महिला जागृति महासंघ धारी और रामगढ़ (जिला नैनीताल) ने अपने क्षेत्र की समस्याओं के प्रति जनता का ध्यान खींचने तथा उनको जोड़ने के उद्देश्य से 17 से 22 जनवरी तक पदयात्रा की। लगभग 5 सालों से ये संगठन इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं। महिला उत्पीड़न के मामलों से शुरू होकर अब ये जल, जंगल और जमीन के मुद्दे उठा रहे हैं। यह क्षेत्र फल पट्टी के रूप में प्रसिद्ध है। सेब, आड़ू, पुलम तथा आलू उत्पादन यहाँ का मुख्य व्यवसाय है। दूसरी विषेशता यहाँ की यह है कि इस पूरे क्षेत्र से हिमालय के भव्य दर्शन होते हैं तथा मैदानी क्षेत्र से भी पहाड़ का यह इलाका अधिक दूर नहीं है। इन कारणों से इधर के 10-15 वर्षों में यहाँ की अधिकांश जमीन बाहरी लोगों के हाथ बिकती जा रही है।
बाहर से आकर उत्तराखण्ड में लोगों के बसने का सिलसिला पुराना है। परन्तु अब व्यावसायिक उद्देश्य से कॉटेज बनाकर बेचने के लिए जो बिल्डर आये हैं वे पहाड़ की संस्कृति तथा जनजीवन को अपने धनबल के आधार पर ध्वस्त करने लगे हैं। समस्याएँ यहीं से शुरू हुई हैं। खपराड़ नामक जगह पर एक पूरा इलाका गणेश राणा ने खरीदा है। पहले यह टाटा का था उन्होंने अपने मैनेजर खिमका को बेचा। खिमका ने यहाँ बगीचा बनवाया पर अब यह गणेश राणा की मिल्कियत है जिसने बगीचा खत्म कर फ्लैट बनाकर बेचना शुरू किया है। राणा की जमीन से ऊपर की ओर लाट जंगल (रिजर्व फारेस्ट) है जहाँ से आस-पास के गाँवों की महिलाएँ सूखी पत्ती (पतेल) तथा घास लाती हैं। जिसका रास्ता अब राणा ने तार-बाड़ लगाकर बन्द कर दिया है जबकि यह काठगोदाम-मुक्तेश्वर पैदल मार्ग है जिसकी देख-रेख जंगलात विभाग किया करता था। पुराने समय में यही रास्ता घोड़ाखाल मन्दिर के लिये भी था। खपराड़ के गधेरे से ही नीचे के चार-पाँच गाँवों में पानी जाता है जो कि पुरानी एलएसजीईडी की लाइन है। परन्तु इस बीच महिलाओं ने एक दिन पाया कि उस गधेरे में पानी जमा करने के लिए काफी बड़ा टैंक बनाया जा रहा है। एक और भारी निर्माण कार्य दुत्कानेधार में चल रहा है। वहाँ पर भी बगीचा काटकर फ्लैट बनाये जा रहे हैं। मुरारी लाल साह नामक बिल्डर वहाँ फ्लैट बना रहा है। उसी की जमीन से लगा गाँव वालों का मन्दिर है तथा वन पंचायत का जंगल है। मन्दिर के आगे से मुरारी साह ने पत्थर निकलवाये और वहाँ गड्ढे बन गये। मजदूरों ने जंगल में गन्दगी की। इससे परेशान होकर महिलाओं ने वहाँ भी माँग उठाई। दुत्कानेधार में भी पेड़ काटे गये। मुरारी साह ने लिखित आश्वासन के बावजूद कुछ किया नहीं।
ये समस्याएँ महिला जागृति महासंघ की बैठकों में लगातार उठती रहीं। साथ ही गाँव के पुरुषों ने पटवारी तथा सरपंच के साथ सामूहिक बैठकें भी की। 2009 के जून महीने से महिलाओं ने पटवारी, कानूनगो, तहसीलदार, एस. डी.एम. और फिर जिलाधिकारी तक अपनी गुहार पहुँचायी। परिणामस्वरूप खपराड़ के गधेरे में बन रहे टैंक पर एस.डी.एम. ने रोक लगवा दी। परन्तु राणा ने लाट जंगल जाने का रास्ता बन्द कर दिया जिससे कई गाँवों की महिलाओं को परेशानी हो रही है। अब राणा की ओर से कहा जा रहा है कि गधेरे का पानी उसे दिया जाये तो वह रास्ता खुलवा देगा। मुरारी साह ने लिखित आश्वासन देने के बावजूद कुछ नहीं किया।
जागृति महासंघ ने महसूस किया कि इस मुद्दे पर पूरा जनसमर्थन नहीं मिल रहा है। साथ ही जल-जंगल-जमीन से परस्पर जुड़े हुए अन्य कई मुद्दे हैं जो बाहरी बिल्डरों के कारण उत्पन्न हो रहे हैं। इसलिए एक गाँव से दूसरे गाँव तक पदयात्रा का एक क्रम बनाया गया जिसमें युवा साथी, महिलाएँ तथा सामाजिक कार्यकर्ता साथ-साथ चले। महिला जागृति महासंघ ने कई तैयारी बैठकें की। यात्रापथ निश्चित किया तथा यात्रियों के रहने तथा भोजन की व्यवस्था का जिम्मा लिया। उन्होंने इसके लिए अपने-अपने क्षेत्र में चन्दा भी किया। यात्रा की शुरूआत 17 जनवरी को सतबुंगा में शिशु मन्दिर की छत पर बैठक के साथ हुई। तीन घंटे तक चली बैठक में क्षेत्र से जुड़ी अनेक समस्याएँ सामने आईं। लोगों ने स्वीकार किया कि महिलाओं का जंगलों के साथ गहरा रिश्ता है। वे कभी जंगलों को नुकसान नहीं पहुँचाती, पुरुष भले ही पहुँचा रहे हैं। अपनी जमीन बेचकर पहाड़ के लोग आज गुलाम होते जा रहे हैं। आने वाले दिनों में हो सकता है हमें यहाँ पैर भी न रखने दिया जाय। जमीन बेचने के बाद जो रिजॉर्ट बन रहे हैं उनमें उन्हें चौकीदार की नौकरी भी नसीब नहीं होती। बिल्डर लोग अपने यहाँ पंजाब, हरियाणा से गार्ड लाते हैं तथा बिहार, रामपुर के और नेपाली मजदूरों को काम पर लगा रहे हैं। एक महीना दस दिन तक काम करने पर मजदूरों को तीस दिन की मजदूरी दी जाती है ताकि वह अगले तीस दिन और काम करें।
महिलाओं को जंगल जाने में डर है तो बच्चों को स्कूल जाने में डर है। जब लोग बात करने गये तो राणा के आदमियों ने कहा कि हम गाँव के लोगों को, सरपंच को, प्रधान को किसी को नहीं जानते। हम प्रशासन को जानते हैं, प्रशासन की अनुमति से कर रहे हैं। महिलाएँ तत्कालीन वन संरक्षक से भी मिलीं। उन्होंने दौरा किया पर उनका स्थानान्तरण हो गया। वक्ताओं ने यह भी बताया कि हरतोला, लेटीबुंगा जैसे कुछ गाँव ऐसे हैं जहाँ लोग जमीनें बेचकर हल्द्वानी चले गये हैं। अब वहाँ युवाओं, महिलाओं के संगठन भी नहीं बन पा रहे हैं। धारी की अपनी अदालत की सदस्या मोहिनी बिष्ट ने बताया कि पदमपुरी, धारी में भी ये समस्याएँ उठ रही हैं। ग्राम अक्सौड़ा में भी वन पंचायत की जमीन में खनन कर दिया है तथा पुश्तैनी रास्ता बन्द कर दिया गया है।
ग्राम गल्ला की दीपा बिष्ट ने कहा कि हम पिछले नौ महीनों से निरन्तर संघर्ष कर रहे हैं परन्तु हम पर व्यंग्य किया जाता है कि तुम ले आये पानी ? तुमने खोल दिया रास्ता ? सतबुंगा के ग्राम प्रधान ने बताया कि पहले भी राणा ने बुल्डोजर चलवाया था पर आपत्ति करने पर हटवा दिया था। नक्शे में जो रास्ते हैं उन्हें ये बिल्डर बन्द नहीं कर सकते। सतबुंगा की तारी देवी ने बात उठाई कि वन पंचायत की जमीन का सीमांकन किया जाना चाहिए। महिला जागृति संघ बेतालघाट की भगवती बोरा ने कहा कि जल-जंगल, जमीन ही हमारी पहचान, सम्पत्ति है। जरूरत इस बात की है कि हमारी युवा पीढ़ी पलायन न करके उसका अच्छा प्रबन्धन करे। दिल्ली-लखनऊ में हमारे लिये कुछ नहीं रखा है। यह मुद्दा केवल रामगढ़, धारी का नहीं, पूरे उत्तराखण्ड का है। उत्तराखण्ड महिला मंच की मल्लिका विर्दी ने कहा कि आज शहरी भारत और ग्रामीण भारत का विभाजन हो गया है। ग्रामीण भारत की कीमत पर शहरी भारत एशोआराम के साधन जुटा रहा है। संसाधनों की इस लूट के खिलाफ हमारी लड़ाई है। उन्होंने बताया कि सीमान्त क्षेत्र में गोरी नदी पर आठ बड़े बाँध बनाये जा रहे हैं और गाँव उजाड़े जा रहे हैं। वहाँ जनतंत्र नहीं कम्पनी का राज चल रहा है। जन प्रेरणा संगठन के हरीश लोधियाल ने आह्वान किया कि जैसे पिरूल में आग लगती है वैसे ही इस लड़ाई को अब पूरे उत्तराखण्ड में फैलना चाहिए। ‘विमर्श’ की हेमा कबड्वाल ने बताया कि शीतला में मेरे बुढ़े माता-पिता के जमीन के कागजात जब्त करके एक बिल्डर ने उन्हें जमीन बेचने को मजबूर किया और उन्हें विस्थापित होना पड़ा। बूड़ीबना की ग्राम प्रधान बीना देवी ने कहा कि सतबुंगा वन पंचायत के सरपंच ने कहा कि सात दिन के भीतर वे रास्ता खुलवा देंगे पर ऐसा नहीं हुआ। गड़ गाँव के गोविन्द सिंह ने कहा कि काश्तकारी अलाभकर होने से लोग जमीन बेच रहे हैं और जो पैसा मिल रहा है वह शराब में जा रहा है। जो लोग राणा का नमक खाते हैं, वे उसके खिलाफ नहीं बोल रहे हैं।
17 की रात यात्री पाटा गाँव में रहे चर्चा के दौरान महिलाओं ने बताया कि जब उन्होंने खपराड़ के गधेरे में टैंक बनता हुआ देखा तो ग्राम पंचायत में इसकी चर्चा की। वहाँ इस बात पर समझौता करने की बात उठी कि टैंक बनने दो। जंगल का रास्ता खोल दिया जायेगा क्योंकि जबसे टैंक का निर्माण रुका है तबसे जंगल का रास्ता बन्द है। राणा ने कहलवाया है कि नीचे के गाँवों के लिए एक पाइप लाइन दे देंगे परन्तु महिलाएँ तथा ग्रामीण इस पर सहमत नहीं हैं। उनका कहना है पानी के स्रोत पर टैंक, जिसे वे डैम कहते हैं, बनाने का अधिकार बिल्डर को कतई नहीं है भले ही वह अपनी जमीन पर उसे बनाये। लोगों को आशंका है कि यह डैम कभी टूटा तो नीचे के गाँवों में तबाही मच जायेगी। स्वजल परियोजना के तहत गधेरे में जो छोटी-सी पानी की टंकी बनी है, उस समय खिमका सेठ की ओर से अनापत्ति प्रमाण पत्र है जिसमें कहा गया है कि यह स्रोत उसकी जमीन से बाहर है। यह भी मालूम चला कि यहाँ की वन पंचायत में महिला पंच केवल एक है जबकि चार महिला पंच अनिवार्यतः होनी चाहिए। जो पंच है उनको भी रॉयल्टी के बारे में कुछ नहीं मालूम। यह भी सवाल उठ रहा है कि पाँच हजार की रॉयल्टी लेने का अधिकार वन पंचायत को है?
18 जनवरी को लगभग पैंतीस-चालीस पदयात्रियों के समूह ने दुत्कानेधार में चल रहे निर्माण कार्य तथा खपराड़ में गधेरे में पानी के स्रोत, टैंक की दीवारें तथा क्लाउड नाइन के लिये किस तरह पानी ले जाया जा रहा है, इस सब का निरीक्षण किया। दुत्कानेधार में फ्लैट भी बन रहे हैं और फलों के पेड़ भी बीच-बीच में खड़े हैं। अधिकांश पेड़ काट दिये गये हैं जबकि कानूनन फलों के पेड़ काटकर मकान नहीं बनाये जा सकते। मुरारी साह को बुलवाया गया तो उन्होंने स्वीकार किया कि मन्दिर के पास की जमीन अभी तक समतल नहीं की गई है। उनका कहना था कि पाँच हजार रुपया सतबुंगा ग्राम पंचायत को मैंने रॉयल्टी दे दी है। पर वे रसीद दिखाने में टाल-मटोल करते रहे। यह बगीचा तल्ला रामगढ़ के विक्रम सिंह जी का था। अब इसमें सवा-सवा नाली जमीन पर 12 फ्लैट बन रहे हैं जो सब पहले ही बिक चुके हैं। एक पूरा गाँव ही यहाँ पर बस रहा है। मुरारी साह से यह पूछने पर कि यहाँ पानी की क्या व्यवस्था है, उत्तर मिला कि इस टैंकर में भरकर तल्ला रामगढ़ से ला रहे हैं। लोग यहाँ रहने लगेंगे तब भी पानी टैंकर से ही आयेगा।
खपराड़ क्षेत्र में क्लाउड नाइन के साइट इंचार्ज महिन्द्र सिंह ने बताया कि जंगल को रास्ता खुला है। पानी का टैंक हमारी अपनी जमीन पर बन रहा है। उन्होंने कहा कि मजदूरों के लिए शौचालय बने हुए हैं। केवल पचास-साठ मजदूर काम कर रहे हैं। जबकि यात्री स्वयं नीचे जाकर देख आये कि टैंक का निर्माण वन पंचायत की जमीन से ही शुरू किया गया था। बाद में स्रोत को समेटते हुए वह उसकी अपनी जमीन में किया जाता। जंगल का मार्ग भी कंटीले तारों की बाड़ लगाकर बन्द किया गया था जिसे यात्री दल ने उस समय तोड़ दिया और जंगल की ओर से घास लेकर आ रही महिलाओं को आने दिया।
दिन में लोधिया गाँव में हुई बैठक में भी यही आम राय बनी कि यदि हम एकजुट होंगे तो क्लाउड नाइन के मालिक राणा को रास्ता भी खोलना पड़ेगा और पानी का स्रोत भी। ग्राम तथा वन पंचायत के कार्यों में भी नियमितता होनी चाहिए। वरना ऐसी गडबड़ी होती हैं। सरपंच तथा ग्राम प्रधान के कामों में भी पारदर्शिता होनी चाहिए। ग्राम प्रधान यदि अनुमति न दे तो कोई बिल्डर गाँव के पानी से छेड़छाड़ नहीं कर सकता परन्तु ग्राम प्रधान क्या कर रहे हैं यह गाँव वालों को नहीं मालूम। बिल्डरों से कुछ भी आपत्ति करने पर वे गाँव वालों से कहते हैं नक्शा लेकर आओ तब बात करो। शक्लो सूरत से लेकर कानूनी बातों से डराया जाता है यह बात बार-बार सामने आ रही थी।