बागेश्वर में कई बड़ी घटनाओं को दबा दिये जाने से जनता हैरत में है। 22 जून को अनुसूचित जाति/जनजाति आयोग के अध्यक्ष चनर राम के पास गरुड़ तहसील की एक महिला ने आकर बताया कि बैजनाथ थाने के थानेदार सीएस बिष्ट ने उससे फोन पर अभद्र बातचीत कर धमकाया। महिला ने थानेदार की बातचीत की मोबाइल रिकार्डिंग चनर राम को सुनाई तो वे भी सन्न से रह गए। उन्होंने जिलाधिकारी व एस.पी. एम. मोहसिन को कार्यवाही करने के निर्देश दिये। महिला आश्वस्त हुई कि चलो बदनीयत थानेदार के खिलाफ कुछ कार्यवाही तो होगी ही। जनता तक भी यह खबर पहुँच गई। सभी इस इंतजार में थे कि निरंकुश थानेदार अब लाईन पे आ जाएगा। मजेदार बात है कि यह खबर किसी भी अखबार में नहीं छपी। अखबारनवीसों ने चुप्पी साध ली। इसको लेकर नवागंतुक एस.पी. महोदय ने बाद में सभी पत्रकारों का बाकायदा आभार व्यक्त किया। जनता को एस.पी. से ऐसी उम्मीद नहीं थी। वर्षों बाद तो बागेश्वर को एक आई.पी.एस. मिला है। इस प्रकरण से यूकेडी के जिलाध्यक्ष हेम पंत व्यथित थे। शायद उन्हें मालूम नहीं था कि थानेदार के पक्ष में कांग्रेस के कई नेताओं समेत सांसद महोदय भी एस.पी. साहब को फोन से हिदायत दे चुके थे कि थानेदार पर कोई कार्यवाही नहीं होनी चाहिए। हालाँकि अब सांसद महोदय इस प्रकरण से अनभिज्ञता जाहिर कर रहे हैं। अब थानेदार जी का कांग्रेसी नेताओं की मदद से झिरोली थाने में तबादला हो गया है।
दूसरी घटना जो अखबारों में जगह नहीं पा सकी, सूचना के अधिकार से जुड़ी है। सूचना आयोग ने एक मामले में जिला प्रशासन को आवेदक को सूचना उपलब्ध कराने के साथ ही 15 हजार का जुर्माना अदा करने के निर्देश दिए हैं। जिले का एकमात्र मारुति सर्विस सैंटर प्रशासनिक गाड़ियों की सर्विसिंग हेतु भी अधिकृत है। बावजूद इसके प्रशासन की गाड़ियाँ यहाँ नहीं आतीं। आवेदक द्वारा इसका कारण सूचना के अधिकार के तहत् जानना चाहा तो उसे कोई भी जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई। आवेदक द्वारा अपील किये जाने पर आयोग द्वारा प्रशासन को तलब कर लिया गया। गरुड़ के एसडीएम कृष्ण कुमार को इस मामले में आयोग की फटकार भी सुननी पड़ी। इसके बाद ही जिलाधिकारी को मामले का पता लगा। उन्होंने अपने मातहतों को जम कर लताड़ लगाई और आवेदनकर्ता को राजीनामे के लिए मना लिया। डी.एम. की झाड़ से अपमानित मातहतों ने अब आवेदनकर्ता को नोटिस भिजवाया है कि उसकी दुकान से नदी प्रदूषित हो रही है। अब आवेदनकर्ता को सूचना का अधिकार कानून की कठोर सच्चाई समझ में आ रही है और पत्रकारों का चरित्र भी।
बागेश्वर में शराब अब सर्वत्र सुलभ है। दारू की दुकानों के पास दुकान बंद होने के बाद भी दारू कुछ ऊँची कीमत पर मिल ही जाती है। दारू की कीमतों में अघोषित रूप से उछाल भी आया है। प्रशासन की शह शराब विक्रेताओं को मिली हुई है। कभी-कभार ही ये खबरें अखबारों में छपीं। एक वकील साहब ने सूचना का अधिकार के तहत जानकारी भी माँगी। लेकिन दारू फिर भी प्रिन्टेड रेट से ज्यादा कीमत पर बेची जा रही हैं। आबकारी विभाग खामोश बैठा है। पुलिस को ये सब नहीं दिखता है। नये कप्तान को जब पत्रकारों ने शराब का यह वीभत्स चेहरा दिखाया तो उन्होंने हाथ खड़े कर दिए कि हमारा काम तो सिर्फ सरकार की नीतियों का पालन करवाना है। इतनी बड़ी समस्या को लेकर हर स्तर पर एक खामोशी है।


























आपकी टिप्पणीयाँ