इस पखवाड़े उत्तराखंड राज्य के गठन को दस साल पूरे हो जायेंगे। एक दशक के इस सफर में कई बुनियादी और बड़े सवाल पीछे छूट गये हैं जिनका हल खोजा जाना अभी बाकी है। इन्हीं में से एक सवाल उत्तराखंड की असली राजधानी का भी है। पृथक राज्य की लड़ाई के साथ ही आंदोलनकारियों ने तय किया था कि इस राज्य का नाम ‘उत्तराखंड’ और इसकी राजधानी ‘गैरसैंण’ होगी, लेकिन राज्य गठन के दौरान भाजपा ने इस अवधारणा को छिन्न-भिन्न करते हुए राज्य को ‘उत्तरांचल’ और देहरादून को अस्थायी राजधानी बना दिया। तब से लेकर आज तक प्रदेश की राजधानी का मुद्दा हल नहीं हो पाया है। अब तो राज्य आंदोलनकारी, क्षेत्रीय दल और संगठन भी इस मुद्दे को भूल गये हैं। भले ही गैरसैंण के सवाल पर कहीं से कोई आवाज न आ रही हो लेकिन उत्तराखंड के कुछ युवा इंटरनेट के माध्यम से इस सवाल को मजबूती से उठा रहे हैं। ‘मेरा पहाड़ डॉट काम’ द्वारा गैरसैण राजधानी के सवाल पर शुरू किये गये ‘उत्तराखंड की राजधानी गैरसैंण’ फोरम में चल रही बहस में अब तक 400 लोग भाग ले चुके हैं। सबसे ताजा टिप्पणी में पिथौरागढ़ के पंकज सिंह महर ने लिखा है, ‘‘समस्या अगर उत्तराखंड की राजधानी को लेकर है तो उसका समाधान गैरसैंण है।’’
मेरा पहाड़ बेवसाइट में ‘उत्तराखंड की राजधानी गैरसैण’ फोरम की शुरूआत करने वाले इंजीनियर हेम पंत का कहना है कि उत्तराखंड और उत्तराखंड से बाहर रहने वाले उत्तराखंडियों को गैरसैंण के सवाल पर जागरूक करने के लिए इस फोरम की शुरूआत की गयी है। बाहर रह रहे अधिकांश लोग यह नहीं जानते कि देहरादून उत्तराखंड की अस्थायी राजधानी है। 2009 में गैरसैंण राजधानी के सवाल पर ‘क्रियेटिव उत्तराखंड’ द्वारा दिल्ली से गैरसैंण की यात्रा के संयोजक रहे हेम पांडे मानते हैं कि जब एक जल विद्युत परियोजना के लिए नई टिहरी का नया शहर बस सकता है तो एक प्रदेश की राजधानी के लिए गैरसैंण क्यों नहीं। वे कहते हैं कि उत्तराखंड राज्य का आंदोलन गैरसैंण राजधानी को आधार बनाकर ही किया गया था, लेकिन अब इसे महज एक मुद्दा बना दिया गया है।
फोरम से जुड़े दिनेश बिजल्वाण कहते हैं कि गैरसैंण उत्तराखंड के लोगों द्वारा प्रस्तावित राजधानी है। लेकिन दुर्भाग्य है कि लोकतंत्र में राजनीति एक शक्ति होती है। उसी शक्ति को इस विषय से अरुचि हो गयी है, जिससे यह मात्र एक मुद्दा बनकर रह गया।
फोरम में गैरसैंण राजधानी के सवाल पर लिखा गया है कि ‘‘गैरसैंण जगह नहीं, आत्मा है उत्तराखंड की।’’ इसी तरह से एक टिप्पणी में याद दिलाया गया है कि दीक्षित आयोग के सामने भी 64 प्रतिशत लोगों ने गैरसैंण को राजधानी के लिए उपयुक्त बतलाया गया था। फोरम की एक विशेषता यह है कि इसमें गैरसैंण के लिए रचे गये गीतों और कविताओं को भी जगह दी गयी है। आप फोरम में गैरसैंण के सवाल पर गाया गया गीत ‘तुमनी सुना, मिन सुन्याली’ और दिनेश ध्यानी की कविता ‘गर हो सके तो गैरसैंण की बात कर’ भी पढ़ सकते हैं। दिनेश ध्यानी लिखते हैं, ‘‘करनी है भाषण नहीं बात कर/ समय से साक्षात्कार कर/और कुछ नहीं सुनना हमें/ बात छिड़ी है गैरसैंण की/ उसकी बात कर/ तुम्हारे अपने सरोकार/ तुम्हारी अपनी सरकार/ हमारी गैरसैंण की बात/ जनता को गैरसेंण की दरकार/गैरसैंण हमारा अपना है…/ गैरसैंण की बात कर/ गैरसैंण की बात कर।’’
फोरम से जुड़े धीरज अधिकारी का कहना है कि बीते साल बिपिन त्रिपाठी की पुण्यतिथि 28 अगस्त को दिल्ली से रुद्रपुर, द्वाराहाट, चौखुटिया होते हुए गैरसैंण तक यात्रा निकाली गयी थी, जिसमें 50 से अधिक समाजकर्मियों, साहित्यकारों, पत्रकारों और आंदोलनकारियों ने भाग लिया था। उन्होंने कहा कि गैरसैंण राजधानी के लिए पूरी तरह उपयुक्त है। बस राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है। उन्होंने कहा कि यात्रा में शामिल लोगों ने गैरसैंण में वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली की प्रतिमा के सामने राजधानी गैरसैंण की प्रतिबद्धता दोहरायी थी, जो अभी पूरा होना बाकी है।
इसके अलावा सोशल नेटवर्किंग साइट “ऑरकुट’ पर गैरसैंण के सवाल पर जोरदार बहस चल रही है। वहाँ भी सैकड़ों लोग इस मुद्दे पर बात कर रहे हैं। उत्तराखंड के युवाओं का यह प्रयास, कम से कम इंटरनैट पर राजधानी के मुद्दे को जीवित रखे हुए है।