अब हम दीवाली में निठल्ले जैसे ही रहते हैं….
चार साल पहले तक हम लोग महालक्ष्मी पूजा के दिन चवन्नी फुलबोट का फल्लास खेलते रहे। लोग मजाक उड़ाते थे कि चवन्नी का जुआ भी कोई जुआ होता है करके। लेकिन हम भी निहायत जिद्दी ठहरे ! अब तो खैर रिजर्व बैंक ने ही चवन्नी को चलन से बाहर कर दिया है। हमारी ‘खली’ को पहला बड़ा झटका तब लगा, जब एक शानदार खिलाड़ी विनोद चौधरी भगवान को प्यारे हो गये। फिर हरीश पंत के हल्द्वानी विस्थापित हो जाने से हमारा दीवाली के जुए का ‘फड़’ पूरी तरह बंद हो गया। और अब गिरदा के गुजर जाने के बाद तो फल्लास के बारे में सोचने को भी मन नहीं करता। गिरदा जैसा ब्लफ मास्टर कहाँ से आयेगा ?
सो औरतें जब ‘सिंगल’ बनाने और गन्ने के टुकड़ों से लक्ष्मी बना कर उसे सँवारने में व्यस्त रहती हैं और बच्चे या तो फूलों की मालायें गूँथने या शाम के लिये अपनी आतिशबाजी की स्टॉक टेकिंग’ में मशगूल रहते हैं, हम अखबार और पत्रिकायें पढ़ते हुए ही वक्त काटा करते हैं। इतनी फुर्सत अब कम ही नसीब होती है, अन्यथा सामान्यतः तो इकठ्ठा होने वाली पाठ्य सामग्री का 60 प्रतिशत हमेशा अनपढ़ा ही रह जाता है। तो इस बार की दीवाली में भी हम बधाई के एस.एम.एस. देखते हुए, अखबार और पत्रिकायें पढ़ते हुए ताजा घटनाओं की जुगाली करते रहे….
लीबिया के तानाशाह कर्नल मुअम्मर गद्दाफी के मरने की खबर ने सबसे पहले ध्यान खींचा। मरने की नहीं, बल्कि उनके मरने के बाद वहाँ की क्रांतिकारी परिषद् द्वारा लीबिया में शरीयत कानून लागू करने की घोषणा से। गद्दाफी तानाशाह थे तो थे, आधुनिक सोच वाले भी तो थे। तो क्या हर किसी क्रांति का यही हस्र होता है ? क्या पिछले बसन्त में ट्यूनीशिया और मिश्र में आया जन उभार भी इस्लाम के ही रास्ते को जायेगा ? क्या अण्णा हजारे ने जो उम्मीदें जगाई थीं, वह भी इसी तरह गटर में बह जायेंगी ? 21वीं सदी, जिसे ज्यादा वैज्ञानिक सोच वाला होना चाहिये था, में भी ये साम्प्रदायिक ताकतें क्यों इस तरह मजबूत हो रही हैं ? हमारे बुजुर्गों के लालच और जल्दबाजी के चलते मजहब पर आधारित पाकिस्तान बना। कश्मीर समस्या को सुलगाये रख कर पाकिस्तान ने अपना वजूद बनाये रखा। फिर जिया उल हक के जमाने में मुल्ला-मौलवियों का वर्चस्व बढ़ा, अफगानिस्तान में रूस-अमेरिका की खींचतान के बीच तालिबान मजबूत हुआ और आज पाकिस्तान एक बिखरता हुआ राष्ट्र है। हमारे देश का आतंकवाद तो पाकिस्तान के आतंकवाद के सामने चूहा है। वहाँ पिछले दस सालों में हजारों लोगों ने आतंकी हमलों में अपने प्राण खोये हैं। सीमान्त के कबीलाई इलाकों में तो पाकिस्तान की संघीय सरकार का कोई अस्तित्व ही नहीं है। मगर हमारा सोच ऐसा बन पड़ा है कि पाकिस्तान की दुर्दशा पर हमारी बाँछें खिल जाती हैं। हिलेरी क्लिंटन पाकिस्तान की विदेश मंत्री हिना रब्बानी को हड़काती हैं तो हम गद्गद हो उठते हैं। यहाँ तक कि अण्णा हजारे, जिनसे करोड़ों लोग उम्मीदें पाले हैं, भी पाकिस्तान से लड़ने की बात कर देते हैं। अब वहाँ कट्टरपंथियों का वर्चस्व हो गया है तो वहाँ का जन सामान्य क्या करे ? तभी तो वहाँ के किसी ब्लॉगर ने लिखा कि हम तो अण्णा हजारे को गांधी जैसा समझते थे, लेकिन वे तो युद्ध की बातें करने लगे!
होना तो यह चाहिये था कि पाकिस्तान के बन जाने के बाद भारत में साम्प्रदायिकता जड़ से खत्म हो जानी चाहिये थी। लेकिन हुआ ऐसा कि आजादी से पहले मुस्लिम साम्प्रदायिकता की प्रतिक्रिया में जो हिन्दू साम्प्रदायिकता जन्मी थी, वह आजादी के बाद के पैंसठ सालों में इतनी ताकतवर हो गई कि हमारे समाज का कोई हिस्सा उससे अछूता नहीं बचा है। वह विचारधारा अब प्रशान्त भूषण को कश्मीर पर एक बयान, जो हमारी नजर में कतई गैर वाजिब नहीं है, देने पर ही उन्हें उनके दफ्तर में जाकर पीट सकती है और हमारा समाज ऐसे अपराधियों को बर्दाश्त भी कर ले जाता है। क्या गलत कहा प्रशान्त भूषण ने ? क्या आप सिर्फ बन्दूक के बल पर देश के एक हिस्से को अपने अधीन रख सकते हो ? हाल में एक सज्जन हमारे सामने अपना दुखड़ा रोने आये। उन्हें शिकायत थी कि उनके निर्दोष होने के बावजूद पुलिस ने उनके घर की तलाशी ली। संयोग से हमारे साथ एक तेज तर्रार नौजवान थे। उन्होंने तपाक से कहा कि क्या हुआ जो तलाशी ले ली। एक ही तलाशी से हलाकान हो गये आप ? कश्मीर में होते तो रोज ही आपकी ऐसी तलाशी ली जाती। घर में, सड़क पर, बाजार में……। हो सकता है आपको गोली ही मार दी जाती। अभी हाल ही में वहाँ हजारों ऐसी कब्रें मिली हैं, जिनमें किस-किस को दफनाया गया, पता ही नहीं है।….दिक्कत यह है कि भारत के अच्छे-खासे पढ़े-लिखे लोग भी अधकचरी जानकारी रखते हैं। न मानवाधिकार की दृष्टि से सोच सकते हैं, न वैज्ञानिक ढंग से …..बस एक भीड़ बन कर रहना चाहते हैं। एक साम्प्रदायिक भीड़!
वैसे वैज्ञानिक सोच भी वैज्ञानिक कहाँ रहा अब ? अभी नेपाल के प्रधानमंत्री भट्टराई भारत आये थे। अखबारों की मानें तो वे हरिद्वार में सिडकुल को देख कर गद्गद हो गये। अब बतायें ? भट्टराई माओवादी विचारधारा के बतलाये जाते हैं। माओवादियों ने सालों तक सशस्त्र युद्ध छेड़ कर नेपाल को राजतंत्र से मुक्त कराने में निर्णायक भूमिका निभाई थी। भारत के माओवादी ही नहीं, अनेक वामपंथी बुद्धिजीवी भी उनके मुरीद हैं। हम भी उन्हें इज्जत की दृष्टि से देखते थे। वे ही क्रांतिकारी नेता सिडकुल यानी सेज (स्पेशल इकॉनॉमिक जोन) के सोच से प्रभावित होकर उसी मॉडल को अपने वहाँ भी लागू करने का इरादा करने लगें तो हम उन्हें लानत भेजने के अलावा क्या कर सकते हैं ? यहाँ, भारत में तमाम आन्दोलनकारी सेज और भूमि अधिग्रहण के खिलाफ और जल, जंगल, जमीन बचाने के लिये अपनी सारी ताकत झोंक रहे हैं और नेपाल का वामपंथी प्रधानमंत्री विकास के इस विनाशकारी मॉडल की शान में कसीदे पढ़ रहा है। चीन में भी तो यही हो रहा है। कम्युनिज्म के नाम पर निकृष्ट पूँजीवाद! अब तो दिवालिया होते यूनान को बचाने के लिये यूरोपीय यूनियन तक चीन के आगे हाथ फैला रही है। अभी किसी ने बताया कि कामरेड प्रचंड भी टिहरी बाँध से बहुत ज्यादा प्रभावित हुए थे। स्पष्ट है कि नेपाल में क्रांति का गर्भपात हो गया है।
केन्द्र सरकार अण्णा हजारे के आन्दोलन को बदनाम करने के लिये जुटी तो उसने यहाँ तक पता लगा लिया कि किरण बेदी ने एक नगर का दौरा करने के लिये दो आयोजकों से अलग-अलग यात्रा भत्ता ले लिया और यात्रा भी रियायती दरों पर की। किरण बेदी लाख कहें कि उन्होंने यह पैसा अपने लिये नहीं, अपनी संस्था के लिये लिया है, मगर भ्रष्टाचार तो हो ही गया। वहीं एक दूसरे अध्यापक पकड़े गये जो अपनी कक्षायें तो पढ़ाते नहीं, लेकिन अण्णा के कार्यक्रमों में मंच संचालन करते हैं। अब इस सब को भ्रष्टाचार की सीमा में समेटने लगें तो हो गया काम! पटवारी-पेशकार दस्तूरी न लें, ओवरसियर कमीशन न खायें तो बचेगा क्या ? हम तो साठ-सत्तर हजार रुपये पाने वाले विश्वविद्यालयी अध्यापकों को पढ़ाने के बदले टी.ए.-डी.ए. का हिसाब जोड़ते हुए ही देखते हैं। अलबत्ता देश-दुनिया के बारे में वे बातें बहुत आदर्शवादी किस्म की करते हैं। एक ऑडिटर ने एक बार हमें बताया कि कुमाऊँ विश्वविद्यालय के अल्मोड़ा परिसर से किसी बैठक में भागीदारी करने चार अध्यापक नैनीताल आयें तो वे अलग-अलग टैक्सियों का भाड़ा वसूल करते हैं, आते भले ही एक ही टैक्सी में हैं। पिछले दिनों विश्वविद्यालय के अध्यापकों की हड़ताल के दौरान सोबन सिंह जीना परिसर के रसायन विज्ञान के एक अध्यापक ने नैतिक आधार पर इस हड़ताल का विरोध किया तो अब सारे गुरुजन सत्ताधारी पार्टी के नेताओं की मदद से उनकी नौकरी लेने के लिये जुट गये हैं। नैतिकता की बात करोगे ? तो भुगतो!……तो किस-किस को भ्रष्टाचारी मानेंगे आप ? यदि अण्णा आन्दोलन में जलूसों में भाग लेने वाले लाखों लोग अपने सामान्य आचरण में इतने ही नैतिक और ईमानदार हो जाते तो हमारे समाज में कलमाडी और राजा पैदा ही कैसे हो सकते थे ? तो अण्णा हजारे के आन्दोलन का ताजा हाल देखिये। पहले मीडिया ने उसके गुब्बारे में इतनी हवा भरी और अब धीरे से सुई भी चुभो दी है। जितना मजा उसने उस आन्दोलन का जयनाद करने में लिया, उससे कम मजा उसे टीम अण्णा के आपसी अन्तर्विरोधों का भंडाफोड़ करने में नहीं आ रहा है।
एक खबर पढ़ी कि भारतीय क्रिकेट टीम ने एक दिवसीय श्रृंखला में इंग्लैंड का पाँच शून्य से सफाया कर देश को दीवाली की सौगात दी है। हम ज्यादा समझे नहीं। अभी-अभी तो इंग्लैंड ने हमारी टीम को इतनी बुरी तरह धोया था। फिर यह जीत सौगात कैसे हो गई ? दरअसल हमें क्रिकेट खेल जैसा अब लगता नहीं। बाजार और अखबार ने इसे जुआ बना दिया है। खेल तो हजारों हैं…..खो-खो, कबड्डी से लेकर टेनिस-फुटबॉल तक। अब कबड्डी हमारे और हमारे दो-तीन पड़ौसी देशों में ही खेली जाती है तो उसमें हमारा कोई सानी नहीं होता। फुटबॉल चूँकि दुनिया के लगभग सारे ही देश खेलते हैं, इसलिये जाहिर है कि उसमें हम नीचे से दसवें-बारहवें नंबर पर कहीं ठहरे रहते हैं। तो हिन्दुस्तान का बाजार फुटबॉल उछालने में कैसे जुट सकता है ? तो रह गया अंग्रेजों की विरासत, आठ-दस देशों के बीच खेले जाने वाला खेल क्रिकेट, जिसके पीछे बाजार चिपका पड़ा है। बाजार होगा तो बाजार का ध्वजावाहक मीडिया होगा ही। कहा जाने लगा है कि भारत में ‘क्रिकेट’ अब एक धर्म है। बुनियादी सत्य यह है कि किसी भी खेल का मजा उसकी प्रतिस्पर्धात्मकता में है, खेलने वाले के लिये भी और देखने वाले के लिये भी। पैसा उसमें कहीं नहीं आता। उसकी जोर आजमाईश ही उसमें मजा पैदा करती है। हम जब चवन्नी फुलबोट का फल्लास खेलते थे तो आज के दस रुपया फुलबोट से कहीं ज्यादा मजा उसमें आता था। अभी-अभी कहीं पढ़ा कि बिशन सिंह बेदी को अपनी पहली टैस्ट श्रृंखला में अढ़ाई सौ रुपये फी टैस्ट के हिसाब से मिलते थे और एक बार एक टैस्ट मैच चार ही दिन में खत्म हो गया तो उनके मेहनताने में से पचास रुपये काट लिये गये। तो क्या मान लें कि बेदी करोड़ों रुपये कमाने वाले हरभजन सिंह उर्फ ‘भज्जी’ से कमतर स्पिनर थे ? क्रिकेट में बरसने वाले पैसे ने अन्य खेलों की रेढ़ मार कर रख दी है। हमने सोच रखा है कि अपन को सिर्फ एक हफ्ते के लिये हिन्दुस्तान का प्रधानमंत्री बनने का मौका मिल जाये तो हम सबसे पहले ऐसा कानून बनायेंगे कि क्रिकेट से जितना पैसा कमायेंगे उसे बाकी खेलों को बढ़ावा देने में खपा देंगे।
….और अब इसी हफ्ते यह फार्मूला वन की रेस भारत में शुरू होने वाली है। अखबारों में जबर्दस्त जय-जयकार शुरू हो गया है। हम अमेरिका-यूरोप से कम हैं क्या ? हम दुनिया की उभरती हुई महाशक्ति हैं। वे कार रेस कर सकते हैं तो हम क्यों नहीं कर सकते ? मगर क्या कोई सोच रहा है कि हमारे छोटे-छोटे कस्बों में इसका क्या असर होगा ? अभी ही, जबकि उन्हें टी.वी. पर रेसिंग देखने का चस्का नहीं लगा है, हमारे नौजवान तेज रफ्तार गाडि़यों से पैदल चलने वालों के प्राण हर लेते हैं, उन्हें अपंग बना डालते हैं। अब टी.वी. पर वे रेस देखेंगे। चैनल उन्हें देखने के लिये मजबूर करेंगे। आप देखते नहीं कि टीवी की मेहरबानी से बच्चे अब गाँवों के खाली पड़े खेतों में गुल्ली-डंडा नहीं, क्रिकेट खलते हैं। और जब अपने आप को शुमाकर और कार्तिकेयन समझते हुए हमारे बड़े बापों के बददिमाग नौजवान और तेज गाडि़याँ दौड़ायेंगे तो और ज्यादा दुर्घटनायें करेंगे। हमारा पुलिस तंत्र अमेरिका-यूरोप जितना सख्त और चौकन्ना तो है नहीं कि तेज रफ्तार या गलत पार्किंग पर बगैर छोटे-बड़े का लिहाज किये फटाफट ‘टिकट’ पकड़ा दे। हम हर चीज में पश्चिम का ‘होसुक’ करने लगें और मनमोहन सिंह और मोंटेक सिंह अहलूवालिया जैसे हमारे भाग्यविधाता हों तो ऐसी ही विपदायें तो आयेंगी।
…..खबरें तो जाने कितनी हैं। उनको लेकर जुगाली भी की जा सकती है। लेकिन अब दीवाली खत्म होने को आ रही है। वैसे हम अपने पाठकों से यह कहना अवश्य चाहेंगे कि खबरों को सिर्फ पढ़ें नहीं, उन्हें लेकर जुगाली करने की आदत डालें।