‘माथेरान’ यानी चोटी पर जंगल/शिखर पर वन (वुडेड हैड) मुम्बई का सबसे नजदीकी हिल स्टेशन है। अपने आप में अलग-अनूठा। छायादार घने पेड़ों से लदी-फंदी, हरी-भरी समतल सी पहाड़ी, जिसके चारों ओर, अंदर-बाहर, नीचे-ऊपर लहरदार पैदल रास्ते हैं-पैदल पथ। लगभग आठ सौ मीटर की ऊँचाई और आठ एक हजार की स्थानीय आबादी वाले माथेरान के इन्हीं कच्चे पैदल-पथों के इर्द-गिर्द पेड़ों से छिपे/ढके, पैदल रास्तों व पगडंडियों से जुड़े, होटल और गैस्ट हाउसेज हैं- बजट से लेकर हाई रेंज/टॉय-एण्ड तक सभी तरह के, शानदार बंगले हैं, घर-दफ्तर-दुकानें, स्कूल-कॉलेज भी मनमोहक दृश्यों, घनी छाया और आवासीय ठिकानों तक ले जाने वाले इन्हीं पैदल रास्तों से पगडंडियाँ आपको हिन्दु तथा फारसी श्मशान स्थलों तक भी ले जाती हैं। एक छोटा सा बाजार है और हर भारतीय शहर एवं कस्बे की तरह यहाँ भी एक महात्मा गाँधी रोड है किन्तु यह अकेली एम.जी. रोड है जो पक्की नही है….कच्ची है, धूल-मिट्टी वाली है।
माथेरान के तमाम पैदल रास्ते वृक्षों के घने आवरण से बीच-बीच में पहाड़ी के नीचे की घाटियों, तीव्र ढलानों, पठारों, घाटियों की दूसरी ओर की पर्वत श्रृंखलाओं, मानवीय बसासतों और मैदान के विहंगम दृश्यों के लिये मुक्त से होते हैं। पेड़ों की घनी दिवारों में जैसे खिड़कियाँ सी खुलती हैं, तमाम तरह के अद्भुत नजारों के लिये। घने जंगलों के बीच चलते-फिरते बार-बार मिलती रहने वाली इन तमाम खिड़कियों से जगहों को, पर्यटकों के लिये, पॉइण्टस कहने का रिवाज है (अब तो नैनीताल में भी पॉइण्ट्स का जिक्र होने लगा है), मसलन सनराइज-सनसैट पॉइण्ट से लेकर लुइजा पॉइण्ट, कोरो पेशन पॉइण्ट, मेकी पॉइण्ट, इको पॉइण्ट, मनोरमा पॉइण्ट, लॉर्डस पॉइण्ट आदि-आदि तक।
घने जंगलों के बीच कच्ची सड़कों, पैदल रास्तों और पगडण्डियों के इस महाजाल में नीरवता है, शांति है, प्रकृति से नजदीकियाँ हैं और इस बहाने आत्म-साक्षात्कार की संभावनायें भी (बशर्ते कि आप अप्रेल-जून के सीजन, त्यौहारों से
जुड़ी छुट्टियों एवं सप्ताहांतों पर वहाँ न हों क्योंकि तब वहाँ भी पर्यटकों का वही सैलाब होता है जो मई जून में आपकी माल रोड में)। नीचे घाटी की ओर का रास्ता पकड़ें तो उस झील तक भी जा सकते हैं जो माथेरान को पानी पिलाती है। लिटिल चॉक और चॉक पॉइण्ट से नवी मुंबई की ओर के बड़े सुंदर नजारे से रूबरू हुआ जा सकता है। नीचे दांयी ओर एक बड़ी सी झील और बांयी ओर पठार। इस झील से वासी की ओर छोड़ा जाता पानी, मुंबई की दिशा से आने वाली सड़क-कार पार्क (जहाँ से पिट्ठू लगाकर माथेरान ट्रैक किया जाता है) सब एक बड़ा खूबसूरत नजारा पेश करते हैं। बारिश के बाद, धुंध नहीं होने पर, यहाँ से नवी मुंबई की स्काई-लाईन भी दिखाई देती होगी। हमारे पहाड़ के जैसे छोटे-छोटे सीढ़ीदार खेतों और ढलान वाली छतों वाले घरों के कई समूह/गाँव भी बड़ा मोहक दृश्य बनाते हैं (इसी पॉइण्ट पर हाई-फाई पर्यटक किशोरियों की, इन घर-खेतों के बारे में, जिज्ञासाओं के समाधान में लगे दुकानदार को कहते सुनता हूँ- वहाँ गरीब लोग रहते हैं, ऐसे ही खेती-बाड़ी करने वाले। स्वर एवं भंगिमा ऐसी जैसी वहाँ जानवर रहते हों….. किशोरियों की ‘वाओ’-‘हाउ क्वेण्ट’ जैसी प्रतिक्रियाओं, खिल-खिलाहटों के बीच मेरे कान में गूँजता है…. उत्तम खेती मध्यम बान और भारतमाता ग्रामवासिनी)। पैदल रास्तों और जंगलात का सीमांकन माथेरान फॉर्रेस्ट डिवीजन के एम.एफ.डी. लिखे छोटे-छोटे पिलर्स करते हैं। इन्हीं से संकेत मिलता है कि यहाँ से अलीबाग (मुम्बई का एक और पर्यटन आकर्षण) तक पचास एक किमी का ट्रैक किया जा सकता है। बाजार से लगभग डेढ़ किमी दूर शिवाजी की सीढ़ी (‘शिवाजीज लैंडर’) से नीचे घाटी की ओर उतरा जा सकता है….इस थोड़े से खतरनाक एवं कठिन से रास्ते को कहते हैं शिवाजी ने इस्तेमाल किया था।
जैसे 1841 में पी. बैरन ने नैनीताल को खोजा होगा कहते हैं वैसे ही 1850 में ठाणे के कलेक्टर एच.पी.मैलैट ने माथेरान खोजा- भारत के सारे हिल स्टेशन अंग्रेजों ने ऐसे ही खोजे जैसे वह पहले थे ही नहीं। माथेरान जाने के लिये नेरूल जंक्शन से दो फुट चौड़ी नैरो गेज लाईन पर एक ‘टॅाय ट्रेन’ की मदद लेनी होती है जो इक्कीस किमी का सफर तय कर आपको माथेरान बाजार के बीच स्थित रेलवे स्टेशन पर पहुँचाती है। यह टॉय ट्रेन भारत के सबसे घुमावदार रेल पथ पर चलती है, ग्रेडियेन्ट भी जबरदस्त है 1:20 का। अब्दुल हुसैन आदम जी पीरबॉय की इंजीनियरिंग का कमाल। दो घण्टे की इस यात्रा में इतने तीखे मोड़ भी हैं कि आपको अपने कोच की सीट पर बैठे-बैठे अपने से एकदम अगला कोच भी कहीं-कहीं पर दिखाई देने लगता है।
किन्तु यहाँ माथेरान की बात माथेरान की इन तमाम खासियतों के लिये नहीं वरन् इसलिये की जा रही हैं कि माथेरान ‘माथेरान’ है मोटर गाड़ियों, यहाँ तक की साईकिलों तक पर, पाबंदी के कारण। मोटर्ड गाड़ियाँ माथेरान में नहीं दिखाई देतीं। अगर आप मोटरगाड़ी से माथेरान आना चाहते हैं तो बाजार /रेलवे स्टेशन से अढ़ाई किमी दूर रोड हैड पर स्थित दस्तूरी कार पार्क पर अपना वाहन छोड़ना पड़ेगा। आप अढाई किमी या तो पैदल चलेंगे या फिर घोड़े अथवा हाथ-रिक्शा (जिसे पता नहीं क्यों नैनीताल में राम-रथ कहते थे) पर। मामला सिर्फ मोटर गाड़ी की पाबंदी का नहीं है वरन् माथेरान में पक्की सड़क (सी.सी. या हॉट मिक्स सतह) ही नहीं है, कच्चे रास्ते हैं- बाजार में भी। माथेरान भ्रमण में आपका जूता लाल मिट्टी से इतना सनेगा कि माथेरान छोड़ने के हफ्ते भर बाद भी लाल दिखाई देगा (माथेरान बाजार, की कच्ची सड़क के साथ-साथ दूर/आठ फुट चौड़ा खड़ंजा पड़ता देख नवंबर 2008 में मुझे तकलीफ हो रही थी)। माथेरान की इस विशेषता के पीछे निःसंदेह गोरे-अंग्रेज रहे होंगे, आभार उन स्थानियों का भी जिन्होंने इसे आज तक बनाये रखा है।
आज के नैनीताल में माथेरान बहुत याद आता है खासतौर से माल रोड से लेकर बारा-पत्थर तक लगने वाले ‘कार-जामों’ के दौरान। इस ठेलम-ठेल के बीच नैनाताल में ऐसे अनेक स्वप्नजीवी हैं जो नैनीताल में माथेरान जैसी किसी पाबंदी का सपना देखते हैं। चाहते हैं ज्यादातर गाड़ियाँ कहीं शहर की परिधि में पार्क हों…. शहर में आपातकालीन परिस्थिति में ही मोटर गाड़ियाँ आयें-जायें। मगर ’काले-अंग्रेजों’ के इस दौर में ऐसा संभव है क्या? ‘सुराजे हिन्द’ में नीति-निर्माण की मौजूदा तीन ईकाईयों -नेता-नौकरशाह-ठेकेदार में से किसी का भी हित साधन इसमें नहीं है। लोगों का हित साधन हो सकता है लेकिन भारतीय प्रजातंत्र में लोगों की हैसियत? नैनीताल में व्यवस्थित परिवहन के लिये किसी तरह की पाबंदी का सपना देखने वाले लोगों के लिये ‘काले अंग्रेजों’ की सोच की बानगी पेश है। रेल मंत्रालय ने नैनीताल के प्रति पर्यटकों के बढ़ते क्रेज को देखते हुये काठगोदाम से नैनीताल तक ट्रेन पहुँचाने की तैयारी की है। पूर्वोत्तर रेलवे के अधिकारियों की टीम का एक दौरा हो चुका है…. प्री-फिजिबिलिटी टैक्स की तैयारी है। रुचिकर यह जानना है कि यह कोशिश एक बार पहले भी की गई किन्तु रिपोर्ट निगेटिव थी किन्तु अब लोगों की भारी मांग (?) पर दुबारा सर्वे होगा। लोगों की इस भारी मांग की आड़ में जो चल रहा है उसका नैनीताल की धारक क्षमता पर क्या प्रभाव पड़ेगा? इस या ऐसी ही किसी सोच का नतीजा तो अन्ततः लोग ही भुगतेंगे। रेलगाड़ी के यह पहिये- नैनीताल के लिये क्या साबित होंगे ‘विकास के पहिये’ या फिर ‘लास्ट नेल इन द कॉफिन’।
’काले-अंग्रेजों’ ? -अपनों के लिए अपनों के द्वारा अपनों को दी गई नई उपमा…
बहुत अच्छी जानकारी, लगा माथेरान घूम आये, पर हर जगह न माथेरान होती है, न ही नैनीताल.