लेखक : गिरीश तिवाड़ी 'गिर्दा' :: अंक: 10 || 01 जनवरी से 14 जनवरी 2010:: वर्ष :: 33 :January 9, 2010 पर प्रकाशित
वक्त का सिलसिला यों ही चलता रहा
और करता रहा बागियों को सलाम !
यों गुजरता रहा रात-दिन जुल्म से
हर बगावत से पाता नया इक मुकाम।
अपने–अपने समय के मेरे बागियो
इस समय का तुम्हारे समय को सलाम !
हर बगावत ने जो भी नया कुछ रचा-
गीत, नग्मा, रुबाई, गजल को सलाम !
सिलसिलों को सलाम, मंजिलों को सलाम
आने वाले तेरे-मेरे कल को सलाम !
साल का एहतेराम
‘गिर्दा’ गिरीश तिवाड़ी
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नया साल / नयी संस्कृति
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