महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कानून मनरेगा को इस देश में लागू हुए चार साल हो चुके हैं। केन्द्र की यूपीए सरकार और कांग्रेस पार्टी इसे अपने शासन काल की सबसे बड़ी उपलब्धि पेश कर रही है। वैसे भी हमारे देश में यह पहला ऐसा कार्यक्रम है, जो संसद द्वारा पारित कानून के तहत देश के ग्रामीण गरीबों को 100 दिन के रोजगार की गारण्टी की बात करता है। हालांकि इस कानून का भी गरीबों के साथ ठीक वही व्यवहार है, जो व्यावहारिक धरातल पर अब तक बने सभी कानूनों का रहा है। फिर भी रोजगार गारण्टी, चाहे वह सीमित अर्थों में ही क्यों न हो, के लिये केन्द्र सरकार द्वारा किया गया यह कानूनी प्रावधान एक स्वागतयोग्य कदम है। इससे राज्य की ओर से सभी नागरिकों के लिये पूर्ण रोजगार की गारण्टी के संघर्षों को आगे बढ़ाने की एक कड़ी के रूप में देखा जाना चाहिये। फिर भी यह योजना यूपीए और कांग्रेस की गरीबों के प्रति दरियादिली, जैसा वे प्रचार कर रहे हैं, का नतीजा नहीं हैं। इसकी पृष्ठभूमि ग्रामीण गरीबों के वे व्यापक संघर्ष रहे हैं, जिनके दबाव में केन्द्र सरकार को उस योजना को लाने के लिये मजबूर होना पड़ा। आइये, इसकी पृष्ठभूमि पर एक नजर डालें।
हमारा देश कृषिप्रधान देश है, जिसकी आबादी का 70 प्रतिशत हिस्सा आज भी गाँव में बसता है। इस ग्रामीण आबादी का 75 प्रतिशत हिस्सा खेत मजदूरों, भूमिहीनों और गरीब किसानों से आता है, जिसकी आजीविका कृषि क्षेत्र में सृजित रोजगार पर टिकी रहती है। 90 के दशक से देश में लागू की गई उदारीकरण और भूमंडलीकरण की नीतियों ने कृषि क्षेत्र पर भी हमला किया। एक तरफ खेती का कारपोरेटीकरण और ठेकाकरण शुरू हुआ, दूसरी तरफ मशीनी उत्पादन प्रणाली व नई तकनीक के अधिकाधिक प्रयोग ने खेती में रोजगार के अवसरों की काफी कमी पैदा कर दी। इसने ग्रामीण गरीबों के इस बड़े हिस्से के सामने रोटी का सवाल खड़ा कर दिया। नतीजे के तौर पर गेहूँ काट रही कम्बाईन मशीनों को घेर कर जगह-जगह हजारों ग्रामीण गरीब अपने छिनते रोजगार का प्रतिरोध करने लगे। अनेक वामपंथी संगठन भी इस आन्दोलन के समर्थन में आगे आये। यहीं से इन ग्रामीण गरीबों के लिये रोजगार गारण्टी की माँग ने जन्म लिया। पिछली यू.पी.ए. सरकार पर ग्रामीण गरीबों के इस प्रतिरोध व वामपंथी पार्टियों का भारी दबाव था, जिसके कारण उसे इस योजना को कानून के रूप में मजबूरन सामने लाना पड़ा। केन्द्र व राज्य सरकारों की यह मजबूरी इस कानून के क्रियान्वयन के मामले में सामने आ रही आपराधिक लापरवाही में साफ देखी जा सकती है।
नरेगा के रूप में देश के दो सौ जिलों से शुरू हुई यह योजना तीसरे चरण में देश के सभी जिलों में लागू कर दी गई। मगर इस योजना को सचमुच में अगर धरातल पर लागू करना हो तो उसके लिये आबंटित बजट योजना की कुल जरूरत का 25 प्रतिशत भी नहीं है। दो सौ दिनों की रोजगार की गारण्टी और दो सौ रुपये न्यूनतम मजदूरी की लोकप्रिय माँग के विपरीत अभी 100 दिन के काम की गारण्टी व सौ रुपये न्यूनतम मजदूरी तक ही यह योजना सीमित है। सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि पंजीकृत बेरोजगारों तक इस बात को पहुँचाने का अब तक कोई प्रयास ही नहीं किया गया है कि यह योजना माँग के आधार पर है। इसका नतीजा यह है कि ग्रामीण बेरोजगार बिना माँग किये रोजगार की आस में पंचायतों को और ग्राम प्रधान, विकास खंड कार्यालयों को देखते रह जा रहे हैं। ऐसी स्थिति पैदा कर सरकारें और जिला प्रशासन माँग के आधार पर शत प्रतिशत रोजगार दे देने के आँकड़े तैयार कर पेश कर रहे हैं। जब योजना देश के दो सौ जिलों में लागू थी, तब सरकार कुल पंजीकृत परिवारों को औसतन चौदह दिन का रोजगार दे पायी थी। इधर उत्तराखंड सरकार जोर-शोर से प्रचारित कर रही है कि उसने मनरेगा के तहत वित्तीय वर्ष 2008-09 में 104 लाख कार्य दिवसों का सृजन किया है। सुनने में इस छोटे से राज्य के लिये यह बड़ी बात है। मगर राज्य के 8.44 लाख पंजीकृत परिवारों में इन कार्य दिवसों को अगर बाँट दें तो राज्य सरकार वित्तीय वर्ष 2008-09 में प्रति पंजीकृत परिवार औसतन 12 दिन का ही रोजगार दे पायी है। जबकि इन सरकारी आँकड़ों के विपरीत रोजगार मिलने का वास्तविक औसत इससे काफी कम है।
उत्तराखंड की भाजपा सरकार की कार्यप्रणाली ने इस योजना को ग्रामीण गरीबों का मजाक बना दिया है। हालाँकि यही स्थिति पूरे देश में है। राज्य के तमाम विकास खंड कार्यालयों में रोजगार की माँग के लिये मजदूरों द्वारा भरा जाने वाला प्रारूप 6 पिछले एक साल से उपलब्ध नहीं है। प्रारूप 7 व 8 भी कहीं उपलब्ध नहीं है। अगर किसी पंचायत के जागरूक प्रतिनिधि अपने खर्च से मजदूरों को प्रारूप 6 उपलब्ध करा रहे हैं तो विकासखंडों में तारीखशुदा आवेदनों को स्वीकार करने से साफ इंकार किया जा रहा है। बिना तारीख पड़े आवेदनों को लेकर राज्य प्रशासन रोजगार की माँग को वास्तविकता के विपरीत अपनी इच्छा से दर्शा रहे हैं और रोजगार न मिलने पर बेरोजगारी भत्ते के इन मजदूरों (आवेदकों) के कानूनी अधिकार को ठेंगा दिखा रहे हैं।
उत्तराखंड सरकार ने इस योजना के क्रियान्वयन के लिये विकास खंडों में पर्याप्त कर्मचारियों की व्यवस्था अब तक नहीं की है। समय पर कार्ययोजना बना कर स्वीकृत कराते हुए कार्यों का हर सप्ताह मापन कराने और मजदूरों को 15 दिन के भीतर भुगतान कराने की कोई व्यवस्था अब तक नहीं बनी है। मजदूरों को उनकी मजदूरी का भुगतान देने में न्यूनतम तीन माह से एक साल तक लग जा रहा है। कार्यस्थलों पर मस्टररौल उपलब्ध नहीं हैं, जबकि हर कार्यस्थल पर लेखाकारों को मस्टररौल प्रतिदिन भरना होता है। राज्य में सहायक लेखाकारों की भर्ती का ठेका एक अनाम एन.जी.ओ. को जिला स्तर पर दे दिया गया। अकेले अल्मोड़ा जिले में किसी अनाम एन.जी.ओ. ने 350 सहायक लेखाकारों की भर्ती 2000 रु. प्रति सहायक लेखाकार अवैध वसूली कर की। इस तरह उस एन.जी.ओ. ने 7 लाख रुपये इनकी भर्ती के नाम पर अवैध रूप से ही कमा लिये। आज इन भर्ती किये गये सहायक लेखाकारों को कोई यह बताने वाला नहीं है कि उनका क्या काम है और उनका तय मानदेय कौन भुगतान करेगा।
कृषिे विभाग के अन्तर्गत चलने वाले जलागम प्रबन्ध इकाई, सिंचाई, पेयजल व वन विभाग के कर्मचारियों -अधिकारियों को मनरेगा का अतिरिक्त कार्यभार सौंपा गया है। जबकि ये कर्मचारी व अधिकारी अपने विभागों में ही स्टाफ की कमी के चलते कार्य बोझ से दबे हैं। ऐसे में मनरेगा के पूर्णकालिक कार्य की अतिरिक्त जिम्मेदारी ने इन्हें कार्य बोझ से पूरी तरह दबा दिया है और उनका विभागीय व मनरेगा, दोनों कार्य बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है। जिन पंचायत राज अधिकारियों को पहले ही 14-15 ग्राम पंचायतों का काम सौंपा गया है उन्हें ही मनरेगा के सहायक लेखाकारों का अतिरिक्त कार्य भी सौंपा गया है। इससे ग्राम पंचायतों का काम भी बुरी तरह प्रभावित हो गया है। अन्य विभागों के जिन अधिकारियों-कर्मचारियों को मनरेगा का अतिरिक्त कार्य सौंपा गया है, उन्हें स्टेशनरी तक उपलब्ध नहीं करायी जा रही है। ऐसे में कार्य करने के लिये वे ग्राम प्रधानों से अतिरिक्त खर्च की माँग कर रहे हैं। इससे योजना में नीचे से भी भ्रष्टाचार के रास्ते खुल रहे हैं।
खातों के माध्यम से मजदूरी का भुगतान करने में बैंक देरी कर रहे हैं। बैंकों की स्थानीय शाखायें चैकों के क्लियरेंस में ही 15 से 30 दिन लगा देते हैं। ज्यादातर डाकघरों ने क्लियरेंस की दिक्कतों को दिखाकर मनरेगा के चैक लेने से मना कर दिया है और मजदूरों को बैंक के अतिरिक्त चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। ऐसे में प्रति सप्ताह या अधिकतम 15 दिनों में मनरेगा में मजदूरी के भुगतान के कानूनी प्रावधान पर अमल एकदम असम्भव है।
कुल मिला कर कहा जाये तो मनरेगा योजना चाहे देश की संसद द्वारा पारित कानून के तहत चलने वाली देश की पहली योजना हो, मगर केन्द्र व राज्य सरकारों के लिये यह योजना कानूनी बाध्यता के बजाय अपने वोट बैंक की चिन्ताओं में ज्यादा समा गयी हैं। कांग्रेस व यूपीए जहाँ इसे ईमानदारी से लागू कराने के लिये पर्याप्त बजट न देकर सिर्फ अपनी वाहवाही कराने में व्यस्त हैं तो वहीं एन.डी.ए. व अन्य राज्यों की सत्ताधारी पार्टियाँ अपने राज्यों में इस योजना का मखौल उड़ा कर कांग्रेस के प्रभाव को रोकने का प्रयास कर रहे हैं। जहाँ तक मनरेगा कानून का सवाल है, तो वह भी देश के अन्य कानूनों की तरह किताब में बन्द रह कर ग्रामीण गरीबों का उपहास उड़ा रहा है। ऐसी स्थिति में इस कानून के शत-प्रतिशत लागू कराने 200 दिन का काम व 200 दिन की मजदूरी का प्रावधान करने तथा इस योजना में कार्यों का विस्तार करने की माँग पर ग्रामीण गरीबों को फिर से जुझारू प्रतिरोध संघर्षों की दिशा में आगे बढ़ाने जरूरत है।























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