फिर पहाड़
दिल्ली से हम आगरा और मथुरा गए। आगरा में हमने अपनी किताबों में छपा हुआ ताजमहल देखा। बहुत सुंदर लगा। कितना साफ-सुकीला था! वहाँ हमने अकबर का मकबरा सिकंदरा भी देखा। आगरा के किले में गए। ऊपर एक छत पर बिलकुल काले रंग के संगमरमर की बेंच देखी। वहाँ दीवान-ए-खास, एक बुर्ज और कमरा था, जिसमें औरंगजेब ने अपने पिता शाहजहाँ को कैद कर दिया था। हमें वह छोटा-सा छेद भी दिखाया गया, जिसमें लगे शीशे में से शाहजहाँ यमुना के किनारे अपनी बेगम मुमताज की याद में बनाए हुए ताजमहल को देखता रहता था और उसकी याद में आँसू बहाता था। सुन कर मुझे बहुत दुख हुआ। मैं सोचता रहा, औरंगजेब ने अपने पिता को कैद क्यों किया होगा ? उतने बड़े किले में तो वे सभी आराम से रह सकते थे ?
हम फतेहपुर-सीकरी भी गए। वहाँ बहुत बड़ा बुलंद दरवाजा देखा। हमें बताया गया कि वह अकबर ने बनवाया था। उसी से लगी किले की बहुत ऊँची दीवार पर एक आदमी लंगोट पहन कर खड़ा था और हाथों से कुछ इशारा कर रहा था। हमें पता चला कि वह पैसे लेकर वहाँ से नीचे पानी की बावड़ी में छलाँग लगाएगा। उसके आदमी ने पैसे जमा किए और उसे इशारा किया। वह किले की दीवार नीचे बावड़ी में कूद गया। देखने वाले सहम कर रह गए। हमें भी ह्याक् जैसी हो गई। यह देख कर मुझे बहुत डर लगा, लेकिन नीचे देखा तो वह आदमी बावड़ी से तैर कर बाहर आ रहा था।
किसी ने कहा, ‘‘पैसे कमाने के लिए आदमी क्या-क्या नहीं करता!’’
किसी और ने कहा, ‘‘पैसे के लिए नहीं, पेट के लिए।’’
किसी और की आवाज आई, ‘‘हाँ, ठीक तो कह रहे हो। नहीं तो उतनी ऊँचाई से कूद कर कोई आदमी अपनी जान से क्यों खेलेगा ?’’ ![]()
मैं बुलंद दरवाजे की सीढ़ियाँ से उतर कर नीचे तक गया और एक-एक सीढ़ी पार करके फिर ऊपर चढ़ गया। नीचे दो-तीन बकरियाँ सीढ़ियों पर उछल-कूद रही थीं। बुलंद दरवाजे के सिरे पर मधुमक्खियों ने बहुत बड़े छत्ते बनाए हुए थे।
भीतर बहुत विशाल आँगन था। उसमें एक ओर फकीर शेख सलीम चिश्ती की मज़ार थी। वह सफेद संगमरमर की बनी हुई थी। उस पर संगमरमर की ही जालियाँ और छत से नीचे तक संगमरमर के ही पाईप बने थे। लोग कहते थे, उनसे वर्षा का पानी निकल कर सीधे ज़मीन में चला जाता है। वे यह भी कहते थे कि अकबर ने शेख सलीम चिश्ती से बच्चे के लिए प्रार्थना की थी तो सलीम पैदा हुआ। वही सलीम जहाँगीर कहलाया।
इतिहास की ये बातें सुन कर बहुत अच्छा लग रहा था। किताब में पढ़ कर तो केवल कल्पना करता था, लेकिन यहाँ वे चीजें मेरी आँखों के सामने दिखाई दे रही थीं।…वे बादशाह नहीं थे, बेगमें नहीं थीं लेकिन उनकी बनाई हुई इमारतें थीं। मैं मन में सोचता रहा- यहाँ अकबर आता होगा तो नगाड़ा कैसे बजता होगा…जहांगीर और नूरजहाँ इस छत पर टहलते होंगे….सामने यमुना दिखाई देती होगी…लेकिन, कैद में शहंशाह शाहजहाँ सक-सक रोता रहता होगा…
हम मथुरा भी गए। रात ढल आई थी। गली में हमारा झुंड देख कर एक पंडा पीछे पड़ गया, ‘‘यजमान, इधर, इधर, मेरे साथ आओ।’’
प्रिंसिपल साब ने पूछा, ‘‘तुम कौन ?’’
‘‘मैं नेपाली पंडा,’’ उसने कहा।
प्रिंसिपल साब ने कहा, ‘‘हमें पहाड़ी पंडा के पास जाना है। हम नैनीताल से आए हैं।’’
‘‘ठीक है यजमान। आप रुको, मैं पहाड़ी पंडा को खबर करता हूँ।’’
नेपाली पंडा तेजी से कहीं गया और बुजुर्ग पहाड़ी पंडा को बुला लाया। पहाड़ी पंडा हमें संकरी सीढ़ियों से कहीं ऊपर, भीतर बड़े से कमरों में ले गया। वहाँ हमारे रहने का इंतज़ाम किया। अगले दिन हमने द्वारकाधीश मंदिर, म्यूज़ियम और दूसरी जगहें देखीं। पहली बार नाव में भी बैठे और यमुना नदी के दूसरी ओर गए। वहाँ से आगे खेत दिखाई देते थे जिनमें कुछ लोग हल चला रहे थे।
दिल्ली, आगरा, मथुरा घूम कर हम वापस पहाड़ यानी अपने इंटर कालेज में लौट आए।
हमारे पास अब ‘हमने क्या-क्या देखा, कहाँ-कहाँ देखा’ कहने के लिए कितना जो कुछ था! ईजा हेाती तो उसे बताता। लेकिन, उसे गुजरे हुए तो दो साल हो चुके थे। सोचता था, मरने के बाद लोग लौट क्यों नहीं आते होंगे ? कैसा लगे, अगर किसी दिन ईजा अचानक लौट आए तो ? …मैं विचारों में खो जाता।
मैंने सब कुछ कालेज के अपने साथियों को तो बताया-बताया, गाँव गया तो वहाँ भी अपने पुराने संगी-साथियों को दिल्ली, आगरा, मथुरा की बातें बताईं। वे आश्चर्य और अविश्वास से मेरी बातें सुनते रहते।
कोई पूछता, ‘‘ददा, तू मोटर में बैठा ?’’
‘‘मोटर में भी, रेल में भी। और, हाँ नाव में भी,’’ मैं कहता। ![]()
‘‘तुझे रिंगाई (चक्कर) नहीं लगी ?’’
‘‘नहीं तो।’’ ‘‘नाव में कहाँ बैठे ?’’
‘‘मथुरा में। यमुना नदी में।’’
‘‘वह नदी कितनी बड़ी है ?’’
‘‘बहुत बड़ी। यहाँ से वहाँ तक।’’
‘‘गौला से भी बड़ी ?’’
‘‘बहुत गौलाओं जितनी। आर-पार पानी ही पानी दिखता था। गौला को तो हम पैदल पार कर लेते हैं। उसमें पैदल नहीं चल सकते। बहुत गहरी है बल, तभी तो नाव से आर-पार जाते हैं।’’
‘‘ददा, तुम हवाई झ्याद (जहाज) में भी बैठे ?’’
‘‘नहीं झ्याद में नहीं बैठा।’’
शाम को रिजल्ट पता लग गया। आर्ट में मेरे और दूसरे सहपाठी के नंबरों में इतना अंतर हो गया कि मैं दूसरे नंबर पर आया। तब मास्साब ने समझाया, ‘‘तुम निराश मत होना। यह मान कर चलो कि तुम पहले नंबर पर हो क्योंकि बाकी सभी विषयों में तुम आगे हो। आर्ट में इतना अंतर क्यों हो गया, समझ में नहीं आता। और एक बात, मैं नंबरों के लिए कभी किसी से नहीं कहूँगा। मैं इसे गलत मानता हूँ। इससे किसी बच्चे की सही योग्यता का पता नहीं लग सकता।
तभी पास बैठी काकी कहती, ‘‘तू पढ़ने वाला हुआ ईजा, तभी तो इतनी जगह देख आया। जो नहीं पढ़ेगा, यहीं रहेगा तो कहाँ से देखेगा ?’’
बाज्यू तो जड़-कंजड़ पूछने लगे, ‘‘शुरू से बता धो…जैसे तू कालेज से मूरा गया, मनाघेर गया, फिर मोटर में बैठा…अब आगे बता, एक-एक बात।’’
मैं बहुत देर तक उन्हें दिल्ली, आगरा, मथुरा की तमाम बातें बताता रहा कि कहाँ क्या देखा। वे सुनते रहे, सुनते रहे। फिर जम्हाई लेकर, उदास होकर बोले, ‘‘च्यला (बेटा), आज तेरी ईजा होती तो सुनती…’’ और, चुपचाप उठ कर सड़क की ओर चले गए।
कुछ दिन बाद मैं कालेज लौट आया। कालेज में पढ़ाई फिर जोर-शोर से शुरू हो गई। शाम ढलने लगती तो नीचे बोर्डिंग की ओर से विद्यार्थियों की ‘त्वमेव माता च पिता त्वमेव’ की प्रार्थना चारों ओर गूँजने लगती। हम भी लंफू-लालटेन की सफाई में जुट जाते। लंफू में तो बस पतली, नाड़े की जैसी रस्सी का टुकड़ा होता था। उसे सिरे पर साफ कर लेते। लंफू में मिट्टी तेल (केरोसीन) भर देते और पेंच घुमा कर देख लेते कि बत्ती ऊपर-नीचे खिसक रही है या नहीं। लालटेन के ऊपरी सिरे को थोड़ा ऊपर खींच कर चिमनी निकाल लेते। कैंची से बत्ती के सिरे को काट देते। चिमनी के बाहर भीतर पानी के छींटे डाल कर उसे राख से पोंछ लेते थे। पुराने अखबार के टुकड़े से पोंछने पर काँच की चिमनी चकाचक चमक उठती थी। लेकिन, अखबार दुर्लभ था। कभी-कभार नैनीताल-हलद्वानी जाने पर खरीदा जाता था।
अंधेरा घिरने पर लंफू, लालटेन जला लेते। लंफू का उजाला पीला-पीला होता था। उसके उजाले का घेरा भी छोटा होता था। बत्ती का धुवाँ लगता था। लेकिन, लालटेन झक्क चमक उठती थी। उसका उजाला साफ और चमकीला होता था। धुवाँ भी नहीं लगता था। हम लंफू और लालटेन के उजाले में रात-रात तक पढ़ते। कई बार लालटेन धप्प-धप्प करके, काला धुवाँ छोड़ कर बुझ जाती। तब बत्ती नीचे करके उसे किसी कोने में रख देते या टाँग देते। चिमनी इतनी गरम होती थी कि उस समय उसे साफ भी नहीं कर सकते थे। तब लंफू के ही उजाले का सहारा होता। दिन में तो सूरज का उजाला हुआ ही-घर में भी और कक्षाओं में भी।
गर्मियाँ आतीं। होली के आसपास और उसके बाद चारों ओर जंगलों में चीड़ के पेड़ भी हवा के झोंकों के साथ जैसे मुट्ठी भर-भर कर पीला अबीर-गुलाल छिटकने लगते। जिन टहनियों तक हमारा हाथ पहुँच जाता, उन्हें हिला-हिला कर हम उनका पीला पराग झड़ाते। इत्ता सारा पराग! हम उसे हथेलियों में भर लेते। हमें बताया गया था, उसी पराग से स्यूँता (चीड़ के फल) में बीज बनेंगे। कुछ समय बाद हरे-हरे छोटे स्यूँते दिखाई देने लगते जो बाद में बढ़ कर कड़े पड़ जाते। फिर सूख कर चिटकते और उनसे निकल कर एक पंख वाले बीज हवा में धीरे-धीरे उड़ कर जंगल में और हमारे आसपास गिर पड़ते थे। हवा के साथ हमारे कालेज के खेल के मैदान तक भी पहुँच जाते। हम उन्हें बीन-बीन कर जेब में रखते और फिर कहीं बैठ कर, अंगुली से चट्ट दबा कर बीज खाते थे। बहुत स्वादिष्ट होते थे वे बीज। कुछ लोग कहते थे, उन बीजों की खीर बहुत स्वादी होती है।
एक साल चीड़ के उन जंगलों में जाड़ला के पौधे खिल गए। उनमें छोटे-छोटे नीले-गुलाबी फूल निकल आए। अब तक चीड़ की सूखी पत्तियों के पिरूल के बीच वे पतली डंडियाँ की तरह दिखाई देते थे, जिन पर लगता था हलकी रुई की तह चिपका दी गई हो। उनमें पत्तियाँ निकल आती थीं। फूल तो पहली बार ही देखे। लोग कहते थे- जाड़ला के पौधों में बारह वर्ष बाद फूल खिलते हैं। कुछ लोग तो उसे कुंभ की तरह ‘फूलों का कुंभ’ कहते थे। फूलों के उस कुंभ में उस साल इतने मौन (मधुमक्खियाँ) आए कि जगह-जगह पेड़ों की शाखाओं, छतों और चट्टानों पर उनके काले-भूरे झुंड के झुंड दिखाई देने लगे। मौनों के अलावा भौंरे, तितलियाँ और तमाम तरह के कीट-पतंगे भी आए।
हाईस्कूल की बोर्ड की परीक्षा के बाद हमारी परीक्षाएँ शुरू हुईं। मैंने आठवीं की परीक्षा दी थीं। कापियाँ जाँची गईं। एक दिन मास्साब (ददा) ने खुश होकर बताया कि आठवीं कक्षा के नंबर जोड़ लिए गए हैं। अभी तक तुम्हारे नंबर सबसे ज्यादा हैं। बस, आर्ट के नंबर जुड़ने बाकी हैं। शाम तक वे भी जुड़ जाएँगे। आर्ट तुम्हारा ठीक है। उसमें तुम्हारी रुचि भी है। चलो जो होगा, ठीक ही होगा।
लेकिन, ठीक हुआ नहीं। शाम को रिजल्ट पता लग गया। आर्ट में मेरे और दूसरे सहपाठी के नंबरों में इतना अंतर हो गया कि मैं दूसरे नंबर पर आया। तब मास्साब ने समझाया, ‘‘तुम निराश मत होना। यह मान कर चलो कि तुम पहले नंबर पर हो क्योंकि बाकी सभी विषयों में तुम आगे हो। आर्ट में इतना अंतर क्यों हो गया, समझ में नहीं आता। और एक बात, मैं नंबरों के लिए कभी किसी से नहीं कहूँगा। मैं इसे गलत मानता हूँ। इससे किसी बच्चे की सही योग्यता का पता नहीं लग सकता। आठवें में फर्स्ट आने पर एक छोटा-सा वज़ीफा मिलता है। कोई बात नहीं।’’ फिर समझाते हुए कहा, ‘‘तुम हाईस्कूल की पढ़ाई पर ध्यान दोगे। वहाँ तुम्हारी योग्यता का सही पता लगेगा क्योंकि कापियाँ जाँचने के लिए बाहर भेजी जाती हैं। कापी जाँचने वाला परीक्षक किसी भी विद्यार्थी को नहीं जानता। उसके लिए सब बराबर हैं। तुम्हें तुम्हारी योग्यता के अनुसार नंबर मिलेंगे।’
मास्साब (ददा) की सीख मैंने गाँठ बाँध ली। वे यह भी कहते थे कि नकल नहीं करनी चाहिए। यह बेईमानी होती है। इससे सही योग्यता का पता नहीं लग पाता। वह आदमी वह नहीं होता, जो नंबर बताते हैं। इसलिए उसे जीवन में कभी भी धोखा हो सकता है।
परीक्षाओं के बाद कालेज के हम पंछी अपने-अपने गाँव की ओर उड़ जाते थे। लेकिन, उस साल पता लगा कि सात-आठ दिन का कैंप लगेगा। कैंप ? कैसा कैंप ? हमने पता किया तो मालूम हुआ कि युवक मंगल दल जैसा कुछ बनेगा। शायद ब्लॉक ऑफिस की ओर से। उसके लिए बच्चे चुने जाएंगे। वे लोग श्रमदान करेंगे, साफ-सफाई करेंगे और अनुशासन सीखेंगे। उन्हें खाना-पीना भी मिलेगा। जो बच्चे चुने जाएँगे, वे सात-आठ दिन यहाँ रहेंगे। मैं भी चुन लिया गया।
हमने सात-आठ दिन श्रमदान किया। टोली बना कर कई और काम किए। सुबह-शाम प्रार्थना करते। समय पर नाश्ता। समय पर खाना, पीना, सोना। कैंप पूरा होने के बाद हममें से हरेक को खाने-पीने के पैसे काट कर बचे हुए दो-तीन रुपए मिले। बहुत खुश हुआ। घर जा कर ददा-भौजी को बताया। उन्होंने कहा, अपने पास रखो। ये तुम्हारे ही हैं।

























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