बाढ़ और बरसात
गर्मियों में तो अपने गाँव के पहाड़ से उछलते-कूदते, उतर कर नीचे आ जाता और गौला पार करके पहाड़ की चढ़ाई चढ़ने लगता। लेकिन, चैमास में द्यो-पानी का डर रहता। न जाने कब बादल घिर आएँ और कब झमाझम बरसने लगे। इसलिए चैमास के महीनों में छुट्टी में घर आता तो लौटते समय बाज्यू हिदायत देते, ‘‘टुपू-टुपू जान्वे रये है बाज्यू, काँई भैट्ये जन।’’ (सीधे चलते रहना हाँ बेटा, कहीं बैठना मत)
‘‘हो होई’’
‘‘बादल उनी रहे हैं। कहीं वर्षा हो गई तो गाड़ (नदी) आ सकती है। वो वहाँ देख तो कितने बादल जमा हो गए हैं। बिजली भी चमक रही है। तू जा अब। वहाँ उन पहाड़ों में भी बारिश हो गई तो गौला में बाढ़ आ सकती है।‘‘
‘‘पैंलाग, मैं चलता हूँ अब।’’
‘‘होई, द ज च्यला, खूब पढ़िए हाँ ? मेरि कोई फिकर नै करनि भै। द हिट। खुट छालिकै खित्ये (तेज-तेज चलना)।’’
और मैं, दूर नाई-देवगुरु के आकाश में घिरते, गरजते काले बादलों को बार-बार देखता हुआ उतार में तेजी से चलने लगता। कई बार तो बड़ी-बड़ी बूँदों का झमाझम झौका आता और आगे बढ़ जाता। कभी पश्चिम की ओर उतर रहे सूरज की तिरछी किरणों में नाई-देवगुरु के ऊँचे पहाड़ से गौला की गहरी घाटी में बरस रही वर्षा की सफेद धार दिखाई देती। थोड़ी देर बाद वे भी आगे बढ़ जाते जैसे आसमान से कोई उन्हें इधर-उधर घुमा रहा हो। तभी ‘किड़-किड़-किड़-किड़-किड़म्’ की आवाज के साथ बादलों के आरपार चम्म बिजली की चमक कौंध जाती। लेकिन कभी-कभी थोड़ी ही देर में ऐसा हो जाता कि कौन-सी बारिश, कैसी बारिश ? दूर पहाड़ों पर धूप फैल जाती!
लेकिन, हर बार तो ऐसा नहीं होता था। कभी-कभी झड़ लग जाते थे। कई दिनों तक बारिश रुकती ही नहीं थी। गाड़-गधेरे उफन कर घुघराने लगते थे। उस पार गलनी गाँव की छींण (झरना) दूध की सफेद धार जैसी दिखाई देने लगती थी। कच्चे-पक्के रास्तों में छल-छल पानी बहने लगता। खेतों की ढाल से छ्वां-छ्वां-छ्वां करता पानी जिधर रास्ता मिलता, उधर ही चल पड़ता। जगह-जगह झुमके (सोते) फूट पड़ते। नौले पानी से डबाडब भर जाते। नीचे गौला नदी में पानी बढ़ने लगता। इसलिए गौला में बाढ़ आने से पहले-पहले उसे पार करना जरूरी हो जाता था।
आकर मेरी बांई बाँह पकड़ी। मैं बहुत दुबला-पतला था। पानी में आगे बढ़े तो लगा, वह कितनी जोर से धकेल रहा था। तलुओं के नीचे बहते कंकड़-पत्थरों का पता लग रहा था। पैरों पर भी बहते पत्थरों के टुकड़े टकरा रहे थे। मैंने पैरों को पानी के भीतर जमीन में टिकाए रखने की लाख कोशिश की लेकिन पानी का एक रेला आया और मेरे पैर उखड़ गए। सूखी टहनियों की तरह दोनों पैर पानी में तैर गए। मेरी तो जैसे साँस ही रुक गई थी। हलकी चीख मार कर मैंने दाहिने हाथ से मनोरथ पंडिज्जी को पकड़ने की कोशिश की तो उन्होंने चिल्ला कर कहा, ‘‘नैं, नैं, मुझे मत पकड़ना। मैं तुम्हारा हाथ छोड़ दूँगा। मैं बुरी तरह घबरा गया और रोने लगा। बहता पानी देख कर चक्कर आने लगा।
उन दिनों जहाँ हम घुटने-घुटने या उससे थोड़ा और गहरे पानी में अपना झोला, पैजामा और जूते-चप्पल गर्दन में लटका कर या सिर पर रख कर गौला पार करते थे, पानी बढ़ने पर उसी नदी में खड़ा रहना भी मुश्किल हो जाता था। इसलिए नदी पार करने से पहले पानी की थाह ले लेते थे।
बाज्यू पहले ही हिदायत दे देते, ‘‘नदी में पानी ज्यादा होगा तो जबरदस्ती पार करने के गम्क-चम्क (कोशिश) मत करना। दूसरों की हौत (उदाहरण) मत लेना, हाँ ? मुश्किल ही होगी तो नीचे शिवालय के पास चले जाना। मनोरथ पंडिज्जी गाड़ (नदी) तरा देंगे। नहीं तो घर को ही लौट आना, हाँ ?’’
मैं ‘‘होई-होई’’ कहते हुए चलता रहता। सड़क के घूम में ओट से निकल कर सामने आता तो पता लगता बाज्यू नीचे स्कूल तक आकर आवाज लगा रहे हैं, ‘‘भली कै गए हाँ ? द ज पंै (अच्छा, जाओ फिर)। पानी पर जोर मत दिखाना।’’
उतार में तीन-चार मील तेजी से उछलते-कूदते रास्ता पार करने के बाद भी कई बार गौला का पानी बढ़ चुका होता था। वर्षा का मटमैला पानी किनारों तक पहुँच जाता। भरी नदी में बहते पानी को देख कर रिंगाई (चक्कर) लगने लगती। नदी पार करने की हिम्मत ही नहीं होती थी। तब किनारे-किनारे नीचे शिवालय के पास आते। दो-एक बार ऐसा हुआ। हम दो-तीन लड़के थे। गौला के पास पहुँचे तो वह आर-पार भरी हुई थी। हम असहाय होकर उसे बहते हुए देख रहे थे। दो-एक लोग और भी खड़े थे। उनमें से एक ने मुँह के ऊपर हाथ लगा कर उस पार धाद लगाई, ‘‘क्व छा हो, मनोरथ पंडिज्जी हो ?’’
कुछ ही देर में मनोरथ पंडिज्जी तिरछे-तिरछे नदी का पानी काटते हुए इस किनारे पर आ गए। उन्होंने एक आदमी की बाँह पकड़ी और उसे लेकर नदी में उतर गए। पानी के धक्के से हिलते-खिसकते, तिरछे-तिरछे वे उस किनारे पर जा लगे। फिर दूसरे आदमी को गौला तराई, मतलब पार कराई। इस बीच हमने भी उनको हाथ जोड़े और गौला पार कराने की प्रार्थना की। वे बोले, ‘‘मगर एक शर्त पर।’’ हम चौंके तो उन्होंने कहा, ‘‘कोई भी अपने दूसरे हाथ से मुझे नहीं पकड़ेगा। अगर पकड़ेगा तो मैं उसका हाथ छोड़ दूँगा। फिर वह जाने। मैंने अपने परान जो क्या गवाने हैं ?’’
दोपहर ढल चुकी थी। हमारे गले-गले आई हुई थी। गौला के उस किनारे पर कहाँ रहते ? ले-देकर एकाध घट (पनचक्की) था। और, सुनसान घटों में भूतों के किस्से हमने बहुत सुने हुए थे। ना, घट में तो किसी हालत नहीं रहना है। हमने कहा, ‘‘आप जैसा कहेंगे, हम वैसा ही करेंगे।’’
‘‘तो ठीक है। जूता-चप्पल उतारो। पैजामा भी झोले में डालो। झोला गले में टांग लो। और याद रखना। मैं तुम्हारी बांई बांह पकड़ कर नदी तराऊँगा। दाहिना हाथ मुझ पर मत लगाना। बिल्कुल भी नहीं।’’
उन्होंने पहले मेरे साथी का हाथ पकड़ा और पानी में उतर गए। उन आदमियों की तरह उसे भी दूसरे किनारे लगा आए। आकर मेरी बांई बाँह पकड़ी। मैं बहुत दुबला-पतला था। पानी में आगे बढ़े तो लगा, वह कितनी जोर से धकेल रहा था। तलुओं के नीचे बहते कंकड़-पत्थरों का पता लग रहा था। पैरों पर भी बहते पत्थरों के टुकड़े टकरा रहे थे। मैंने पैरों को पानी के भीतर जमीन में टिकाए रखने की लाख कोशिश की लेकिन पानी का एक रेला आया और मेरे पैर उखड़ गए। सूखी टहनियों की तरह दोनों पैर पानी में तैर गए। मेरी तो जैसे साँस ही रुक गई थी। हलकी चीख मार कर मैंने दाहिने हाथ से मनोरथ पंडिज्जी को पकड़ने की कोशिश की तो उन्होंने चिल्ला कर कहा, ‘‘नैं, नैं, मुझे मत पकड़ना। मैं तुम्हारा हाथ छोड़ दूँगा। मैं बुरी तरह घबरा गया और रोने लगा। बहता पानी देख कर चक्कर आने लगा। मनोरथ समझ गए होंगे। बोले, ‘‘डर लग रहा है तो आए क्यों? आंखें बंद कर लो, रिंगाई नहीं लगेगी।’’ ![]()
आँखें बंद करना कहाँ आसान था ? आँख बंद करते ही तो आकाश-पाताल एक होने लगता था। सोचने लगता, पता नहीं उनके हाथ में हूँ या नदी की धारा में जा रहा हूँ। खैर, किसी तरह मुझे पकड़ते-संभालते मनोरथ पंडिज्जी मुझे दूसरे किनारे पर ले आए। एक बार फिर जाकर हमारे साथी को भी ले आए।
किनारे पर दो-एक आदमी खड़े थे। कहने लगे, ‘‘बचा दिया मनोरथ ने। नहीं तो हर किसी के वश का जो क्या हुआ ? गाड़ आने पर तो रूख-डाले (पेड़-पौधे) और गाय-भैंस तक बग (बह) कर आने वाली हुई। आदमी क्या हुआ इसके सामने ?…अब, चलो बच्चो। ओखलकांडा पढ़ते होगे ? चलो, फटाफट कूच कर जाओ!’’
हम फटाफट खनस्यूँ से ओखलकांडा की चढ़ाई चढ़ने लगते जहाँ गर्मियों में चीड़ वनों में गिरे बीजों से चौमास में अब छोटे-छोटे नए झबरीले अंकुर निकल आए होते। हम जानते थे, कल पल-बढ़ कर वे नन्हे अंकुर उन्हीं वनों में चीड़ के बड़े पेड़ बन कर शाल के पेड़ों के आसपास खड़े हो जाएँगे।
जूनियर हाईस्कूल की पढ़ाई के दिनों में हमारे एक नए अध्यापक आ गए- सी.डी. खर्कवाल। वे भी टीचर क्वार्टर में रहने लगे। साथ में उनका छोटा भाई रमेश खर्कवाल था जो मेरा अभिन्न मित्र बन गया। हम दोनों हर काम मिल-जुल कर करने लगे, पढ़ाई से लेकर नहाना-धोना, व्यायाम, शौच के लिए जंगल जाना तक। उन दिनों ‘जंगल जा रहा हूं’ के मायने ही होते थे कि लोटा लेकर शौच के लिए जंगल जा रहा हूं। ब्रह्मचर्य की एक किताब भी हमारे हाथ लग गई जिसमें आसनों की जानकारी दी गई थी। हमने उसे पढ़ कर योगासन लगाने शुरू कर दिए, हालाँकि हम दोनों ही ‘हंस-परान’ (बहुत दुबले-पतले) थे। हम दौड़ लगाते, खेलते, कृषि संग्रह करते, कीड़ों और बीजों का अध्ययन करते। माचिस के खाली डिब्बों को धागे से जोड़ कर टेलीफोन बनाते। टेलीफोन तो देखा ही नहीं था। माचिस के डिब्बों का वही टेलीफोन हमारा टेलीफोन था, जिस पर हम बात कर सकते थे।
बल्कि, ददा के पोस्ट ऑफिस को देख कर तो उस बीच मैंने भी एक पोस्ट ऑफिस शुरू कर दिया! अपने दोस्तों से कहा, वे चिट्ठी भेज सकते हैं। मेरे दो-एक दोस्त बंद चिट्ठी लाते। मैं उनमें आलू की मुहर का ठप्पा लगाता और चिट्ठी सही पते पर भेज देता। हम दो-चार दोस्तों के बीच वह डाक सेवा कुछ समय तक चलती रही।
मुझे विज्ञान के प्रयोगों में बहुत रुचि थी। कॉलेज से टूटी-फूटी परखनलियाँ, बिजली के पतले तारों के टुकड़े ले आता और सोचता रहता कि इनका क्या करूं? बैटरी से जोड़ कर बल्ब जलाता, रसायनों के घोल मिला कर मिश्रण तैयार करता, कागज का सूची-छिद्र कैमरा बनाता, धूपघड़ी बनाता। एक बार मुझे लगा कि हलका कागज आकाश में उड़ सकता है। मैंने ऊन की थैलियों का मोमजामा (पॉलिथीन) लिया और उसे आटे की लेई से चिपका कर बड़ा थैला बनाया। गोबर के उपले खोज कर लाया। फिर छत पर जाकर थैले के भीतर सूखा गोबर जला कर रख दिया। मैं लिफाफे के उड़ने की प्रतीक्षा करता रहा। बाद में देखा तो मोमजामा उपले की आँच से मुरझा गया था। वह नहीं उड़ा।
हमारे कॉलेज में तीन बड़े गम (यूकिलिप्टस) के पेड़ थे। उनमें से रसायन विज्ञान की प्रयोगशाला के बाहर का गम काफी बड़ा और फैला हुआ था। पढ़ाई और प्रयोगों के लिए वह मेरा प्रिय पेड़ था। मैं अपनी कापी-किताब लेकर उसकी ऊपरी मोटी शाखा पर बैठ जाता। वहीं पढ़ता और माचिस के डिब्बों से फूलों के गुच्छों के पास तक बारीक तार जोड़ देता। मुझे लगता, मधुमक्खियाँ और भौंरे गुनगुनाएँगे तो माचिस की डिबिया में उनकी मधुर आवाज गूँजेगी। यह वही गम का पेड़ था, जिस पर आगे चल कर मैं अपने मित्र दयाकृष्ण भट्ट के साथ पढ़ाई करता था। हम दोनों ने उसकी शाखा पर खोद कर अपने नाम लिखे थे। हम दोनों अपने साथियों के साथ खालगड़ा के आसपास जंगल में कभी बुराँश के फूलों का शहद चूसने और कभी काफल खाने जाते थे। दयाकृष्ण उन दिनों एक गीत की ये दो लाइन जोर-जोर से गाता था: ‘माया का ऊपर, मैं पानि पि गयों जुठ!’ मतलब तेरे मोह में तो मैंने तेरा जूठा पानी भी पी लिया! दयाकृष्ण बहुत ही होशियार विद्यार्थी था। हर विषय में डिस्टिंक्शन मतलब दयाकृष्ण! हाईस्कूल और इंटर की परीक्षाओं में प्रथम श्रेणी और पहले स्थान का रिकार्ड बना कर दयाकृष्ण आगे की पढ़ाई के लिए नैनीताल चला गया। मैंने कक्षा में हिंदी की सरस पढ़ाई और प्रेमचंद की ‘बूढ़ी काकी’, ‘पूस की रात’, ‘सुदर्शन की हार की जीत’ चंद्रधर शर्मा की गुलेरी की ‘उसने कहा था’ और ‘बुद्धू का कांटा’ जैसी तमाम कहानियाँ पढ़ कर अपनी रूलदार कापी में अपने मन से चुपचाप कहानियाँ लिखना शुरू कर दिया था। दयाकृष्ण के जाने के बाद मैंने उसे याद करते हुए हिंदी में एक कहानी लिखी- फॉरगेट मी नॉट! और, उसमें अपनी सारी भावनाएँ उँडेल दी।
हम कॉलेज की दीवाल पर टँगे हाईस्कूल और इंटर दोनों परीक्षाओं के मानपटों पर विशेष योग्यता के साथ प्रथम श्रेणी में पास हुए दयाकृष्ण का नाम देखते रहते थे। बाद में सुना, दयाकृष्ण ने रुड़की इंजीनियरी में सर्वोच्च स्थान प्राप्त करके रिकॉर्ड बनाया है। उसके भी बाद सुनने में आया कि सरस्वती और लक्ष्मी का मिलन हो रहा है। दयाकृष्ण का विवाह इलाके के जाने-माने सेठ नारायण की सुपुत्री से हो गया।
पढ़ने में रिरवाकोट गाँव के किसन यानी कृष्ण आर्य भी कोई कम नहीं थे। बोर्डिंग में वह और विद्या आर्य साथ रहते थे। दोनों की अच्छी दोस्ती थी। मेरे साथ भी खूब रहते थे। किसन भी प्रथम आते रहते थे। धानाचूली के नरसिंह बिष्ट भी पढ़ने में सदा अव्वल रहते थे। किसन और नरसिंह से एक बार अंग्रेजी पढ़ाने वाले मास्साब ने अंग्रेजी में ‘जूलियस सीजर’ नाटक के कुछ हिस्सों का अभिनय कराया। हम सभी विद्यार्थी कॉलेज के सामने प्रांगण में कतार बना कर बैठ गए। सामने बरामदे में सीजर बन कर किसन और ब्रूटस के रूप में नरसिंह आए। उनके बाल आगे को काढ़ कर गोलाई में काटे गए थे। ऊपर आधी बाँह का घुटनों से नीचे तक लंबा चोला पहना हुआ था। पिंडलियों में काले रिबन की पट्टियाँ आड़ी-तिरछी बाँधी गई थी। वैसी अंग्रेजी हमने पहली बार सुनी। वे हाथ में चपटी तलवार लेकर दमखम के साथ डायलॉग बोल रहे थे। इंटर में उनके कोर्स में जूलियस सीजर नाटक का एक पाठ था। वे उसी की लाइन थे। मैं कान लगा कर सुन रहा था। फिर भी बहुत कम समझ में आ रहा था।
एक बार सीजर से ब्रूटस ने कुछ ऐसा कहा, ‘‘सीजर आल हेल!’’ उसने सीजर के सम्मान में सिर झुकाया। वह शायद उससे चलने के लिए कह रहा था।
सीजर यानी किसन बोला, ‘‘आई विल नॉट कम टुडे।’’
फिर हमारी ओर इशारा करके कहा, ‘‘टैल दिम…’’
एक बार सीजर ने ब्रूटस को देख कर कहा, ‘‘ह्वट ब्रूटस?’’ और, तभी ब्रूटस ने सीजर के शरीर में तलवार घोप दी। लाल स्याही में भिगाई हुई रुई से खून टपकने लगा। सीजर ने घोर आश्चर्य से कहा, ‘‘एट टु ब्रूट!’’ फिर ब्रूटस ने हम लोगों की ओर दोनों हाथ फैला कर कहा, ‘‘बी पेस टिल द लास्ट! रोमन्स, कंट्रीमिन एंड लवर्स…’’ वह उतार-चढ़ाव के साथ बोलता गया, बोलता गया। फिर पूछा, ‘‘हू इज हियर. ..हू विल नॉट लव हिज कंट्री ? आई पॉज फॉर अ रिप्लाइ..
कुछ विद्यार्थी और अध्यापक जिन्हें शायद पहले बता दिया गया होगा कि यहाँ पर क्या कहना है, जोर से चिल्लाए- ‘‘नन ब्रूटस नन!’’
ब्रूटस ने अपना भाषण पूरा किया और एक घुटने के बल बैठ कर रोम के निवासियों के प्रति आभार व्यक्त किया। हमने जोश के साथ तालियाँ बजाईं।
फोटो : साभार मेरा पहाड़ डॉट कॉम