संतोष भट्ट
बाढ़, भूस्खलन व भूकंप जैसी घटनाओं के बाद इस बार अतिवृष्टि ने जनपद के विकास का पहिया जाम कर दिया है। इस आपदा ने जनपद के कुल 694 गाँव में से 673 को अपनी जद में लिया है। प्रारम्भिक अनुमानों के अनुसार सरकारी व गैर सरकारी संपत्ति को लगभग 45,015 लाख रु. का नुकसान आँका गया है। मुख्य राजमार्ग समेत लिंक मार्ग ध्वस्त होने से लोगों की जिंदगी दो माह बाद भी ढर्रे पर आ पायेगी, ऐसे आसार नजर नहीं आ रहे हैं।
प्राकृतिक आपदाओं का जनपद से लम्बा रिश्ता है। वर्ष 1978 और 1998 की बाढ़, 1991 का भूकंप और 2003 के वरुणावत भूस्खलन ने जनपद को पूरी तरह से मटियामेट कर रख दिया। इस बार दो माह तक जारी रही बारिश ने जो कहर बरपा किया, उससे निपटने में आम जनता के साथ सरकारी मशीनरी भी पूरी तरह फेल दिखी है। प्रकृति के प्रकोप के सामने किसी की एक नहीं चली। लोगों के सिर से छत, खेतों से फसल, जेबों से धन को भारी नुकसान हुआ है। गाँव के गाँव भूस्खलन व भूधँसाव की चपेट में आने से तबाह हो गये। सरकारी मदद सिर्फ दावों तक सीमित रह गई। गंगा व यमुना घाटी के 673 गाँवों के लगभग एक लाख 48 हजार लोग प्रभावित हुए है। 287 हेक्टेअर भूमि पर 237 हेक्टेअर फसल पूरी तरह नष्ट हुई है। फसल का नुकसान 1,089 लाख रु. आँका गया है। 22 लोगों की मौत हुई और 30 लोग गंभीर रूप से घायल हुए है। 130 से अधिक पशुओं की मौत हुई। 201 भवन पूरी तरह जमींदोज हुए और 419 भवन आंशिक रूप से क्षतिग्र्रस्त हुए। राष्ट्रीय राजमार्ग व लिंक मार्ग पर 245 स्थानों पर भूस्खलन, कटाव व धँसाव से 815 किमी. सड़क ध्वस्त हुई है। सौ से अधिक पुल व पुलिया आपदा की चपेट में आने से तबाह हुए हैं। गंगोत्री व यमुनोत्री की यात्रा अभी तक ढर्रे पर नहीं आयी है। इससे सीजनल व्यापार करने वाले हजारों लोगों को रोजी-रोटी का संकट हो गया है। व्यापारी व्यवसाय पर लगाया धन भी वसूल नहीं कर पाये है। नगदी फसलों के लिए प्रसिद्ध यमुना व गंगा घाटी में आलू, टमाटर, सेब, राजमा आदि फसलों को 10 करोड़ से अधिक का नुकसान हुआ है। हर्शिल, नौगाँव, पुरोला व मोरी क्षेत्र के काश्तकारों के समक्ष आजीविका का संकट हो गया है। सरकारी तंत्र पूरी तरह फेल दिखा। मौके पर पहुँचना तो दूर, सूचनाएँ तक एकत्र नहीं हो पायीं। जिले में 10 दिनों तक संचार सेवाएँ ठप रही। पुलिस व वन विभाग के वारयलेस सेट भी ठीक से काम नहीं कर पाये। इससे गंगा व यमुना घाटी के साथ बाहरी दुनिया से भी संपर्क नहीं हो पाया है। आपदा नियंत्रण कक्ष तक नहीं खोला गया। आपदा प्रबंधन विभाग में सेवन डेस्क सिस्टम भी पूरी तरह फेल दिखा। सड़कें बंद होने से मिट्टी तेल, पेट्रोल, डीजल, गैस, राशन व सब्जी आदि की आपूर्ति चरमराने से भी आपदा प्रबंधन पर सवाल उठे। बाजार में दैनिक वस्तुओं के लिए मारामारी दिखी। कालाबाजारी रोकने में प्रशासन पूरी तरह असफल रहा।
अंतर्राष्ट्रीय सीमा से चीन से लगे उत्तरकाशी जनपद में पूरे 10 दिनों तक गंगा व 17 दिनों तक यमुना घाटी का देश-दुनिया से संपर्क कटा रहा। इससे सामरिक दृष्टि के इस जनपद में सुरक्षा पर भी सवाल उठे हैं। खास कर सेना का रसद समेत आवाजाही बंद होने से खासी दिक्क्तें र्हुइं। गंगोत्री-यमुनोत्री धाम के अलावा सीमा क्षेत्रों में इस दौरान नजर रखने में पुलिस व सेना को भी दिक्कतें हुई है, इससे जनपदवासियों में भविष्य के प्रति खासा डर है।
प्राकृतिक आपदा के साथ लोग मानवजनित आपदा से भी प्रभावित हुए। बारिश से गंगा के उफान पर आने से एक पखवाडे तक बाढ़ जैसी स्थिति बनी रही। टिहरी बाँध प्रभावित चिन्यालीसौड़ के 50 गाँवों को जोड़ने वाला देवीसौड़ पुल डूबने से आज तक संपर्क कटा हुआ है। प्रतापनगर व गाजणा पट्टी के सैकडों गाँव भी टिहरी बाँध झील से उपजी आपदा की चपेट में आये हैं। मनेरी भाली प्रथम व द्वितीय चरण से भी कई क्षेत्र आपदा की जद में आने से लोग बरसात में दहशत में रहे। द्वितीय चरण के जोशियाड़ा जलाशय में सुरक्षा कार्य न होने से यहां आवासीय बस्ती के लोग बारिश के दिनों चैन की नींद नहीं सो पाये।