नारायण दत्त तिवारी कलंक का बड़ा सा टीका लगाये उत्तराखंड लौट आए हैं। उनका कहना है कि उनकी जो तस्वीरें नंगी स्त्रियों के साथ हैदराबाद में टेलिविज़न पर दिखाई गईं, वे बनावटी और साजिशन हैं। हैदराबाद में उनके खिलाफ साजिश करने का कोई कारण नहीं था। वहाँ वे राज्यपाल थे, नेता नहीं। उनका तेलंगाना राज्य के पक्ष या विपक्ष में होने से आंध्र की राजनीति में कोई फर्क नहीं पड़ता था।
तिवारी जी का स्त्रियों के प्रति आकर्षण तथा उनके साथ समय बिताने की कथाएँ काफी समय से जगह-जगह सुनी जाती रही हैं। देहरादून में उनके मुख्यमंत्रित्व के समय भी इन कथाओं का कोई अभाव नहीं था। सभी जानते हैं कि वहाँ उन्होंने एक नेपाली युवती को मंत्री जैसा पद दे दिया था। वहाँ भी यही कहा जाता था कि उनके पास स्त्रियों का लगातार आना-जाना लगा रहता है। देहरादून वे इसलिए लौट कर आ गए, क्योंकि उनके अनुसार उत्तराखंड उनका घर है। उनका जन्म यहाँ अवश्य हुआ और यहाँ तथा उत्तर प्रदेश में उन्होंने शासन भी किया। लेकिन अधिक समय वह बाहर ही रहे। उत्तराखंड सरकार ने बड़े राजनीतिज्ञों के लिए एक भारी सहूलियत जुटाई है। जो एक दिन भी वहाँ मुख्यमंत्री रहा, उसे वहाँ जीवन भर मुफ्त रहने एक भवन दिया जाता है। इस तरह का प्रावधान शायद ही किसी अन्य राज्य में हो। तिवारीजी को भी वहाँ एक भवन फॉरेस्ट रिसर्च इन्स्टिट्यूट में दे दिया गया है, जहाँ वे अब रहने चले गए हैं। यह उन्हें न मिला होता, तो वे शायद कहीं और जाते। पहला सवाल यह है कि इस राज्य के सभी मुख्यमंत्रियों को क्यों जीवन भर रहने मुफ्त का मकान दिया जाता है ? यह देश के राष्ट्रपति को भी शायद नहीं मिलता। दूसरी बात है कि यह वन संस्थान, जिसमें उनको भवन मिला है, केन्द्र के अधीन है, राज्य के नहीं। राज्य के विगत मुख्यमंत्री के लिए क्यों केन्द्र सरकार का भवन ले लिया गया और क्यों केन्द्र ने वह दे दिया ?
पिछले मुख्य मंत्री भुवन चंन्द्र खंडूड़ी को हटाए जाने पर भी उनके लिए जीवन भर रहने देहरादून में एक भवन की खोज की गई। जब तक भवन नहीं मिला, वे मुख्यमंत्री आवास में ही रहे और नए मुख्य मंत्री अपने पुराने मंत्री गृह में। यह सब क्यों? इस प्रथा की समाप्ति कर देनी चाहिए। यह नहीं है कि जाने वाले मुख्यमंत्रियों के पास रहने का कोई भवन न रहा हो। यदि था तो वे क्यों नहीं उसमें गए ? क्यों निर्धन राज्य से उन्हें मुफ्त में एक भवन लेने की आवश्यकता हुई ? उन्हें मामूली भवन नहीं दिया जाता। उसके लिए कुछ मानक रखे गए हैं, जैसे वह कम से कम चार शयन कक्षों का होना चाहिए और उसमें उनकी सुरक्षा तथा साथ में काम करने वालों के लिए भी स्थान होना चाहिए। यह सब आसानी से उपलब्ध नहीं होते। इसीलिए खंडूड़ी जी पद से हटने के बाद भी महीनों मुख्यमंत्री निवास में ही रहे, क्योंकि उनके देहरादून में रहने कोई अच्छा भवन नहीं मिल पाया।
स्थायी राजधानी बनाने के लिये राज्य की ओर से कोई पहल नहीं की जाती। लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री के लिए निवास ढूँढने जी-जान लगा दी जाती है। यह है हमारे राज्य की प्राथमिकता। ऐसी ही कुछ अन्य प्राथमिकताएँ हैं, जैसे मुख्यमंत्री का अपने समर्थकों को लालबत्ती वाली गाड़ियाँ तथा राज्यमंत्री पद देना। सबसे अधिक लालबत्तियाँ तिवारी जी ने अपने मुख्यमंत्री काल में बाँटीं। इतनी बँटीं कि उन्हें घोटाला कहा जाने लगा और उनके बाद बननेवाले मुख्यमंत्री ने उस पर एक जाँच भी बैठा दी। तिवारीजी के काल में हुए लगभग 30 घोटालों पर खंडूड़ी जी ने जाँच बैठा दी थी। उनमें से कुछ पर रिपोर्ट आ गई हैं, जैसे आंध्र के एक अनजान व्यक्ति को राज्य का मटेला (अल्मोड़ा के नीचे स्थित) शीतगृह (कोल्ड स्टोरेज) सौंप देना, एक बैंक से उसे व्यापार करने के लिये दो करोड़ रुपए का कर्ज दिलवा देना तथा राज्य के किसानों से उसे उधार में आलू, सेब, लीची तथा अन्य फल खरीदने की सहूलियत दिलवा देना, जिसका उसने अभी तक भुगतान नहीं किया है। उस जाँच में सरकारी अफसरों की उसे इन सब सहूलियतों को दिलवा देने की भागीदारी सामने आई है। लेकिन किसानों को उनकी फसलों का दाम दिला देने के बजाय यह जाँच मुख्यमंत्री के कार्यालय के किसी कोने में दबा दी गई है और उस पर कोई अमल नहीं किया गया। राज्य के गरीब किसान अभी भी अपनी फसल के मूल्य पाने की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जो शायद ही उनको कभी मिल पायेगा।