जोशी जी चाहें तो हाजिर हो भी जाएँ। पर किसलिए, जब कोई बुलाना ही नहीं चाहता ? यह किसी नाटक की पटकथा का अंश नहीं बल्कि उत्तराखण्ड की व्यथा है ? उत्तराखंड से पलायन का रोना आम से खास तक सब रोते आ रहे हैं। उत्तराखण्ड की जनसंख्या के बराबर ही देश और विदेश में प्रवासियों की संख्या है। अपनी धरती के प्रति अनुराग एक मायने में यहाँ के निवासियों से अधिक प्रवासियों में है। अपने घर छोड़कर अन्यत्र बसेरा कर लेने पर हम उन्हें जितना भी गरियायें, पर सच यह है कि उन्हें स्वीकार कर लेने का माद्दा भी हममें नहीं है। हमारे स्वार्थ आड़े आते हैं। जोशी जी की यही कहानी है।
डॉ. मोहन चन्द्र जोशी सन् 64 में नैनीताल से एम.एस.सी. कर शोध हेतु बड़ौदा विश्वविद्यालय गए तो वहीं के होकर रह गये। उनकी विद्वता की कद्र गुजरात ने की। गुजरात आयुर्वेद विश्वविद्यालय में औषधीय पादप विज्ञान के, जाम नगर विश्वविद्यालय में वनस्पतिविभाग के संयोजक व प्रोफेसर रहे। गुजरात आयुर्वेद शोध परिषद ने उन्हें अपना फेलो नियुक्त किया। सन् 2001 में सेवानिवृत्ति के बाद आजकल वैज्ञानिक पुस्तक लेखन में सक्रिय हैं।
70 वर्षीय जोशी अध्ययन – अध्यापन के साथ वर्षों से ‘उत्तराखण्ड सांस्कृतिक संगम, बड़ौदा’ के मुख्य सचेतकों में से एक हैं। इसी संगम के तहत बड़ौदा में उत्तराखण्डी संगठित हैं। गुजरात के अन्य शहरों में प्रवासी संस्थाओं से भी इस संस्था का तालमेल बना हुआ है। कोई उनसे एक बार मिले तो निश्चित ही इच्छा होगी कि ऐसा धुरंधर तो नवोदित उत्तराखंड राज्य में होना चाहिए था। भावुक प्रवासी की तरह डॉ. मोहन चन्द्र जोशी के दिल में इच्छा हुई कि प्रवासियों की विशेषता का योगदान प्रत्यक्ष रूप से उनके अपने गृह राज्य को मिले, तो आज से दो साल पहले काबीना मंत्री प्रकाश पन्त को एक पत्र लिख डाला। मजमूँ यह था कि उत्तराखण्ड के विद्वान और विचारवान लोग राज्य से बाहर अच्छी खासी संख्या में हैं। राज्य सरकार द्वारा इतनी बड़ी संख्या को नजरअंदाज करना ठीक नहीं है। इस वास्ते एक नोडल ऐजेंसी बनाई जाए, जो सरकार और प्रवासी संस्थाओं के बीच समन्वय स्थापित करे। मसलन, प्रवासी बिना किसी खर्चे के यात्रा-पर्यटन जैसे अनेक क्षेत्रों में पथ-प्रदर्शक हो सकते हैं। चूँकि भारत भर से इस राज्य में यात्रियों-पर्यटकों का आवागमन बना रहा है। एक और सुझाव यह भी कि यदि राज्य सरकार को प्रवासियों से किसी भी प्रकार की सेवा या विशेषज्ञ सलाह की आवश्यकता हो तो वे सहर्ष स्वीकार करेंगे। राज्य से बाहर यहाँ की संस्कृति भाषा आदि का प्रचार-प्रसार भी प्रवासी करते ही आ रहे हैं।
मंत्री महोदय ने डॉ. जोशी की भावनाओं की इतनी कद्र अवश्य की कि तीन पंक्तियों का एक शिष्ट पत्रोत्तर भेजा। यह संक्षिप्त पत्र पाकर जोशी जी दूसरा पत्र लिखने की हिम्मत न जुटा सके। गुजरात सरकार ने आयुर्वेद शोध स्थापना के लिए इज्जत से उन्हें बुलाया। वे गए और जमकर काम किया। उन्होंने भी बड़ौदा को अपनाया। वहाँ कभी उन्हें वह परायापन नहीं लगा, जितना मंत्री महोदय के उत्तर से।
अब डॉ. मोहन चन्द्र जोशी उत्तराखण्ड में हाजिर हो भी जाएँ तो क्या हो जाएगा ? राज्य सरकार ही यह नहीं चाहती। यहाँ तो विशेषज्ञता के लिए टेंडर मागे जाते हैं और खेल कमीशन तक जाता है। बतौर औषधि-पादप विशेषज्ञ जब उनसे उत्तराखण्ड को ‘जड़ी-बूटी प्रदेश’ बनाने के नारों के बारे में राय देने को कहा जाता है तो वे विस्तार से हर पहलू समझाते हैं। सन् 1948 में पं. गोविन्द बल्लभ पंत जी ने उत्तराखण्ड में जड़ी बूटी संग्रह, विपणन और कृषि के हित में फार्मेसी की नींव रखी। 1990 में गोपेश्वर में जड़ी-बूटी शोध संस्थान बनाया गया। उद्देश्य ठीक था पर मंशा क्या है। सब अपनी-अपनी ढपली पर अपना अपना राग बजा रहे हैं। आज तक इन कार्यक्रमों को कितनी लोकप्रियता मिली ? नहीं मिली तो क्यों नहीं ? यहाँ तो अभी तक पता ही नहीं चल पाया कि कौन सी जड़ी-बूटी की आवश्यकता राज्य को है ? और तो और ‘ग्रान्ट’ खाने-पाने के चक्कर में सुगन्धित तेल निकालने को भी जड़ी-बूटी में शामिल कर लिया जाता है। जड़ी-बूटियाँ जंगल में उपजती हैं। अलग वातावरण में अनुकूलन का समय चाहिए। बीज की आपूर्ति, बोने, काटने, शोधन संरक्षण की तकनीक ज्ञात होनी चाहिए। सब्र का काम है, हवाबाजी और नारेबाजी से कुछ नहीं होगा।
70 वर्ष की वय में शोध- लेखन-प्रकाशन के साथ ही उत्तराखण्ड सांस्कृतिक संगम बड़ौदा को सक्रिय सहयोग दे रहे हैं। संगम की ओर से साल में बड़ा कार्यक्रम आयोजित होता है। निःशुल्क चिकित्सा शिविर, रक्तदान शिविर अक्सर लगाए जाते हैं। उत्तराखण्ड के प्रवासी छात्रों के लिए छात्रवृत्ति का प्रावधान संगम ने किया हुआ है। यहाँ तक कि एक ऐसा आपातकालीन कोष प्रवासियों ने बनाया है कि तीस-चालीस हजार रुपए किसी भी समय उपलब्ध हो सकते हैं, मसलन कभी यात्रा में किसी उत्तराखण्डी की जेब कट जाए, चोरी हो जाए। बीमार होने पर तुरन्त सहायता उपलब्ध करवा दी जाती है। जोशी जी बताते हैं कि संगम का प्रमुख्य उद्देश्य उत्तराखण्डी प्रवासियों को संगठित रखना और अपनी संस्कृति और भाषा को जिन्दा रखना है।
सौभाग्य है कि उत्तराखण्ड से डॉ. जोशी का नाता बरकरार है। पारिवारिक कार्यों में सहभाग करने वे वर्ष में तीन-चार बार हल्द्वानी, नैनीताल आते ही हैं। हम जैसों के लिए यह सुखद है। पर दुःखद है कि हम अपने लोगों की कद्र कौड़ी भर नहीं समझते। ऐसे मोहन जोशियों को हमारे अपने स्वार्थ दूर ही रखना बेहतर समझते हैं। झूठे अपनत्व के लिए मंत्री के उत्तर की तरह कह देते हैं बस उत्तराखण्ड की संस्कृति-भाषा का प्रचार-प्रसार करते रहिए। यहाँ तो सब मिटता जा रहा है। पर सब ठीक चल रहा है। जबकि देवभूमि में ‘ठेकेदार संस्कृति’ के सर्वशक्तिमान हो जाने के बाद हम नहीं बल्कि ये प्रवासी ही उत्तराखण्ड की संस्कृति-भाषा के असली ध्वजावाहक बने रहेंगे।
मोहन जी ने नोडल एजेंसी वाला सुझाव बहुत अच्छा दिया है। आज विभिन्न क्षेत्रों में उत्तराखण्ड के कई नामचीन और विज्ञ व्यक्ति हैं, जिनके अनुभवों का लाभ सरकार को लेना चाहिये। लेकिन वर्तमान सरकार जिस मंशा के साथ विजन-मिशन लैस होकर काम कर रही है। उसके जरिये तो यह हो पाना असंभव ही है। क्योंकि इस सरकार की कोई इच्छाशक्ति ही नहीं है, जिस सरकार का मिशन उत्तराखण्ड के वंचित आदमी तक मूलभूत सुविधा और अवस्थापना सुविधा देने के बजाय मात्र २०१२ के चुनाव का मिशन हो, उससे क्या उम्मीद की जा सकती है।
मजे की बात यह भी है कि अपने इस मिशन को सरकार अपने गठन के दिन से ही प्रचारित-प्रसारित करती रही है, और कहीं कोई प्रतिउत्तर नहीं, यहां तक कि मुख्य विपक्षी दल को भी इस मिशन पर एतराज नहीं, हो भी क्यों, उसके पास कौन सा मिशन है।
प्रवासी उत्तराखण्डियों का राज्य के निर्माण में भी बड़ा योगदान रहा है और राज्य के विकास में भी वह महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं. लेकिन इस उदाहरण से स्पष्ट है कि स्वयं आगे बढ कर सहायता का प्रस्ताव देने पर भी सरकार के प्रमुख मन्त्री ने उन्हें यथोचित प्रतिक्रिया नहीं दी. होना तो यह चाहिये थाकि सरकार के वरिष्ट नौकरशाह या स्वयं मन्त्री जी को जाकर जोशी जी से मिलना चाहिये था.
हरगोविन्द खुराना को भारतीय लोगों ने तब इज्जत देना शुरु किया जब उन्हें अमेरिकी नागरिक के तौर पर नोबल मिला. भारत में तो उन्हें अपनी प्रतिभा के हिसाब से नौकरी भी नहीं मिल पायी थी. ऐसी कई प्रतिभाएं सरकार के साथ मिलकर उत्तराखण्ड के हित में काम करना चाहती हैं लेकिन सरकार शायद “घर की मुर्गी दाल बराबर” वाले फार्मूले पर चल रही है.