लोक संस्कृति के संरक्षण के लिए प्रदेश सरकार की गंभीरता का अंदाजा ढोलवादक मोलूदास की असमय मौत से लगाया जा सकता है। अपने चहेतों को यूँ ही लाखों रुपए दे देने वाली सरकार को उनके इलाज की सुध भी नहीं आई।
मोलूदास को लकवा पड़ने के बाद श्रीनगर के बेस अस्पताल में भर्ती करवाया गया। वहाँ इलाज की उचित सुविधा न मिलने पर 27 सितम्बर 2011 को उन्हें देहरादून के दून अस्पताल भेज दिया गया। एक अक्टूबर को वे कोमा में चले गए। उनका इलाज कर रहे न्यूरो फिजीशियन डॉ. नवीन आहूजा, न्यूरो सर्जन डॉ. अरविन्द ममगाई और आई.सी.यू. के प्रभारी डॉ. मनु जैन के अनुसार, ‘‘मोलूदास के मस्तिष्क के दोनों हिस्से क्षतिग्रस्त हो गए थे। मस्तिष्क में क्लॉटिंग से खून का प्रवाह बाधित हो गया था। फेफड़ों में पानी भर गया था।’’ 2 अक्टूबर को कोमा में ही 65 वर्षीय मोलूदास ने आखिरी साँस ली। उनके परिवार में पत्नी फ्यूनी देवी, दो बेटे और तीन बेटियाँ हैं।
मोलूदास का जन्म 1946 में रुद्रप्रयाग जिले के फलासी गाँव में हुआ था। परम्परा में मिली कला को विकसित करने में उन्होंने अपना पूरा जीवन लगा दिया और 18 ताली नौबत की परम्परा को कड़े अभ्यास के बाद जीवित रखा। गढ़वाल में सामान्य तौर पर 9 ताली नौबत ही बजाई जाती है। लेकिन अलकनंदा और मंदाकिनी घाटियों के बीच के नागपुर क्षेत्र में 18 ताली नौबत बजाने की परम्परा है। मोलूदास इस नौबत को बजाने वाले अंतिम ढोलवादक थे। नागपुरी नौबत में बाघ और शमशान ताल भी बजाई जाती है। इन तालों को बजाते समय दमाऊ वादक को बाँस से बनी एक विशेष कंडी से ढककर दमाऊ बजाना पड़ता है। लोगों का विश्वास है कि ऐसा न किया गया तो दमाऊ वादक दमाऊ बजाते-बजाते गायब हो जाएगा। मोलूदास अपनी कला में इतने पारंगत थे कि उन्हें सुन चुके 80 वर्षीय विनोद राणा कहते हैं, ‘‘वे 18 ताली नौबत बजाते हुए हवा में उड़ने लगते थे।’’
मोलूदास पाण्डव लीला, गोरील, ऐड़ी-आँछरी, बगडवाल और नागराजा नृत्यों के धुनों को बजाने में भी पारंगत थे। तुंगनाथ मंदिर समूह के देवता भी मोलूदास की नौबत बजने के बाद ही जागृत होते थे। मोलूदास जिन 18 तालों की नौबत बजाने में पारंगत थे, वे हैं ठोकण ताल, गणेश ताल, नागतोल ताल, शबद ताल, रथ ताल, शकलीकरण ताल, हनुमान पुच्छ ताल, धुँयाल की पाँच ताल, रैमानी ताल, सरौं ताल, उठौंण ताल, चण्डौं ताल, हनुमान बगौटिया ताल और सैंदार ताल। अपने जिस ढोल से मोलूदास नौबत बजाया करते थे, उसकी वे विशेष देखभाल करते थे। उन्हें हमेशा अपने ढोल को नुकसान पहुँचने या चोरी चले जाने का डर सताता रहता था। इसी चिंता के कारण उन्हें ओ.एन.जी.सी. (देहरादून) में उनके कार्यक्रमों में आने पर एक अलग कमरा दिया जाता था।
ऐसे अद्भुत लोक कलाकार के अस्पताल में भर्ती होने पर कोई भी महत्वपूर्ण नेता उन्हें देखने नहीं गया। दैनिक हिन्दुस्तान के श्रीनगर संवाददाता विमल पुर्वाल का मोलूदास का समाचार जब 26 सितम्बर 2011 को प्रकाशित हुआ, तब जाकर राज्य का संस्कृति विभाग जागा और उसने 15 हजार रुपए की आर्थिक सहायता दी। कुछ संस्थाओं और व्यक्तियों ने भी इस समाचार के प्रकाशन के बाद अन्तिम समय में उन्हें आर्थिक मदद दी। प्रदेश सरकार ने मोलूदास की तो कोई सहायता नहीं की, मगर 23 सितम्बर 2011 को ऋषिकेश में अपने घर में संदिग्ध परिस्थितियों में जली भाजपा की स्थानीय नेता गीता शंकर के इलाज का सारा खर्चा उठाने की घोषणा मुख्यमंत्री भुवनचन्द्र खण्डूड़ी ने अवश्य की। वे शोक व्यक्त करने गीता शंकर के घर भी पहुँचे। हाँ, मोलूदास की मौत पर संवेदना के दो शब्द भी उन्होंने नहीं कहे।