बहुत कम लोगों को पता होगा कि मुक्तेश्वर (नैनीताल) का नाम एक ऐतिहासिक उपलब्धि से जुड़ा हुआ है। यह उपलब्धि है पशुओं की एक खतरनाक बीमारी ‘पशु प्लेग’ (रिन्डरपेस्ट) के उन्मूलन में टीके के निर्माण की। आज की पीढ़ी ने रिन्डरपेस्ट का नाम भी नहीं सुना है। अभी 28 जून को संयुक्त राष्ट्र से सम्बद्ध संगठन खाद्य एवं कृषि संगठन (एफ.ए.ओ.) ने इस धरा को ‘पशु प्लेग’ से मुक्त घोषित कर दिया है। यह पशुओं की पहली ऐसी बीमारी है जिसका दुनिया भर से उन्मूलन हुआ है। इस बीमारी के उन्मूलन का 150 सालों का इतिहास है। इसके पूर्व मानव जाति को सिर्फ एक बीमारी, ‘चेचक’ का उन्मूलन करने में सफलता मिली है।
पशुओं की यह बीमारी ‘रिन्डरपेस्ट’ एक महामारी की तरह से आती थी और हजारों की संख्या में पशुओं को मौत की नींद सुला देती थी। जब भारत की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से कृषि पर आधारित थी तो इससे दुग्ध और कृषि उत्पादन को होने वाले नुकसान की कल्पना की जा सकती है। इस विषाणुजन्य रोग से विश्व भर में पशुओं की बड़ी संख्या प्रभावित होती थी। इसे ‘माता रोग’ के नाम से पुकारा जाता था और अंधविश्वास के रूप में इसके इलाज के लिए शीतला माता की पूजा का सहारा लिया जाता था। यूरोप में इस रोग से बचने के लिए बड़ी संख्या में संक्रमित पशुओं को मार दिया जाता और सफाई आदि का ध्यान रख कर अन्य मवेशियों को बीमारी वाले इलाके से दूर रखा जाता था। भारत में 1752 में असम में पहली बार इस रोग का पता लगा। 1890 में डॉ. अल्फ्रेड लिनगार्ड को इम्पीरियल बैक्टीरियोलॉजिस्ट नियुक्त कर पूरे भारत में पशु रोगों के निदान की जिम्मेदारी सौंपी गई। 1893 में नैनीताल के समीप मुक्तेश्वर में ‘इम्पीरियल बैक्टीरियोलॉजिकल लेबोरेटरी’ स्थापित की गई जो कालान्तर में ‘भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान’ कही जाने लगी। अब वहाँ भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आई.सी.ए.आर.) के तहत मवेशियों के खतरनाक रोग खुर व मुँह पका रोग पर अनुसंधान का निदेशालय है। यहीं पहली बार 1899 में पशु प्लेगरोधी टीका खोजा गया। अनुसंधान व विकास का काम चलता रहा और भारत में रोग प्रभावित मवेशियों को मारे बिना बचाव व उपचार का सिलसिला आरंभ हुआ।
अनुसंधान को 1962 में केन्या में वाल्टर प्लोराइट द्वारा ऊतक संवर्द्धन पर आधारित टीके के अविष्कार के बाद और बल मिला। इस प्रयोग को मुक्तेश्वर में दुहरा कर टीके का उत्पादन आरंभ किया गया। इस टेक्नोलॉजी को 1970 में भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान, इज्जतनगर, (बरेली) पहुँचाया गया और टीकों का उत्पादन हुआ। अभियान आरंभ होने के बाद 1956 से 1984 की अवधि में 110 करोड़ टीके लगा कर 80 प्रतिशत मवेशियों को रोग से बचाव में सक्षम बनाया गया। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन ने 1983 में समूचे दक्षिण एशिया में रोग उन्मूलन अभियान चलाने का सुझाव दिया। विश्वस्तर पर अनेक प्रयासों और निगरानी के बाद ही पशु प्लेग का सफाया हो सका।
भारत ने पशु प्लेग के उन्मूलन के लिए 40 सालों की अवधि में 1,66,782 करोड़ रु. खर्च किये। जून, 1995 में भारत को क्लीनिकली रोग मुक्त मान लिया गया। भारत ने अगस्त, 2005 में विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन की अन्तर्राष्ट्रीय समिति के समक्ष पशु प्लेग से अवमुक्त घोषित करने के लिए आवेदन किया। अंततः 25 मई, 2006 को भारत को पशु प्लेग से मुक्त मान लिया गया। यदि भारत ने इस रोग पर नियंत्रण न पाया होता तो 1960 के दशक में हरित क्रांति के दरवाजे खुलना कठिन हो सकता था। पशुओं के रोगमुक्त होने के बाद पहले हरित क्रांति और फिर दुग्ध क्रांति का रास्ता खुला। आज भारत खाद्यान्न में आत्मनिर्भर है और दुग्ध उत्पादन में विश्व में पहले स्थान पर है तो इसके लिये पशु प्लेग से मुक्ति को श्रेय दिया जाना चाहिये। खाद्य एवं कृषि संगठन के अनुमान के अनुसार पशु प्लेग के उन्मूलन के कारण भारत 1965 से 1998 के बीच 289 अरब डालर का अतिरिक्त अन्न उत्पादन कर सका। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद को इस बात के लिए साधुवाद मिलना चाहिए कि उसने इस योगदान को मान्यता देते हुए और विश्व पटल से पशु प्लेग के उन्मूलन के जश्न के रूप में अपने नई दिल्ली परिसर में 23 अगस्त को समारोह का आयोजन किया। मुक्तेश्वर में और बरेली में भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान में यादगार स्मारक के रूप में स्तम्भ लगाने और डाक टिकट जारी करने के प्रस्ताव पर विचार चल रहा है।