। शायद हमको भी मैकेनिक मान बैठी हो। क्योंकि मैकेनिकों को देख-देख कर हम भी गाड़ी रुकने पर गाड़ी के साथ मैकेनिकों जैसी ही हरकतें करना सीख गये थे। बदायूँ पार हो गया। धीरे-धीरे बरेली पास आता चला गया। बरेली में एक जगह फ्लाईओवर बन रहा था, जिसकी वजह से यातायात को एक संकरी सी सड़क की ओर मोड़ दिया गया था। साइकिलें, रिक्शा, स्कूटर, कारें, बसें, पैदल लोग, गरज कि तरह की दुतरफा रेलमपेल। हर शख्स दूसरे के सर पर पाँव रख कर आगे जाने की जुगत में। हटो बचो और हॉर्न की चिल्लपों। हर आदमी खार खाया हुआ। तनी हुई रस्सी पर चलने की सी एकाग्रता से चलना भी जरूरी। ट्रैफिक किसी सिविल के मुकदमे सा रेंग रहा था। युग बीत गये चलते-चलते। लगभग आधे घंटे बाद निकलना हो पाया इस सबसे। गाड़ी से सारी शिकायतें दूर हो गयी। क्योंकि अगर उस रेलमपेल में गाड़ी कहीं रुकती तो हमारा पिटना निश्चित था और गाड़ी को कबाड़ी भी लेने से मना कर देता। साँस में साँस आयी। ऐसे ही प्राण उस दिन सुबह तब सूखे थे जब कासगंज-बदायूँ सीमा पर बने ‘कछला ब्रिज’ को पार किया। उस समय वह ब्रिज हमें दुनिया के सातों आश्चर्यों का कपड़छान ही लगा। सड़क और रेल की पटरी सड़क के बीचोंबीच चलती है। रोंगटे खड़े हो गये यह सोच कर कि अगर आगे या पीछे से धड़धड़ाती रेल आ गयी तो ? गाड़ी छोड़ कर नीचे नदी में कूदने की भी फुर्सत शायद न मिलती। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। करीब एकाध किमी लंबा ब्रिज गाड़ी फर्राटे से पार कर गयी।
लगभग तीनेक बजे जब हल्द्वानी पहुँचे तो यकीन हुआ कि बच गये। पूना से जो पैंट कमीज का कपड़ा हमको उपहार में मिला था, उसकी अब पैंट कमीज ही बनेगी। वर्ना नासिक के बाद दिमाग में एक खयाल बीएसएनएल के मोबाइल सिग्नल की तरह लगातार आ जा रहा था कि कहीं नियति ने हमें कफन तो गिफ्ट नहीं करवा दिया।
हल्द्वानी में कार का कायाकल्प होने में करीब तीसेक घंटे लगे। उसका तेल टैंक सहित न जाने क्या-क्या बदला गया। बिल लगभग 15 हजार रुपया। पूना से बागेश्वर पहुँचने में जितना खर्च हुआ होगा उतने में शायद नयी कार आ जाती। खैर साहब खर्चे को मारिये झाडू। एक तो अपनी जेब से नहीं गया था और दूसरे ऐसे मौके पर रुपये पैसे की बात ठीक नहीं लगती। हर चीज से बड़ी बात हमारे लिये यह थी कि सही सलामत हल्द्वानी पहुँच गये थे। मतलब कि फिलहाल दुनिया में कुछ दिन और दाना-पानी बाकी बचा था।
गाड़ी बेचारी जो थी हमारी, वह दरअसल दिल की मरीज निकली। पूना में गाड़ी बिना इस्तेमाल किये एक लम्बे अर्से से खड़ी थी, जिसकी वजह से उसका तेल टैंक अंदर से जंक खा गया था। नासिक के बाद उसी जंक के जर्रे आ आकर तेल के पाइप में फँसते रहे और गाड़ी लकवाग्रस्त होती रही। गाड़ी को किसी हार्ट स्पेशलिस्ट की जरूरत थी जबकि इलाज जनरल फिजीशियन करते रहे। ज्यों-ज्यों दवा की, मर्ज बढ़ता गया। हमारी व्यथा, जो कि अब कथा हो चुकी, को वही बेहतर समझ सकता है जिसने कभी सरकारी अस्पतालों में किसी गम्भीर रोग का इलाज करवाया हो और दुर्घटनावश जिन्दा रह गया हो।
चौबेजी गाड़ी की अगवानी के लिये अल्मोड़ा पहुँचे हुए थे। केशव को गाड़ी समेत उनके हवाले करके रज्जन बाबू और मैं वहीं पर उतर गये। गाड़ी, केशव और चौबेजी खैरियत से उसी रात बागेश्वर पहुँच गये। बाद में कई बार उस गाड़ी में सफर करने का मौका मिला तो अकसर पुराने सफर की यादें ताजा हुई- मतलब कि गाड़ी अलग-अलग कारणों से ठप्प हुई। गाड़ी अभी चालू हालत में है, बागेश्वर शहर में टहलती हुई देखी जा सकती है। हाँ, जुकाम-बुखार जैसी छोटी मोटी शिकायतें उसे आये दिन होती ही रहती हैं। दुआ करनी चाहिये के उसे अच्छी सेहत और लंबी उम्र मिले।
राणा साहब की लिखा यहा यात्रा संस्मरण लाजवाब है, पढ़ते ही खुद के साथ बीते ऐसी तमाम घटनाएं याद आ गईं