भारतीय पर्वतारोहण संस्थान का प्रि मानसून अभियान दल 6,611 मी. ऊँची नंदा खाट चोटी फतह कर लौट आया है। विपरीत मौसम के बावजूद दल के चार सदस्य ईस्ट फेस से चोटी पर झंडा फहराने में सफल हुए। इस सफलता से सभी पर्वतारोही गद्गद हैं। 12 सदस्यीय इस दल के लीडर डॉ. अनिल गुर्टू केदारडोम व शिवलिंग चोटियों में सफल आरोहण के साथ सियाचिन ग्लेशियर के कराकोरम दर्रे तथा एचएमआई के एक अभियान में माउंट एवरेस्ट की चोटी में नार्थ-ईस्ट से प्रयास कर चुके हैं। डॉ. गुर्टू दिल्ली के लेडी हार्डिंग मेडिकल कालेज में प्रोफेसर और सर्जन हैं।
अभियान से लौटते हुए बागेश्वर में एक मुलाकात में डॉ. गुर्टू ने बताया कि दल 27 मई को दिल्ली से चल कर बागेश्वर, धाकुड़ी, द्वाली होते हुए 30 मई को पिंडर नदी पार कर पिनरी उडियार पहुँचा। यहाँ उन्होंने बेस कैम्प स्थापित किया। आठ दिन की लोड-फैरी के बाद उन्होंने अपना सारा सामान खुद ही फारवर्ड बेस कैम्प पहुँचा दिया। इससे दल के सारे सदस्य शारीरिक व मानसिक रूप से मजबूत हो गए। मौसम हर रोज आँखमिचौली खेलता हुआ इम्तहान ले रहा था। आगे के लिए टीम के दो भाग कर लीड टीम व सपोर्टिंग टीम बना दिए गये। कैरावासों से पटे पड़े बुढ़िया ग्लेशियर को सावधानी से पार करने के बाद 200 मी. की खड़ी चट्टान में रस्सियाँ फिक्स कीं। 11 जून को इसे पार करने के बाद तख्ता कैम्प में एडवांस बेस कैम्प स्थापित किया। इस बीच मौसम इतना ज्यादा नाराज हो उठा कि कैम्प एक स्थापित करने में ही आठ दिन लग गए। लगातार हो रही बर्फबारी से चोटी पर पहुँचना असंभव लगने लगा। लेकिन लीड टीम के जाँबाज डिप्टी लीडर धुव्र जोशी, चेतन पांडे, भारत भूषण व ताकपा नोर्बू अपने पूर्व के अनुभवों से आशान्वित थे।
धुव्र जोशी ने आगे की यात्रा के बारे में बताया, ‘‘22 जून की सुबह डेढ़ बजे नंदा खाट चोटी पर हमने ईस्ट फेस से चढ़ना शुरू कर दिया। कैरावासों से पटे पड़े ग्लेशियर को पार करने के बाद 60 डिग्री तक की बर्फीली चढ़ाई को जब पार किया तो 50 डिग्री की ढलान पर 150 मी. की एक तीखी चट्टान सामने आ खड़ी हुई। इसमें दो रस्सियाँ फिक्स कीं। रास्ते में पाँच स्नो हम्प को पार करने के बाद दल का रास्ता एक त्रिभुजाकार चट्टान ने रोक लिया। 70 डिग्री की ढलान में चट्टान की जड़ में से बर्फ को काट-काट कर रास्ता बना आगे को बढ़े तो लगभग 300 मी. का एक लंबा रिज सामने दिखा। इसके एक ओर पिंडारी ग्लेशियर तथा दूसरी ओर दक्षिणी नंदा ग्लेशियर था। हम सभी ने इसे हॉर्स राईडिंग टैक्निक की मदद से पार किया। ताजी बर्फ में कई तरह की परेशानियाँ आ रही थीं। कई बार तो साँसे अटक रही थी। 150 मी. के अंतिम स्नो हम्प को पार करने के बाद सायं चार बजे हमारा दल 6,611 मी. ऊंचे नंदा खाट के शिखर पर था। इसे इत्तेफाक ही कहेंगे कि कई दिनों के बाद मौसम भी हम पर मेहरबान था। शिखर से चारों ओर का नजारा अद्भुत था। चारों ओर हिमालय का साम्राज्य फैला था। कुदरत को धन्यवाद दे हम फिर उसी जोखिम भरे रास्ते से वापस लौट पड़े। थकान काफी हो रही थी, जिससे खतरे भी बढ़ रहे थे। रात साढ़े ग्यारह बजे हम सकुशल कैम्प में पहुँचे तो सभी खुशी से झूम उठे। हमारी कामयाबी से सपोर्टिंग टीम के हौसले बुलंद हो उठे। अगली सुबह को दूसरे दल ने शिखर में चढ़ने की तैयारी की। लेकिन अब मौसम हमें वक्त देने के लिए तैयार नहीं था। बर्फबारी शुरू हो गई तो दल वापस लौट चला।’’
इस अभियान में बंगलौर की कविता रेड्डी, सिलौंग की रिबा निशा, गोवा के बियांगा, कलकत्ता से तुशीदास, गुजरात से राजल पटेल, अल्मोड़ा से धुव्र जोशी और चेतन पांडे, शिमला से भारत भूषण, लद्दाख से ताकपा नोर्बू, शिलौंग के वालम बाक तथा हिमांचल के ललित शामिल थे। अभियान की सफलता पर नेहरू पर्वतारोहण संस्थान के इंस्ट्रक्टर दिगम्बर सिंह रावत, रतन सिंह चौहान, जगमोहन सिंह और दशरथ सिंह तथा बागेश्वर के हिम संस्था के आलोक साह, भुवन चौबे आदि पर्वतारोहियों ने टीम को बधाई दी है।
डॉ. अनिल गुर्टू हिमालयी बुग्यालों में आग लगाए जाने वालों पर कोई कार्यवाही न होने से क्षुब्ध दिखे। बात करते-करते वे भावुक हो उठे, ‘‘हिमालयी चिड़ियाएँ अपने घोसले इन्हीं बुग्याली घासों में बनाती हैं। कस्तूरी, थार, घुरड़ सहित अन्य चौपाया जानवरों को भी इन्हीं बुग्यालों में रहना हुआ। आग से इनके आशियाने तो उजड़ते ही हैं, वे भी अक्सर मौत के मुँह में समा जाते हैं। शिकारियों पर कोई रोकटोक नहीं है। इस बीच बागेश्वर के जिलाधिकारी भी पिंडारी के भ्रमण में आए थे। लेकिन जिलाधिकारी के सामने ये सब बातें कहने से पहले ही विभाग के कारिंदों ने लोगों को चुप करा दिया था।’’ डॉ. गुर्टू हिमालयी जनजीवन की विकराल समस्याओं को देख सन्नाटे में थे। उन्होंने बताया कि ‘‘इन क्षेत्रों में शिक्षा व स्वास्थ्य का बुरा हाल है। विकास से ये क्षेत्र अभी भी कोसों दूर हैं। ऐसा लगता है कि शासन व प्रशासन को इनकी स्थिति से कोई लेना-देना नही है। दिल्ली में तो कागजों में उत्तराखंड में विकास की गति काफी तेज दिखती है….! अभी 12 जून को कफनी ग्लेशियर के खटिया बुग्याल में अनवालों की कुछ बकरियाँ हिम तेंदुवे ने मार दीं तो अज्ञानता वश गुस्से में अनवालों ने मरी बकरियों में जहर मिला दिया। बाद में हिम तेंदुवा जहर से मर गया तो उसकी लाश को पिंडर नदी में फेंक दिया। अभी 2009 में भी इस तरह के वाकये में दो हिम तेंदुओं को मार दिए जाने की बात ग्रामीण दबी जुबान से कर रहे थे। उत्तराखंड को ये सब किस ओर ले जा रहे हैं..?’’

























आपकी टिप्पणीयाँ