चुनावी साल में तथाकथित लोक लुभावन योजनाओं की घोषणा, उनका सही क्रियान्वयन जाने बिना ही कर देना भारतीय राजनीति का एक विद्रूप चेहरा है। उत्तराखंड में जारी अटल खाद्यान्न योजना ने भी इस सच को साबित किया है। जीडीपी में कथित रूप से अव्वल रहे उत्तराखंड की अंदरुनी हालत का सच भी इस योजना ने खोलकर रख दिया है। राज्य में यहाँ के वासिन्दों की स्थिति अन्त्योदय से ऊपर नहीं है। उस पर भी मुलम्मा ये है कि राज्य चहुँमुखी प्रगति कर रहा है।
दरअसल उत्तराखंड में स्वामी से लेकर निशंक तक के सभी मुख्याओं ने दास और सशंक का वातावरण दिया है। सूबे के इन मुखियाओं का अपने व अपने धंधों को बचाए रखने के लिए एक पैर हाइकमान के आंगन दिल्ली में हर वक्त मौजूद रहता है। ऐसा कपोल-कल्पित नहीं बल्कि उत्तराखंड के पाँचों मुख्यमंत्रियों ने साबित कर दिखाया है। हाल ही में जारी अटल खाद्यान्न योजना भी इस तरह की क्षुद्र राजनीति और कुप्रबन्धन का खासा नमूना है। इस योजना के नामकरण को लेकर ही गिरे हुए तबके की राजनीति की बू आती है। उत्तराखंड में कृषि, सिंचाई, पर्यावरण और जनसंघर्षों के लिए न्यौछावर हो गये ऐसी विभूतियों की लंबी फेहरिस्त है जिनके नाम पर इस योजना का नामकरण हो सकता था। शायद ये नाम भाजपा को वोट नहीं दिला सकते थे। वैसे अच्छा ही हुआ कि विवादों में घिरी इस खाद्यान्न योजना को उत्तराखंड की विभूतियों के नाम से नहीं जोड़ा गया।
इस योजना में हो क्या रहा है इसे जानने से पहले यह जानना जरूरी है कि केन्द्र से लेकर राज्यों तक की सरकारें किस मजबूरी में जन वितरण प्रणाली (पीडीएस) को ढो रही हैं। दरअसल जनकल्याणकारी राज्य की लोकतांत्रिक अवधारणा में जनता को मूलभूत सुविधायें मुहैया कराना राज्य व्यवस्था का महत्वपूर्ण दायित्व है और पीडीएस इसी का एक महत्वपूर्ण घटक है। लेकिन आजाद भारत के छः दशक की व्यवस्थाओं का इतिहास बताता है कि यहाँ पर जन वितरण प्रणाली ने सदा से ही उपभोक्ताओं के हितों पर प्रहार किया है। अटल खाद्यान्न योजना के शुरू होने से एक माह के भीतर राज्य में अफरा-तफरी और कुप्रबन्धन की जो तस्वीर निकल कर आई है उसके मुताबिक चुनावी वर्ष में भाजपा की यह वोट दिलाऊ योजना उसे ही भारी पड़ने जा रही है। इस राज्य का दुर्भाग्य है कि किसी भी हाकिम ने यहाँ की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था को समझने की कोशिश नहीं की। यहाँ पर पड़त-बेपड़त, बंजर के बीच ही बेहद उपजाऊ जमीन भी बहुत है और अटल खाद्यान्न योजना में देखा जा रहा है कि चार रुपये किलो गेहूँ और छः रुपया किलो का चावल कार्ड धारकों ने जानवरों के लिए खरीदा है क्योंकि इतनी गिरी हुई दरों में तो भूसा भी नहीं मिल रहा है तब इस योजना की जमीनी हकीकत आखिर है क्या ?
वितरण के जो मानक तय हैं और जो वास्तव में वितरित हो रहा है उसमें एक और चार का अनुपात है। पाँच जनों के परिवार को प्रतिमाह 35 किलो खाद्यान्न का मानक है और उसे वास्तव में नौ किलो मिल रहा है। जबकि ऐसे परिवार की वास्तविक आवश्यकता 50 किलो प्रति माह की होती है। ऐसे में इस परिवार को 41 किलो के लिए बाजार पर ही निर्भर होना पड़ रहा है। तब कैसे कहा जा सकता है कि सरकारी जन-वितरण प्रणाली का लाभ हो रहा है। एक माह के भीतर ही राज्य के कुछ हिस्सों में देखा गया है कि दो रुपये किलो गेहूँ और चार रुपये किलो चावल के लिए चिन्हित बीपीएल श्रेणी का खाद्यान्न लोगों के घरों तक नहीं पहुँच रहा है। तथ्य बताते हैं कि यह खाद्यान्न वितरक और कार्ड धारकों की सहमति से कालाबाजारी की भेंट चढ़ रहा है और मुफ्त के पैंसे से इन दिनों पहाड़ में शराबखोरों की संख्या में एकाएक बढ़ोत्तरी हुई है। अब ऐसे में इन योजनाओं के संचालन और वास्तविकताओं पर प्रश्नचिन्ह उठ खड़ा होता है। उत्तराखंड के परिप्रेक्ष्य में देखा जाये तो यहाँ पर जमीन की उर्वरता और यहाँ के वासिन्दों की श्रम-क्षमता राज्य के भीतर सरकारों द्वारा संचालित दान-अनुदान और सब्सिडी की योजनाओं के चलते ही कुप्रभावित हुई हैं। वास्तव में यहाँ पर निर्धारण और व्यवस्थापन की दरकार है यदि ऐसा हो सका होता तो सर्व-सुलभता के बीच सस्ते-महंगे की खाई स्वतः ही समाप्त हो जाती लेकिन अटल खाद्यान्न योजना ने इस खाई को बढ़ाने-फैलाने का काम किया है। इसके सही संचालन और क्रियान्वयन के लिए जरूरी है कि पहले आवश्यकतानुसार खाद्यान्न की उपलब्धता सुनिश्चित की जाये, फिर जन वितरण प्रणाली को दुरुस्त कर प्रत्येक घर तक आवश्यकता के मध्येनजर खाद्यान्न दिया जा सके। लेकिन वोट बैंक में सैंध लगाये राज्य के धृतराष्ट्रों को कदाचित यह उपाय अमल में लाने की फुर्सत हो सके।