भूखे से रोटी के बारे में लिखने को कहना तर्कसंगत लगता है, लेकिन अशिक्षित व्यक्ति को शिक्षा के बारे में लिखने को कहना बड़ा अटपटा सा लगता है और अशिक्षित भी ऐसा कि शहर में रहने और तमाम सुख-सुविधाओं के बाद भी सिर्फ अपने निखद्दपने के कारण अपनी शिक्षा पूरी न कर पाये। और उस पर तुर्रा ये कि उसे इस बात का कोई खास मलाल नहीं। ऐसे शख्स से जो आदमी शिक्षा पर लिखने को कहे खुद उसकी अपनी शिक्षा पर संदेह होना स्वाभाविक है। हमारे संपादक की डिग्री-डिप्लोमा की जाँच होनी चाहिये। पार्टी पैसे वाली है, जैसी चाहे डिग्रियाँ खरीद सकती है।
मुझसे शिक्षा पर लिखने को कहा गया है। समझ में नहीं आता कि मेरे पास इस विषय पर लिखने को भला है क्या, क्या लिखूँ। फरमाइशी लेखन मुझसे होता भी नहीं। शिक्षा कैसी होनी चाहिये, कैसी नहीं और क्यों वगैरा पर भला मैं क्या कह सकता हूँ। इस पर शिक्षाविद् विचार करें। यह बहुत ही गंभीर और नाजुक विषय है। यह एक तरह का सॉफ्टवेयर वर्क है, अपने से नहीं होगा। मैं जरा आसान हार्डवेयर यानी ठोंक-पीट वाला काम चुन लेता हूँ। अपने स्कूल के दिनों को याद कर लेता हूँ। कुछ स्मृतियाँ हैं।
प्राइमरी स्कूल से शुरू करें। लकड़ी के फर्श पर टाट-पट्टी बिछा कर बैठते थे। सामने टीचर जी कुर्सी-मेज डाले बैठी हैं। पढ़ा या बोलकर लिखा रही हैं। कुछ समझ में नहीं आता। कुछ उनका तरीका यांत्रिक और बांकी अपना दिमाग ऐसा चिकना घड़ा कि उसमें कुछ भी अटक के न दे। कान घंटी की ओर लगे रहते थे। बीच-बीच में गधा, उल्लू, बेवकूफ, चटाक-फटाक, डस्टर फेंकने और कॉपी हवा में उछालने और ‘ऐसा गंदा बैच तो हमने देखा ही नहीं हो,’ वगैरा चलता रहता। घंटी बजी, टीचर जी क्लास से बाहर, दूसरी का प्रवेश। फिर वही।
कहा जाता था कि हिन्दी अगर मोटी टिप वाली पैन से लिखी जाये तो देखने में सुंदर लगती है। टीचरें अच्छी भली अजन्ता की निब की फर्श पर उसकी नोंक रगड़ कर ऐसी-तैसी कर दिया करती थीं। स्कूल के बरामदे में पानी से भरी एक बाल्टी और पीतल का लोटा सुबह को चौकीदार कम चपरासी भर कर रख देता था। बच्चे उस लोटे से पानी पिया करते थे। हमारी टीचरजी लोग दिन में दो-तीन बार उसी लोटे में पानी लेकर स्कूल के पिछवाड़े संकरी सी गली में न जाने क्या करने जाया करती थी। पता नहीं। नम्बर टू का वहाँ कोई चिन्ह देखने में नहीं आया और नम्बर वन में पानी भूमिका अपने को समझ में नहीं आती।
दिया हुआ काम बच्चा अगर न कर पाये तो उसे बिच्छू घास का जायका लेना पड़ता था या एक बड़ा सा पत्थर सर पर रख कर पीरियड भर धूप में खड़े रहना पड़ता था।
एक दिन हेड टीचर जी ने दरवाजे से क्लास में झाँका। अरे शीला- सुन तो। शीलाजी उनके पास गई – हाँ दीदी ? हेड टीचर कहने लगी- हाय राम, मैं पेटीकोट उल्टा पहन लाई हूँ रे आज। क्या करूँ बता तो, सीधा पहन लूँ ? शीला जी ने कहा- रहने दो हो दीदी कौन देख रहा है, घर जाकर पहन लेना। उन्हें बात पसंद आई, उल्टे से ही काम चला लिया।
एक टीचर को आदत थी कि वे अक्सर कुर्सी पर बैठी-बैठी टाँगें मय सैंडल टेबुल पर रख लेती। उनका बदन लगभग नब्बे डिग्री का कोण बना रहा होता। कई बार साड़ी का पिंडलियों की तरफ वाला हिस्सा नीचे लटक जाता और बच्चे बार-बार चोर नजरों से उसी ओर देखते रहते….
बगल ही में, बल्कि एक ही इमारत में जूनियर हाईस्कूल था। पाँचवी और आठवीं की तब बोर्ड परीक्षायें हुआ करती थीं। इस वजह से आठवीं क्लास को जरा देर तक रोक के रखा जाता था। ऐसे में पाँचवी क्लास को समय पर कैसे छोड़ा जाये। जूनियर हाईस्कूल के प्रधानाचार्य के ताने सुनने को मिलते थे। इसका एक अद्भुत तरीका शीलाओं-लीलाओं ने खोज निकाला- कि 20 तक के पहाड़े पढ़ो रे। बच्चे बस्ता बंद करके बैठ जाते। कोई एक बच्चा जिसे पहाड़े याद होते खड़ा हो कर चिल्लाता- दो इकम दो….बांकी बच्चे गला फाड़कर दोहराते। इत्तेफाकन शिक्षा विभाग का दफ्तर पास ही था, पहाड़े पढ़ने की आवाज वहाँ तक पहुँच जाती। अधिकारियों को दफ्तर में बैठे हुए ही पता चल जाता कि पढ़ाई जोरों से हो रही है। उन्हें स्कूल में आकर निरीक्षण करने के झंझट से मुक्ति मिल जाती। हमें बिना बताये पता था कि इन पहाड़ों को दोहराने के पीछे मकसद क्या है इसलिये हम इतना चिल्लाते कि स्कूल की छत उड़ जाती। गोविन्द बोलो हरि गोपाल बोलो, राधा रमण हरि….दस या हद से हद पन्द्रह का पहाड़ा होते-होते जूनियर हाईस्कूल में भगदड़ मच जाती। मिशन इज सक्सैस। जाओ रे तुम भी छुट्टी करो। बाकी कल पढ़ेंगे।
इसके बाद जूनियर हाईस्कूल में जाना पड़ा। छठी क्लास में प्रधानाचार्य एक-डेढ़ तक सिर्फ एबीसीडी और इमला लिखना सिखाते थे। उसके बाद सामान्य पढ़ाई शुरू होती। वे पीटते बहुत थे। हफ्ते में एक दिन नहीं पीटते थे- मंगलवार को। उस दिन उनका व्रत रहता था। जिस दिन वे माश की दाल खाते थे उस दिन भी नहीं पीटते थे। अलसाये से रहते थे। ऐसा दिन कभी कभार ही आता था, क्योंकि माश की दाल कोई रोज तो खा नहीं सकता ना। हमने आत्म-रक्षा के कुछ तरीके खोज लिये थे। मसलन वे गाल पकड़ कर खीचें तो मुँह का सारा थूक खींचे जा रहे गाल की ओर शिफ्ट कर दो। हाथ सन-सन जाने के डर से उन्हें गाल छोड़ना पड़ता या सर बचाने के लिये दोनों हाथों से सर को ढँक लो और उँगलियों में फँसी कलम ऊपर की ओर तनी रहे। एक बार यह तरकीब काम कर गई, पैन की निब उनकी हथेली में जा घुसी। एक बार एक मास्साब ने लड़के को परम्परागत तरीके से पीटने के बजाय उसके पेट में चाकू दे मारा। लेकिन न तो खून आया न अंतड़ियाँ बाहर निकलीं। लड़का खड़ा ही रहा, गिरा भी नहीं। दरअसल वह जादुई चाकू था जिसका फल रेडियो के एरियल की तरह अपने आप में सिमट जाता है। मास्साब गुस्सा करते-करते मसखरी कर गये।
एक मास्साब हमें कृषि विज्ञान पढ़ाया करते थे। वे न जाने क्यों हमेशा दो पायजामे पहने रहते- एक के ऊपर एक। प्लास्टिक के जूते, दो पायजामें, कुर्ता या शर्ट, कोट और टोपी- यह उनकी पर्मनेंट पोशाक थी। वे क्लास में आते- हूँ क्या है रे आज, कल क्या था ? पुस्तक निकालो। ला तो रे किताब दे तो। खुरपका मुँह पका हो गया था ? धान की खेती….हाँ चलो गन्ने की खेती लिख मारो। पैरा नम्बर 3,5,8 को छोड़ कर सब लिख मारो। अतः, फलतः, प्रायः, स्वतः और चूँकि शब्द जहाँ आएँ उन्हें मत लिखना। नहीं तो इम्तहान में इक्जामनर सोचेगा कि तुमने नकल की है। ये सब कठिन शब्द हैं। हम गन्ने या मक्के की खेती वाले पाठ को किताब से कॉपी में नकल करने लगते अतः-फलतः को छोड़ कर। मास्साब दोनों हथेलियाँ पायजामे की कमर में डाले क्लास में टहलने लगते- हस्तलेख जरा ठीक बना रे। दलिद्दर कहीं के। बीच-बीच में किसी लड़के की कमर में एकाध ठोकर लगा देते। मीलों तक गन्ना लहलहा उठता और घंटी बज जाती। हिन्दी वाले मास्साब एक दिन किसी प्रसंग में हमें बता रहे थे कि उस रात चन्द्रशेखर आजाद किसी किसान की झोपड़ी में ठहरे थे। सुबह को जब वे दातून कर रहे थे तो उन्होंने पुलिस की सीटी सुनी और फिर पुलिस से उनकी मुठभेड़ हुई। मैं किसी पत्रिका में पढ़ चुका था कि वह मुठभेड़ इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में हुई थी। चुप रहा, कौन डंडा खाये।
तो जी इस तरह पिटते-पिटाते, हँसते-खेलते अतः, स्वतः और फलतः आठवीं जमात पास कर गये। बाप ने सोचा होगा लड़का ठीक जा रहा है। कुल का नाम रोशन करेगा। कुल का नाम रोशन करना कि सरकारी नौकरी पा जाना, जो कि वे कर रहे थे। कुल-खानदान का नाम रोशन करने के लिये फीस देकर इतने सालों तक पिटने की भला क्या तुक है! समय और पैसे की बर्बादी और नतीजा अनिश्चित। इसके लिये तो मंत्री की कार में पत्थर मारना, डीएम या एसपी की बीवी-बेटी को छेड़ देना ही पर्याप्त है। जैसा चाहो वैसा नाम। नौकरी करते हुए खानदान का नाम रोशन होने की कोई गारंटी नहीं। जरूरी नहीं कि आप इतने बड़े नौकरशाह बनो कि मंत्री के साथ मिलकर करोड़ों-अरबों का घोटाला करने का अवसर आपको मिले ही। मामला खुले ही, आप मीडिया में छा ही जाओ- कोई गारंटी नहीं।
सही समय पर सही राय कोई साला देता ही नहीं। हमें शुरू से ही गलत राय और दिशा देकर भटकाया गया। घर में भी, स्कूल में भी। भटकाने वाले, सच कहें तो बेचारे खुद ही भटके हुए थे। हमें क्या भटकाते, क्या दिशा देते। दोष उनका भी नहीं। वे अध्यापक नैतिक शिक्षा की क्लास में हमें पढ़ा रहे थे कि माता-पिता की सेवा करनी चाहिये। माँ का दर्जा भगवान से भी ऊँचा होता है वगैरा। और ‘हमारे पूर्वज’ नाम की किताब में पढ़ा रहे थे कि परशुराम इतने पितृ भक्त थे कि उन्होंने पिता के कहने पर अपनी माँ की गर्दन काट डाली। इसी विरोधाभासी शिक्षा का नतीजा है कि अधिकांश बच्चों को उनकी संचयिका का पैसा वापस नहीं मिलता। मुझे तो जहाँ तक याद है, कभी नहीं मिला। शायद अच्छा हुआ वर्ना हो सकता है संचय करने की लत लग जाती।
पढ़ाया चाहे जो जा रहा हो लेकिन अपनी समझ में इतना तो तब भी आ गया था कि पितृभक्त होने में कोई बुराई नहीं, लेकिन उसके लिये परशुराम जैसा उजड्ड, विवेकहीन और शायद हाई बी.पी. का मरीज कतई आदर्श नमूना नहीं। इससे तो अच्छा कि बाप के हाथों मार खा लो। माँ गोद में बिठा कर तुम्हारे घाव सहला देगी।
इंटर कॉलेज में नवीं-दसवीं की पढ़ाई का दो-एक साल का अनुभव है। वहाँ हम फीस खा जाना, पीरियड गायब करना, स्कूल न जाकर पिक्चर जाने जैसी कलायें सीख गये।
एक दिन पूरी की पूरी क्लास स्कूल से भाग गई। नतीजतन क्लास टीचर ने हर लड़के को दो-दो रुपये का फाईन कर दिया जो कि उस जमाने में एक अच्छी रकम थी। अठन्नी और मिलाओ तो सिनेमा का टिकट आ जाता था। कुछों ने इसी तरह फाईन माफ करवा लिया तो ज्यादातर ने चुका दिया। हमारे बीच एक माई का लाल ऐसा भी था कि उसने दो रुपये क्लास टीचर की जेब से निकलवा लिये। उसने कहा- सर मैं भागा नहीं था। मैं तो स्कूल ही नहीं आया था। कैसे आता मेरी दादी मर गई थी। क्लास टीचर ने कहा- अरे अच्छा, ओ हो यार ये तो गलत हो गया। अब यार मैं माफ तो नहीं करता क्योंकि प्रिसिपल साहब भी नाराज होते हैं कि पहले फाइन करता है फिर माफ कर देता है। तु मुझसे दो रुपये ले ले, फाइन भर दे। ![]()
एक टीचर हमें गणित पढ़ाते थे। इंटरवल के बाद उनका पीरियड होता था। वे लगभग दस मिनट बाद स्टाफ रूम से निकलते। एक हाथ में चॉक का डिब्बा, दूसरे हाथ से डस्टर को अंगूठे और तर्जनी की मदद से पेंडुलम की तरह झुलाते हुए क्लास में आते- किताब निकालो, फलाँ पन्ना, फलाँ सवाल। वे क्लास की ओर पीठ किये ब्लैक बोर्ड पर सवाल हल करते जाते। पूरा ब्लैक बोर्ड भर जाता। फिर एक कोने में कॉपी बराबर जगह में सवाल हल करते। उसके बाद वे हाथ झाड़कर क्लास से मुखातिब होते- देखो तुम इम्तहान में इतना लंबा सवाल हल मत करना। तुम सिर्फ इतना करना (एक कोने में जो उन्होंने किया होता) जो इतना लंबा सवाल करे वह चूतिया है। क्या समझे ? बगल में साइंस वाले लड़के पढ़ रहे हैं, ये तरीका उनको मत बताना। बात आज तक पल्ले नहीं पढ़ी कि जब इतना लम्बा करना ही नहीं तो वे हमें करके क्यों दिखाते थे।
बस इतनी भर यादें हैं स्कूल के दिनों की। इससे आगे जिसे विश्वविद्यालय कहते हैं, वहाँ जाना नहीं हुआ। जिसके लोगो में ‘सर्वज्ञाने परिसमाप्यते’ टाइप का कुछ लिखा है। जिसका ठीक-ठीक मतलब मुझे आज तक मालूम नहीं। उन दिनों हम इसकी व्याख्या यूं करते थे- परिसर में आकर सारा ज्ञान समाप्त हो जाता है। तब छिछोरपने में की गई यह व्याख्या आज देखता, सुनता और महसूस करता हूँ कि एकदम ही बकवास तो नहीं थी।
थोड़ा सा जिक्र अपने सहपाठियों का कर लूँ। कई बार लोगों को कहते सुनता हूँ कि फलाँ मंत्री अपने साथ पढ़ता था। वो जो था हमसे एक साल जूनियर था, आज कल फलाँ जगह का कोतवाल है। अरुण तो फॉरेन सर्विस में चला गया था। आया था एक बार, बढ़िया जॉनी वॉकर लाया था। फलाँ ब्रिगेडियर हो गया है। चंदू का बिहार कैडर था। वहीं कहीं डी.एम. है आजकल। उनका कोई क्लास फैलो सेल में मैनेजिंग डायरेक्टर होता है तो कोई भेल में। ऐसी बातें सुनकर रश्क तो नहीं होता, हाँ सोचता हूँ कि भविष्य का वह मंत्री भी कभी पिटता होगा, फीस खाता होगा, गधे की पदवी से नवाजा गया होगा, तो एक तरह का सुकून महसूस होता है। अपने साथ का कोई लड़का न डी.एम. बना न मंत्री। एकाध फौज में है, एकाध मास्टर। सब के बारे में जानकारी नहीं है। बांकी कोई टैक्सी चलाता है तो कोई सड़क किनारे बैठा हर माल दस रुपये वाली चड्ढियाँ बेच रहा है। अलाँ मजदूरी करता है और फलाँ चाय की दुकान। वाइन शॉप में भी एकाध लड़का नजर आ जाता है। सब जीवन की गाड़ी खींच रहे हैं जैसे भी बन पड़ता है। और मैं ? वहीं निखद्द का निखदद् तब भी आज भी।
बहुत अच्छा लेख लिखा है उत्तराखण्ड की शिक्षा व्यवस्था पर, एकदम सही चित्रण किया है। हमारे मां-बाप सोचते थे कि लड़का रोज स्कूल जा रहा है तो सही जा रहा है, लेकिन वे यह नहीं जान पाये कि हमें पढ़ाया क्या जा रहा है। इण्टर में पहुंचने पर भी पोयम का सेन्ट्रल आइडिया हमारे लिये कविता का सार और भाव न होकर मात्र एक रटने की चीज ही रहा। क्लास में हमेशा फर्स्ट आने से हमारे अभिभावक सोचते कि हम बहुत लायक हैं, लेकिन हम अंधों के काने राजा ही थे, बस्स।
यह सब हमें तब पता चला जब हम उच्च शिक्षा के लिये बाहर गये और पाया कि हम तो भई ए बी सी डी भी नहीं जानते किसी भी विषय की। मतलब कि सब कुछ पढ़-लिखकर हम आज भी घिंघारु ही रह गये।