प्रस्तुति : कुमार प्रशांत
सन् 1974 में जयप्रकाश नारायण ने पूछा था कि अपने तथाकथित जनप्रतिनिधियों की मूर्खताओं को झेलने के लिये हम कब तक अभिशप्त बने रहेंगे ? इसके जवाब में तब देश को आपातकाल और उन्हें चंडीगढ़ की कैद मिली थी। यह अनुत्तरित सवाल दिन-प्रतिदिन तीखा से तीखा होता जा रहा है।
ताजा मामला छत्तीसगढ़ के राज्यपाल ई.एस.एल. नरसिम्हन का है। वे पुलिस सेवा और गुप्तचर ऐजेंसी के बड़े अधिकारी रहे हैं और बड़े अधिकारियों को अधिकार होता ही है कि वे जब जो चाहे कहें और लोग उनकी सुनें ! उन्हें यह भी गुमान होगा कि वे पहले पुलिस के बड़े अधिकारी और अब राज्य के सबसे बड़े अधिकारी हैं। इसलिये वे जनता का नहीं, अपनी कुर्सी का नमक खाते हैं, सो उन्हें उसी का हक अदा करना चाहिये। इसी नाते उन्होंने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा कि वे अपने गृहमंत्री को पत्र लिखा कि वे अपने गृहमंत्री को यानी कि पी. चिदंबरम को देश में मनमाना घूमने से रोकें। संदर्भ यह था कि अभागे छत्तीसगढ़ में गांधी-विचार में निष्ठा रखने वाले लेकिन प्रशासन की नजर में अपराध करने वाले हिमांशु कुमार द्वारा आयोजित जन-सुनवाई का आमंत्रण गृहमंत्री ने स्वीकार कर लिया था।
दोनों ही बातें अत्यंत दूरगामी थीं। राज्य द्वारा प्रताड़ित किये जा रहे हिमांशु कुमार ने खुली जन सुनवाई में गृहमंत्री को बुलाया कि हमारा घर तुम कैसा रख रहे हो, यहाँ आकर देखो ! अकसर लोग जिससे लड़ रहे होते हैं उसे गवाह बनाकर नहीं बुलाते। हिमांशु कुमार ने इस घेरे को तोड़ा और कहा आप स्वयं देख सुनकर हमें बतायें कि क्या हमारा घर आप ठीक ढंग से रख पा रहे हैं ? अगर वे छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में पहुँच जाते तो पहली बार किसी जन सुनवाई में गृहमंत्री मौजूद होते और लोगों की सीधे सुनते और अपनी सुनाते। लेकिन राज्य सरकार को लगा कि उसी के आंगन में बैठकर, उसी की फजीहत ? मुख्यमंत्री रमन कुमार ने इसे अपनी हैसियत पर ही सवालिया निशान मान लिया।
हिमांशु कुमार ने आज से 17 साल पहले छत्तीसगढ़ में गांधी-विचार की दिशा में काम करने का निर्णय लेकर वनवासी चेतना आश्रम की स्थापना की थी। यह आश्रम जनसंपर्क, जन-जागरण तथा जन अभिक्रम का केन्द्र बन गया। इसी आश्रम से वे छत्तीसगढ़ के लोगों के साथ जुड़कर सरकारी ज्यादतियों का सामना कर रहे थे। इसलिये यह आश्रम सरकार को सबसे अधिक खटकता था। जब नक्सली आतंक का सामना करने के नाम पर ऑपरेशन ‘ग्रीन हंट’ शुरू हुआ तो उसको सबसे पहले पुलिस ने इसे अशांति का केन्द्र बताकर उसे जमींदोज कर दिया। फिर वे जिस किराये के घर में रहने गये वहाँ से भी उन्हें निकाल फेंका। अब वे निराश्रयी हैं। ऐसा आदमी सर उठाये इसी में सरकार व पुलिस की किरकिरी खुलेआम जनसुनवाई में होने को थी और वह भी केन्द्रीय गृहमंत्री की मौजूदगी में ! सो उन्होंने राज्यपाल का पल्लू पकड़ा।
राज्यपाल के सामने दो रास्ते थे – वे पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल गोपालकृष्ण गांधी का रास्ता पकड़ सकते थे और कह सकते थे कि हमारे राज्य के लोगों को क्या कहना है, यह सुनने गृहमंत्री अकेले ही क्यों बैठें, जनसुनवाई में मैं भी उनके साथ बैठूंगा। अगर नरसिम्हन ऐसा करते तो छत्तीसगढ़ की निकम्मी लेकिन वहशी सरकार को वैसा झटका लगता जैसा बुद्धदेव बाबू की सरकार को लगा था। दूसरा रास्ता था कि राज्यपाल अपनी राज्य सरकार का बचाव करते और ऐसी जनसुनवाई को खारिज करते तथा उसकी आलोचना करते। वे ऐसा करते तो कहा जाता कि राज्यपाल ने अपनी संवैधानिक भूमिका की रेत में मुँह छिपा लिया। लेकिन नरसिम्हन ने जो किया वह केवल वही कर सकता था जिसके मन में लोकतंत्र और उसकी बारिकियों की न तो समझ हो, न इज्जत ! उन्होंने प्रधानमंत्री को पत्र में लिखा कि ऐसे समय में, जब राज्य व माओवादियों के बीच लड़ाई छिड़ी हुई है, गृहमंत्री का वहाँ जाना अवांछित कदम होगा। तो राज्यपाल यह कहना चाहते हैं कि छत्तीसगढ़ में कोई गृह युद्ध फूट पड़ा है ? राज्य अपनी ही जनता से सशस्त्र युद्ध में मुब्तिल ? तब तो कहना यह पड़ेगा न कि वहाँ भारतीय संविधान विफल हो गया है क्योंकि संविधान के तहत वहाँ शासन-प्रशासन संभव नहीं है। अगर ऐसा है तब तो वहाँ गृहमंत्री की सीधी भूमिका बन जाती है और उन्हें छत्तीसगढ़ में केन्द्रीय शासन लगाने की व्यवस्था बनानी ही चाहिये। अगर वहाँ की स्थिति असंतुष्ट नागरिकों और अक्षम सरकार के बीच के असंतोष की है तब भी गृहमंत्री की सीधी भूमिका बनती है कि वे तुरंत दोनों के बीच बैठें और वह रास्ता निकालें जिससे सरकार रास्ता बदले और लोगों में भरोसा बने। चिदंबरम का दंतेवाड़ा जाना वैकल्पिक पहल को मजबूत करना भी होता और माओवादियों को यह संकेत देना भी कि सरकार बातचीत के लिये हमेशा तैयार है। यह लोकतांत्रिक भी होता और एक नई, सकारात्मक पहल भी होती। आखिर प्रधानमंत्री, गृहमंत्री आदि सभी एकाधिक बार कह ही चुके हैं कि नक्सली चुनौती से केवल ताकत के बल पर नहीं निपटा जा सकता है। अगर ताकत का बल पर्याप्त नहीं साबित हो रहा है तो बातचीत के अलावा बल क्या है आपके पास ?
एक अन्य सवाल खड़ा होता है कि यदि देश में एक सत्ता है जिसके प्रतिनिधि के तौर पर राज्यपाल काम करते हैं तब वे उसी सत्ता की घोषित नीतियों के खिलाफ कैसे आवाज़ उठाते हैं ? देश के स्वतंत्र नागरिक के नाते वे कह ही सकते हैं कि बंदूक ही नक्सली आतंक से निपटने का एकमात्र रास्ता है और जब सत्ता की बड़ी बंदूक ही नक्सली सीने में अड़ा रखी है तब गृहमंत्री उस पर बातचीत का मरहम न लगायें। लेकिन जब वे राज्यपाल की हैसियत से ऐसा कुछ कहते हैं तब वही सवाल पूछने की नौबत आ जाती है कि इस देश में कितनी सरकारें हैं ? कहावत है कि बहुत सारे खानसामे मिलकर भोजन का कबाड़ा कर देते हैं। नीति के स्तर पर बहुत सारे नीतिकार हों तो देश, समाज सबका कबाड़ा हो जाता है। इसलिये राज्यपाल को यह बात सार्वजनिक करनी चाहिये कि उन्होंने किस आधार पर गृहमंत्री को दंतेवाड़ा जाने से रोका और चिदंबरम यदि अपने कहने के पीछे विश्वास का बल रखते हैं तो उन्हें भी बताना चाहिये कि उन्होंने जन-सुनवाई में आने का निर्णय क्यों बदल दिया ? ![]()
चिदंबरम भले जन-सुनवाई के लिये न पहुँचे हों लेकिन मेधा पाटकर के साथ देश भर के कई सक्रिय सार्वजनिक कार्यकर्ता वहाँ पहुँचे। सरकार की सहमति, पुलिस और गुंडों की मिलीभगत से उन्हें रास्ते में रोक लिया गया। मारा-पीटा गया, उन पर अंडे तथा अन्य गंदी चीजें फेंकी गई। चिदंबरम ने कान बंद कर लिये तो छत्तीसगढ़ की सरकार व प्रशासन ने आंख बंद कर ली। अब चिदंबरम बतायें कि क्या इस देश में लोकतंत्र का वह बुनियादी रूप भी सलामत नहीं बचा है जिसमें हर नागरिक को देश में कहीं भी जाने-कहने सुनने की आजादी होती है ?
छत्तीसगढ़ आज हमारे लिये राष्ट्रीय शर्म का विषय बन गया है। वहाँ न राज्य सरकार नाम की कोई संवैधानिक संस्था बची है, न किसी संवैधानिक व्यवस्था के भीतर काम करने वाली पुलिस बची है और न अंपायर की हैसियत रखने वाली कोई केन्द्रीय शक्ति बची है। भटके हुए व स्वार्थी तत्व आज नक्सली न्याय के नाम पर बरपाया जा रहा पुलिसिया आतंक और उस पर पर्दा डालने के लिये शुरू किया गया सरकारी नक्सलियों का सलवा जुडुम। सब मिलकर यह बता रहे हैं कि हमारा दलीय लोकतंत्र हमारी जरूरतों और आकांक्षाओं से बहुत कम पड़ रहा है शंकर गुहा नियोगी, डॉ विनायक सेन, हिमांशु कुमार जैसे लोग समय-समय पर इसी बात को तो रेखांकित करते आ रहे हैं। गृहमंत्री दंतेवाड़ा जाकर जनसुनवाई में शरीक होते तो भले कोई रास्ता नहीं निकलता, कम से कम कोई दरवाजा बंद है, ऐसा संकेत तो नहीं जाता। लेकिन जब अक्ल के ही दरवाजे बंद हों तब ?
यह लेख युवा संवाद (सम्पादक ए. के. अरुण, 167 ए/जी.एच., पश्चिम विहार, नई दिल्ली – 1100063/मूल्य 20रु.) के अप्रेल 2010 अंक 85 से साभार
एक चिन्तित नागरिक द्वारा जनहित में प्रसारित
























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