प्रस्तुति : संदीप भट्ट
इन दिनों सभी राजनैतिक पार्टियों के नेता अगले लोकसभा चुनावों की तैयारी में मशगूल हैं। दलों के भीतर मंथन चल रहा है कि आगामी रणनीति क्या हो। कांग्रेस के राहुल गाँधी उ.प्र. के गाँवों की खाक छान रहे हैं। पिछले दिनों एक गाँव में एक दलित परिवार के साथ राहुल ने रात बिताई। बताते हैं कि यह रणनीति का हिस्सा था, जिसमें उन्होंने दलितों की कांग्रेस से नाराजगी की वजह जाननी चाही। भाजपा के लौह पुरुष आडवाणी भी ‘राम’ को छोड़ आम आदमी की बात करने लगे हैं। उन्हें भी किसानों की दशा, महंगाई जैसे मुद्दे परेशान करने लगे हैं। वामपंथी दल भी पुराना अमेरिका राग अलाप रहे हैं और आगामी चुनावों के लिये कमर कस रहे हैं। इसी क्रम में 2 फरवरी को बहुजन समाज पार्टी की हरिद्वार रैली भी सम्पन्न हुई। एक समय ‘तिलक, तराजू और तलवार’ की धुर विरोधी मायावती के हरिद्वार में जनसभा करने के कई मतलब हो सकते हैं। अपने सम्बोधन में उन्होंने ऐसे संकेत दिये।
बसपा प्रमुख बखूबी जानती हैं कि उत्तराखंड भी जातिगत समीकरणों में उलझा हुआ है। राजनैतिक दलों के प्रदेश प्रमुखों से लेकर कई समितियों, परिषदों के मुखिया इस जातीय संतुलन को बनाये रखने के लिये नियुक्त किये जाते हैं। मायावती जानती हैं कि सूबे में दलितों का बड़ा वोट बैंक है। उनकी यह रैली उपेक्षित गरीब दलित आबादी को आकर्षित करने का प्रयास है। हरिद्वार सभास्थल इसलिये हुआ, क्योंकि मैदानी इलाकों में पार्टी का खासा जनाधार है। अपनी रैली के दौरान माया ने कांग्रेस और भाजपा को जमकर कोसा। उनकी इस ‘भाईचारा बढ़ाओ रैली’ में भारी जन सैलाब उमड़ा, जिसमें महिलायें भी बड़ी संख्या में शामिल हुई।
उत्तराखंड के लोगों ने अविभाजित उ.प्र. में मायावती का शासन देखा है। उस दौर में अफसरशाही से परेशान लोगों की पहली पसंद मायावती बन गई थी। लोग आज भी उनकी प्रशासनिक क्षमता, विकास कार्यों में तेजी लाने और सामाजिक प्रतिबद्धता के कायल हैं। उनके शासन के दौरान शुरू अम्बेडकर ग्राम योजना को लोग आज भी याद करते हैं। कई कमजोर वर्ग बहुल गाँवों में बिजली पहुँचाने का श्रेय उन्हें जाता है। इन गाँवों को वे सड़क न सही, पर खड़ंजे और सीमेंट के रास्ते दे गईं। उनके कार्यकाल में स्वीकृत योजनायें उनके बाद फाइलों में धूल खाती रही। उस समय कमजोर तबकों, खासकर अनुसूचित जाति के बीच मायावती बेहद लोकप्रिय रही। ताज्जुब नहीं कि पिछले विधानसभा चुनावों में जब बसपा के हाथी ने पहाड़ का रुख किया तो दिग्गजों के पसीने छूट गये थे। कमल मुरझा रहा था और हाथ की पकड़ ढीली पड़ रही थी। खैर चुनावों के बाद कमल खिल गया और हाथ से बहुत कुछ फिसल गया। बसपा की रणनीतिक कमी यही रही कि उसने ऐसे चेहरे प्रत्याशी के तौर पर उतारे, जिन्हें जनता ही नहीं जानती थी।
उत्तराखंड में अनुसूचित जाति की खासी आबादी है। वर्ष 2001 की जनगणना के मुताबिक राज्य की कुल आबादी का 17.9 प्रतिशत अनुसूचित जाति वर्ग का हिस्सा है। लगभग 15 लाख से अधिक इस आबादी पर अब तक मुख्यतः कांग्रेस का दावा रहा है। उन पर अपनी पकड़ बरकरार रखने के लिये कांग्रेस ने यशपाल आर्य को प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया। लेकिन उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में मिली जीत से मायावती जबर्दस्त उत्साह में हैं। अब वे एक परिपक्व राजनेता के तौर पर उभर कर आई हैं। बहुत हद तक अपनी परिपाटी बदल कर वे अब सर्वजन की बात करती हैं। भावी लोकसभा चुनावों की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि बसपा अब केंद्र में सत्ता के लिये तैयार है। परिणाम तो भविष्य के भीतर छिपे हैं, लेकिन यह लगभग तय है कि बसपा एक मजबूत राजनैतिक दल के तौर पर केंद्र में भागीदारी कर सकता है।