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    घिंघारु September 15, 2009 at 10:16 AM |

    बहुत अच्छा लेख लिखा है उत्तराखण्ड की शिक्षा व्यवस्था पर, एकदम सही चित्रण किया है। हमारे मां-बाप सोचते थे कि लड़का रोज स्कूल जा रहा है तो सही जा रहा है, लेकिन वे यह नहीं जान पाये कि हमें पढ़ाया क्या जा रहा है। इण्टर में पहुंचने पर भी पोयम का सेन्ट्रल आइडिया हमारे लिये कविता का सार और भाव न होकर मात्र एक रटने की चीज ही रहा। क्लास में हमेशा फर्स्ट आने से हमारे अभिभावक सोचते कि हम बहुत लायक हैं, लेकिन हम अंधों के काने राजा ही थे, बस्स।

    यह सब हमें तब पता चला जब हम उच्च शिक्षा के लिये बाहर गये और पाया कि हम तो भई ए बी सी डी भी नहीं जानते किसी भी विषय की। मतलब कि सब कुछ पढ़-लिखकर हम आज भी घिंघारु ही रह गये।

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