हालाँकि पिछले दिनों मीडिया ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अण्णा हजारे द्वारा चलाये जा रहे अभियान में जरूरत से ज्यादा बढ़-चढ़ कर हिस्सेदारी की, लेकिन इससे यह सच्चाई खत्म नहीं हो जाती कि मीडिया और एन.जी.ओ. देश के सबसे बड़े दुश्मन हैं, क्योंकि ये दोनों मिल कर कॉरपोरेट साम्राज्यवाद, जो भ्रष्टाचार की गंगोत्री है, के हाथ मजबूत करते हैं। ताज्जुब नहीं कि अपने भीतर पनप रहे भ्रष्टाचार को मीडिया इतनी सफाई से छुपाता है कि भोला-भाला पाठक अपने अखबार को गीता और कुरान जैसा पवित्र मान कर उसके हर शब्द पर विश्वास करता है।
2009 के लोकसभा चुनाव में बड़े अखबारों द्वारा प्रत्याशियों से भारी धनराशि लेकर उनकी प्रचारात्मक खबरें छापने का मामला पकड़ा जो ‘पेड न्यूज’ घोटाले नाम से चर्चित हुआ था। तब बहुत दबाव पड़ने से प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने मामले की जाँच करवाई, जिसमें अनेक लोकप्रिय अखबारों और उनके ख्यातनामा सम्पादकों के नाम पता चले। लेकिन अखबार मालिकों ने पूरी ताकत लगा कर 71 पेज की इस रिपोर्ट को सार्वजनिक होने से रोक दिया। इसी से जुड़ा एक मामला हाल में सामने आया है, हालाँकि एक बार फिर सारे अखबारों ने मिल कर इस खबर को दबाने की कोशिश की है। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चह्वाण ने ‘पेड न्यूज’ के संदर्भ में चुनाव आयोग द्वारा उनके चुनाव व्यय को जाँचने के अधिकार को चुनौती दी थी, जिसे दिल्ली हाईकोर्ट की दो सदस्यीय खंडपीठ ने खारिज कर दिया। इसके साथ ही ‘पेड न्यूज’ का जिन्न एक बार फिर कब्र से बाहर निकल आया है। यदि अण्णा अभियान के रूप में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ना सीख रही जनता थोड़ा जोर लगा सके तो मीडिया के कवच के भीतर पल रहे देशद्रोहियों के चेहरे बेनकाब होने की सम्भावना बन सकती है।
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