तुम्हारे बच्चे , तुम्हारे बच्चे नहीं हैं
वे जीवन की अपने ही प्रति इच्छा के बेटे और बेटियाँ हैं
हालांकि वे तुम्हारे साथ हैं, तुम्हारे नहीं हैं
तुम उन्हें अपना प्यार दे सकते हो
अपने विचार नहीं,
क्योंकि उनके पास अपने विचार हैं।
तुम उन जैसे बनने की
कोशिश कर सकते हो,
पर उन्हें अपने जैसा बनाने की
कोशिश न करो।
- खलील जिब्रान
निबंध प्रतियोगिता के माध्यम से बच्चों के मनोजगत में झाँकने की नैनीताल समाचार की इस उन्नीसवीं कोशिश में कनिष्ठ वर्ग (कक्षा 4,5,6) हेतु विषय था ‘इन कार स्कूटरों से परेशान हैं हम’। अराजक ट्रैफिक से पैदा हो रही परेशानियों, कारणों और सर्वोपरि समाधान -समस्या के किसी भी पहलू पर अपनी बात कहने में बच्चों ने इतनी परिपक्वता दिखाई है कि हम तथाकथित बड़ों को तमाम मोर्चों पर अपनी ही नाकामियों के कारण चारों ओर से घिर रही निराशा और अकर्मण्यता में भी उम्मीद दिखाई देती है। अपने परिवेश के प्रति इन बच्चों की जागरूकता, स्थितियों / परिस्थितियों पर प्रतिक्रिया और अभिव्यक्ति की क्षमता सभी आयामों पर निम्नांकित उद्धरण पर्याप्त प्रकाश डालते हैं:
‘जब छात्र घर से निकलते हैं स्कूल जाने के लिए तब तरह तरह के जहरीले धुंए से उन्हें गुजरना पड़ता है, तरह-तरह की डरा देने वाली आवाजें सुनने को मजबूर होते हैं…. फेफड़े खराब हो जाते हैं…सोचने की शक्ति कम हो जाती है और पढ़ने में मन नहीं लगता।’
गौरव कुमार, कक्षा 6, पार्वती प्रेमा जगाती, सरस्वती विहार
‘इन कारों स्कूटरों से परेशान हैं हम क्योंकि इनके धुएँ से वायु प्रदूषण और हॉर्न से ध्वनि प्रदूषण फैलता है।
कु. शिवानी, कक्षा 5 अ, भारतीय शहीद सैनिक विद्यालय
‘अगर सड़क पर जाम है तो भी आप जोर-जोर से हॉर्न बजाते हो…आपको यह नहीं पता कि किसी के कानों को नुकसान पहुँचता है।’
कु. रोशनी सिंह, मोहन लाल साह बाल विद्या मंदिर ‘
इनके कारण हम छोटे बच्चे घुटन तथा अनेक परेशानियों का सामना बड़े वैभव के साये में करते हैं…अरे दुष्टों ! जरा समझो इस अनमोल जीवन की अहमियत….जो 81 लाख जीवनों के बाद आता है।’
बसु गोपाल, कक्षा 6 ब, पार्वती प्रेमा जगाती सरस्वती विहार, दुर्गापुर‘
नैनीताल जैसी जगह में भी आजकल इतनी कारें और स्कूटर हो गए हैं कि लोगों को चलने में बहुत परेशानी हो रही है….ये यहीं के लोगों के पास हैं और वे इनका कुछ ज्यादा ही इस्तेमाल करते हैं।’
कु. किरन रौतेला, कक्षा 6 ब, ऑल सेंट्स कॉलेज, नैनीताल
‘टाटा, महिन्द्रा, हौण्डा, हूण्डाई जैसी कम्पनियाँ रोज नई-नई कारों और स्कूटरों को बनाते हैं। किन्तु कभी ये सोचते हैं कि प्रदूषण फैलाने में इनका सबसे बड़ा हाथ होता है। कभी नहीं, क्योंकि इन्हें तो सिर्फ पैसे कमाने से मतलब है….सारा दोष कम्पनियों का भी नहीं है भारत सरकार भी इसकी जिम्मेदार है।’
ध्रुव साह, कक्षा 6, लौंग व्यू पब्लिक स्कूल, नैनीताल
‘इस्तेमाल भी यही करते हैं परेशान भी यही होते हैं….इस्तेमाल करोगे तो पेट्रोल, डीजल के दाम बढ़ेंगे ही और फिर यही लोग बोलते हैं महंगाई आ गयी।’
कु. ऋचा त्रिपाठी, कक्षा 6, मोहन लाल साह बाल विद्या मंदिर
‘आजकल के लोग इन कारों, स्कूटरों, बाइकों आदि के इतने शौकीन हो गए हैं कि वह एक दो नहीं वरन चार-चार वाहन खरीद रहे हैं।’
वरुण मौर्य, कक्षा 6, लेक्स इंटरनेशनल, भीमताल
‘हमारे फ्यूल ,पेट्रोल आदि दिन ब दिन कम होते जा रहे हैं। हमें उन लोगों के बारे में भी सोचना चाहिए जो अभी पृथ्वी पर आने वाले हैं….अगर हम खुद इतना ज्यादा इस्तेमाल करेंगे तो उनके लिए कुछ नहीं बचेगा।’
कु. श्रेया त्रिपाठी, 6 अ, सेंट मेरीज कॉन्वेंट, नैनीताल
परेशानियों और कारणों के बाद समस्या के समाधान का जिक्र इन निबंधों में तलाशा जाये तो निजी वाहनों के संयमित उपयोग, सुविधाजनक सामुदायिक परिवहन से लेकर वैकल्पिक ईंधन तक के सभी संकेत बाकायदा मौजूद हैं।
‘आजकल हमने पैदल चलना छोड़ दिया है क्योंकि हर जगह के लिए गाड़ियाँ…. मोटर बाइक, स्कूटर से हम पहाड़ों पर भी बैठे बैठे चल सकते हैं……पास की जगहों में जाने के लिए कार, स्कूटर की जगह बस अथवा ट्रेन से जाना चाहिए। पर्यावरण व पैसे दोनों बचेंगे….गाड़ियों को समय समय पर प्रदूषण निरीक्षण के लिए ले जाते रहना चाहिए।’
मिलिन्द त्रिपाठी, कक्षा 5, लौग व्यू पब्लिक स्कूल, नैनीताल
‘जब हम कहीं जाने के लिए निकलते हैं और अकेले होते हैं तब अपनी गाड़ी ले जाने की बजाय हम बस से भी जा सकते हें। तेल बचेगा, ट्रैफिक जाम नहीं लगेगा, प्रदूषण कम होगा।’
कु. वैशाली भट्ट, 6 ब, ऑल सेंट्स कॉलेज, नैनीताल।
पर्यटक यदि बस से आयें तो अच्छा होगा। आप लोग यदि बस से आयेंगे तो आपकी इज्जत को कुछ नहीं होगा। वैसे अगर घरती ही नहीं रहेगी तो आप इज्जत का क्या करेंगे।’
कु. रोशनी सिंह, कक्षा 6, मोहन लाल साह बाल विद्या मंदिर।
‘विद्युत रेलगाड़ी/बस…बैटरी से चलने वाली मोटर साइकिल…।’
अंकित जसवाल, कक्षा 6, पार्वती प्रेमा जगाती सरस्वती विहार।
‘आप सोचिए अगर पचास लोग अपने अपने वाहन से कार्य को जायेंगे तो कितना धुआँ होगा और यही पचास लोग एक सरकारी वाहन (बस) से जायेंगे तो हमारा पर्यावरण कितना बचेगा।’
गौरव तिवारी, कक्षा 6, लेक्स इंटरनेशनल स्कूल, भीमताल।
‘वाहन का प्रयोग करना है तो साइकिल का प्रयोग करो ताकि तुम और तुम्हारा पर्यावरण भी खुश रहे।’
अभिषेक कुमार, कक्षा 6, पार्वती प्रेमा जगाती सरस्वती विहार।
समाधान के इन तमाम तरीकों के क्रियान्वन की जिम्मेदारी हम बड़ों को ही बच्चे सौंपना चाहते हैं।
‘मैं तो जो कुछ कहना चाहती थी कह दिया अब जो कुछ करना है आपको ही करना है।’
कु. अजरा नाज, कक्षा 6, निर्मला जूनियर हाईस्कूल, नैनीताल।
बच्चों की इस शानदार कोशिश पर कविता का एक टुकड़ा:
फिलहाल तो एक ….
नन्हा सा बच्चा है तू ……लेकिन तब भी
खुद ही पाना होगा अपने हिस्से का पोषण
तुझे बनाना होगा
रक्त, माँस, मज्जा और कैल्शियम
खुद ही होना होगा बड़ा और बलशाली
- शिरीष मौर्य
मध्यम वर्ग (कक्षा 7, 8, 9) के लिए विषय था ‘जलवायु परिवर्तन से बदल रही है दुनिया’। जहाँ कनिष्ठ वर्ग के निबन्धों से गुजरना उम्मीद की ओर एक यात्रा जैसा लगता है वहीं इस वर्ग के निबन्ध थोड़ा निराश करते हैं। भाषा-वर्तनी की गलतियों की यदि उपेक्षा भी कर दी जाये और सारा ध्यान विषय के प्रति प्रतियोगी की सोच एवं स्वयं को अभिव्यक्त कर सकने की क्षमता पर ही रखा जाये (जैसा आयोजक चाहते/मानते भी हैं ) तो भी एक खालीपन सा ही अंततः लगता है। अधिकांश प्रतियोगियों ने जलवायु परिवर्तन को जल परिवर्तन + वायु परिवर्तन = जलवायु परिवर्तन के रूप में देखा है, मौसम के प्रारूप में दिखाई दे रहे दीर्घकालीन बदलाव के संदर्भ में नहीं। इतना तय है कि कुछ भी लिख देने की कला कक्षा सात-आठ-नौ के विद्यार्थियों को भी आती है।
‘अगर जलवायु का परिवर्तन बंद हो गया तो इस देश का सत्यानाश हो जायेगा’/ ‘अगर जलवायु परिवर्तन नहीं होगा तो सब संसाधन समाप्त हो जायेंगे…हमें जलवायु परिवर्तन को एक आवाज लगानी चाहिए’। आदमी को अनेक मौसम में रहने की आदत हो जाती है। हर मौसम में विशेष प्रकार के फल होते हैं जिससे मनुष्य बहुत खुश हो जाता है और उसे जलवायु परिवर्तन से बड़ा मजा आता है’/‘ जलवायु परिवर्तन से हमें जलवायु के अनुसार ही भोजन करना चाहिए’/‘धूम्रपान के कारण निकलने वाले धुएँ से पर्यावरण में जहरीली गैसों का घनत्व बढ़ जाता है ’/‘अत्यधिक बरसात के मौसम में जल उबाल कर पीना चाहिए‘/‘जो स्पेसक्राफ्ट वायुमंडल में जाते हैं ओजोन लेयर में छेद करके जाते हैं’/हमारे यहाँ महंगाई का कहर है महंगाई के कारण लोग अपने लाभ के लिए दूसरों को हानि पहुँचा रहे हैं….सब्जियों को इन्जेक्शन लगा कर बड़ा कर रहे हैं’/
जहाँ तक अपेक्षाकृत गंभीर प्रतियोगियों का प्रश्न है जलवायु परिवर्तन के विविध कारकों में से मानव जनित कारकों पर ही उन्होंने अपना ध्यान केन्द्रित रखा है और तदनुसार ग्रीन हाउस ट्रैपिंग, ग्लोबल वॉर्मिंग, क्लोरो- फ्लोरो कार्बन्स, ओजोन डिप्लीशन ओद्योगिक उत्सर्जन , निर्वनीकरण , कार्बन डाई ऑक्साइड का बढ़ना आदि उनकी चिन्ताओं में शामिल हैं और अतिवृष्टि,सूखा, ग्लेशियरों का पिघलना तथा मानसून की मनमानी आदि सभी उनकी नजर में हैं।
‘औद्योगीकरण से पहले जलवायु संतुलित थी। वर्षा समय पर और पर्याप्त मात्रा में होती थी। समस्त ऋतुऐं समयानुसार बदलती थीं। …जनसंख्या वृद्धि के साथ साथ लोगों की माँगें बढ़ने लगीं फैक्टरियों के अवशिष्ट पदार्थ नदियों में छोड़े जाने लगे, भौतिकता को अधिक महत्व दे रहे हैं, हर जगह ए. सी. व कूलर हैं, विश्व आज ग्लोबल वॉर्मिंग की चपेट में आ गया है, मानसून कभी जल्दी आ रहे हैं कभी देर में। ग्लेशियर पिघल रहे है, अचानक बाढ़ आ जाती है, किसी वर्ष सूखा ही रहता है। यह सब प्रकृति द्वारा हमें दिए गये संकेत हैं कि यदि पर्यावरण संरक्षण नहीं किया गया तो भारी विनाश हो सकता है।’
कु. नेहा पंत, कक्षा 9, राजकीय बालिका इण्टर कौलेज, नैनीताल।
‘जलवायु परिवर्तन के कारण धरती का तापमान बढ़ रहा है…कई हिस्सों में सूखा पड़ रहा है। बारिश के कई वर्षों तक दर्शन नहीं होते… कहीं लगातार वर्षा तो कहीं भारी बर्फबारी।’
कु. पाखी पाण्डे, कक्षा 7 अ, सेंट मेरीज कॉन्वेंट, नैनीताल।
‘क्लोरो फ्लोरो कार्बन … सीधा ओजोन को नष्ट करते हैं। ओजोन परत में छेद हो गया है, सूर्य की घातक किरणें धरती पर प्रवेश कर रही हैं।
कु. ऋषिका अजय, कक्षा 9 ब, मोहन लाल साह बाल विद्या मंदिर, नैनीताल।
‘बरसात आने पर हमें एसिड रेन्स मिलती हैं…ताजमहल का रंग सफेद से पीला हो गया।’
कु. नुपुर भट्ट, कक्षा 7, सेंट मेरीज कॉन्वेंट, नैनीताल।
‘लोग जैसी चीजें इस्तेमाल करते हैं जैसे सैण्ट, रेफ्रिजिरेटर, वाइटनर से सी.एफ.सी. निकलती है…. ओजोन लेयर को नुकसान पहुँचा है, उसमें छेद हो गया है… फैक्टरीज में बहुत प्रदूषण हो रहा है ’
अनिकेत श्रीवास्तव, कक्षा 9, दि होली ऐंजिल्स, नैनीताल।
‘सारी प्राकृतिक चीजें एक दूसरे पर निर्भर हैं… अगर कोई एक चीज भी बदलती है तो उससे जुड़ी हुई यह पूरी दुनिया पीड़ित होती है या बदलती है।’
रोहित कुमार, कक्षा 9, पार्वती प्रेमा जगाती सरस्वती विहार।
आज की दुनिया में बहुत बदलाव आ गया है , चाहे वह इन्सान के चरित्र में हो या फिर मौसम में…कोपेनहेगन में आपसी वार्तालाप में यह तो पता चल गया कि जलवायु परिवर्तन की समस्या है किन्तु उसके समाधान के बारे में कुछ नहीं पता चल पाया।’
कु. निष्ठा पाण्डे, कक्षा 7, मोहन लाल साह बाल विद्या मंदिर, नैनीताल।
इक्कीसवीं सदी में लोग उपभोक्तावादी संस्कृति के गुलाम हो रहे हैं…गाँधी जी कहते थे, ‘सिम्पल लिविंग हाई थिंकिंग’ आज का मनुष्य कहता है ‘हाई लिविंग नो थिंकिंग’
कु. कीर्ति पाण्डे, कक्षा 9, मोहन लाल साह बाल विद्या मंदिर, नैनीताल।
हमारे पुरखों ने भले ही इस पीढ़ी को ऐडीशन के समान बिजली या राईट ब्रटर्स के समान हवाई जहाज न दिया हो किन्तु उन्होंने इस पीढ़ी को एक महत्वपूर्ण तोहफे से नवाजा – एक हरी-भरी दुनिया जहां प्रकृति और मनुष्य के बीच एक आपसी संतुलन बना रहता था।
हर्षित बिष्ट, कक्षा 9, लौंग व्यू पब्लिक स्कूल, नैनीताल
नैनीताल बैंक लिमिटेड के सहयोग से आयोजित उन्नीसवीं नैनीताल समाचार निबंध प्रतियोगिता
13 नवम्बर को ‘रिंक हॉल’ नैनीताल में सम्पन्न पुरस्कार वितरण समारोह में इस वर्ष मोहन लाल साह बाल विद्या मंदिर, नैनीताल ने चल बैयजन्ती प्राप्त की। इस वर्ष 22 अगस्त को बिशप शॉप इंटर कॉलेज में सम्पन्न हुई निबंध प्रतियोगिता में मूसलाधार बारिश के बावजूद 19 स्कूलों के 132 विद्यार्थी शामिल हुए। वरिष्ठ वर्ग में (10, 11, 12) में 52 विद्यार्थी, मध्यम वर्ग (कक्षा 7, 8, 9) में 38 तथा कनिष्ठ वर्ग (कक्षा 4, 5, 6) में 92 विद्यार्थियों ने प्रतिभाग किया।
वरिष्ठ वर्ग का विषय था – ‘क्या राष्ट्रमंडल खेल देश के लिये जरूरी हैं ?’, मध्यम वर्ग का विषय था – ‘जलवायु परिवर्तन से बदल रही है दुनिया’ तथा कनिष्ठ वर्ग का विषय था – ‘इन कारों, स्कूटरों से परेशान हैं हम’।
वरिष्ठ वर्ग के निर्णायक रहे श्री महेश पाण्डे व श्री प्रभात उप्रेती मध्यम वर्ग के निर्णायक रहे श्री भुवनेश जोशी व श्री अनिल पाण्डे कनिष्ठ वर्ग के निर्णायक रहे श्रीमती शोभा मैठाणी, डॉ. राजकुमारी भट्ट।
इस वर्ष वरिष्ठ वर्ग में प्रथम स्थान कु. रुचि भट्ट, कक्षा 11, सेंट मेरी कान्वेंट, नैनीताल। द्वितीय श्री पंकज कुमार, कक्षा 11 ब, गोविन्द बल्लभ पंत इंटर कॉलेज, भवाली, तृतीय श्री गौरव कुमार, कक्षा 10, पार्वती प्रेमा जगाती सरस्वती विहार, नैनीतील व सांत्वना पुरस्कार कु. हरसिमरन कौर रैना, कक्षा 11, मोहन लाल साह बालविद्या मंदिर, नैनीताल ने प्राप्त किया।
मध्यम वर्ग में प्रथम स्थान कु. नेहा पंत, कक्षा 9, राजकीय बालिका इंटर कॉलेज, नैनीताल। द्वितीय श्री हर्षित बिष्ट, कक्षा 9, लौंग व्यू पब्लिक स्कूल, नैनीताल। तृतीय कु. कीर्ति पाण्डे, कक्षा 9, मोहन लाल साह बाल विद्या मंदिर, नैनीताल। सांत्वना पुरस्कार कु. पाखी पाण्डे, कक्षा 7 अ, सेंट मेरी कॉन्वेंट, नैनीताल ने प्राप्त किया।
कनिष्ठ वर्ग में प्रथम पुरस्कार कु. ऋचा त्रिपाठी, कक्षा 6, मोहन लाल साह बाल विद्या मंदिर, नैनीताल। द्वितीय श्री वरुण मौर्य, कक्षा 6, लेक्स इंटरनेशनल स्कूल, भीमताल, नैनीताल। तृतीय कु. रोशनी सिंह, कक्षा 6, मोहन लाल साह बाल विद्या मंदिर, नैनीताल व सांत्वना पुरस्कार श्री अभिषेक कुमार, कक्षा 6, पार्वती प्रेमा जगाती सरस्वती विहार, नैनीतील, ने प्राप्त किया।
समारोह की अध्यक्षता डॉ. तारा चन्द्र त्रिपाठी ने की व मुख्य अतिथि श्री आर.बी.एस. रावत, मुख्य वन संरक्षक, उत्तराखंड थे। समारोह का संचालन पूर्व प्रतियोगी व पिछले वर्ष निर्णायक रहे शोध छात्र रणधीर सिंह कैड़ा ने किया।
वरिष्ठ वर्ग (कक्षा 10,11 एवं 12) के लिए निर्धारित विषय ‘क्या राष्ट्रमण्डल खेल देश के लिए जरूरी हैं ?’ से सम्बन्धित निबन्ध उस निराशा को बढ़ाते हैं जो मध्यम वर्ग की प्रविष्टियाँ पैदा करती हैं। यह अपने आप में आश्चर्यजनक है कि कनिष्ठ वर्ग से वरिष्ठ वर्ग की ओर आते हुए निबन्ध लेखन के मामले में विषय की समझ, वैचारिक परिपक्वता, अभिव्यक्ति का कौशल प्रायः सभी कुछ घटता हुआ और भाषा, वर्तनी, व्याकरण की अशुद्धियां बढ़ती दिखाई देती हैं। कक्षाएं जितनी बड़ी होती गयी हैं विषय की जानकारी न होते हुए भी ‘पन्ने भरने की कला’ का उपयोग बढ़ता हुआ दिखाई देता है। यह चिन्ताजनक भी है क्योंकि नैनीताल समाचार की निबन्ध प्रतियोगिता में हिस्सेदारी करने में वह विवशता नहीं है जैसी विद्यालय की परीक्षाओं में होती होगी। निम्नांकित उद्धरण देखें -
‘राष्ट्रमंडल खेल से तात्पर्य यह है कि विभिन्न देशों द्वारा खेले जाने वाले खेल एक राष्ट्र के रूप में अर्थात एकजुट होकर एक मण्डल यानी समिति के रूप में लोगों द्वारा अपने संवेग से वे प्रतिस्पर्धा के रूप में खेलों का प्रदर्शन ही राष्ट्रमण्डल के अंततः खेल हैं’/‘ राष्ट्रमण्डल खेल से हम अपने मन को नियंत्रित कर सकते हैं’/‘रामलीला में अगर रावण को नहीं मारते हैं तो लोगों में उत्साह नहीं रहता है। उसी प्रकार यदि राष्ट्रमण्डल खेल न हों तो खिलाड़ियों दर्शकों का क्या होगा। इसलिए हम कह सकते हैं कि देख और खेल एक पहलू के दो सिक्के हैं’/ ‘हम कल्पना करते हैं कि राष्ट्रमण्डल खेल नहीं होंगे….और घोषणा कर देते हैं। अगले दिन हम देखेंगे कि लोग हताश कि खेल क्यों बंद कर दिया….खिलाड़ी समुदाय जुलूस निकालेगा, हड़ताल करेगा अपने राष्ट्रमण्डल खेल की माँग करेगा’/ ‘यह खेल हमारे भारत में अत्यन्त जरूरी हैं क्योंकि अगर कोई बच्चा अपनी योग्यता से इन खेलों में विजयी होता है तो उसे किसी स्कूल में पास होने की जरूरत नहीं है’/‘हम लोग इनमें से कुछ खेल अपने घरों में भी खेल लेते हैं जो कि राष्ट्रमण्डल में जाकर राष्ट्र के लिए तो महत्वपूर्ण बन सकें’।
ऐसे में आयोजकों को चाहिए कि आगामी प्रतियोगिताओं में कम से कम वरिष्ठ वर्ग के मूल्यांकनकर्ताओं को यह अधिकार दें कि स्तरीय न पाये जाने पर पुरस्कार विशेष (प्रथम/द्वितीय) हेतु किसी के चयन की अनिवार्यता न रहे। दो दशकों से चल रही इस प्रतियोगिता में पुरस्कृत होने के कुछ मायने तो होने ही चाहिए।
जहाँ तक इस वर्ग के ठीक ठाक निबन्धों का सवाल है राष्ट्रमण्डल खेलों के पक्ष-विपक्ष की प्रश्नगत बात-बहस देश की प्राथमिकताओं (निर्धनता- भूख- कुपोषण-अशिक्षा-चिकित्सा सुविधाओं का अभाव-बेरोजगारी आदि बनाम आयोजक देश की छवि आदि) के प्रश्न से परे आयोजन में व्याप्त भ्रष्टाचार के इर्द-गिर्द ही ज्यादातर केन्द्रित रही है। यह अस्वाभाविक भी शायद नहीं ही है क्योंकि इन खेलों का भारत में आयोजन क्यों और क्यों नहीं मोटे तौर पर तभी आम बहस का विषय बना जब इन खेलों के आयोजन से सम्बन्धित घोटाले और गड़बड़ियाँ मीडिया द्वारा सामने लाये गये।
‘एकता के सूत्र तथा भाईचारा बढ़ाने वाले इन राष्ट्रमण्डल खेलों के पीछे मन्त्रियों का पैसा ऐठना, गरीबों का निवाला छीनकर अपनी जेबें गरम करना तथा बेईमानी, धोखाधड़ी, रिश्वतखोरी आदि कुरीतियों को बढ़ावा देना छिपा हुआ है। …क्या अपने देशवासियों की भूख -प्यास तथा अन्य जरूरतों से बढ़कर हमारे लिए इन खेलों का आनंद उठाना है। वैसे भी इन खेलों द्वारा हमारे देश की तारीफ तथा प्रगति तो होने से रही हमारे देश में फैली भ्रष्टता का चिट्ठा खुलने से बदनामी अवश्य होगी … जहाँ एक ओर हमारे देश में आधे से ज्यादा लोग दो वक्त की रोटी एवं अच्छे कपड़े तथा घर की कल्पना मात्र करने में भी हिचकिचाते हें उसी देश में हमारे सुशिक्षित मन्त्री अपने स्वार्थ हेतु राष्ट्रमण्डल में लगाये जाने वाले रूपये से अपनी जेब गर्म कर रहे हैं।’
कु. रुचि भट्ट, कक्षा 11, सेंट मेरीज कॉन्वेंट, नैनीताल।
‘इस खेल से सबसे ज्यादा लाभ राजनीति के लोगों को ही होगा और कुछ बड़े करोड़पति लोगों को…भारत की सरकार फालतू का खर्चा तो बहुत करती है पर देश पर ध्यान नहीं देती…अगर वही पैसा देश की बेरोजगारी पर खर्चा करे…पर ऐसा नहीं है। अगर वो ऐसा करेगी तो उनकी कमाई बन्द हो जायेगी..काला धंधा जो वो अपने नौकरशाहों के द्वारा करवाते हैं खो बैठेंगे।
कु. शिप्रा चौरसिया, कक्षा 12 बी, मोहन लाल साह बालिका इंटर कॉलेज, नैनीताल।
‘राष्ट्रमण्डल खेल को कराने में जुटे अधिकारी भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। आये दिन किसी ना किसी घोटाले की खबर आती है … एक पक्ष का मानना है कि इन खेलों में आवश्यकता से अधिक धन व्यय हो रहा है। यदि यह धन देश में लगाया जाये तो देश का विकास स्वतः ही हो जायेगा किन्तु राजनेता आलाधिकारी खेलों को कराने के पक्ष में हैं। वे लोग देश की आय बढ़ाना चाहते हैं। … परन्तु वह उस आम आदमी के बारे में भूल जाते हैं जो बढ़ती हुई महंगाई, जिसमें कहीं न कही इन खेलों का भी हाथ है, के नीचे दब रहे हैं।’
पंकज कुमार, कक्षा 11 बी, गोविन्द बल्लभ पंत इंटर कॉलेज, भवाली, नैनीताल।
‘भ्रष्ट नेताओं ने भारत की इज्जत बहुत नीचे गिरा दी है और जब तक कोई नई पीढ़ी का कोई युवा नेता इस देश की कमान नहीं सँभालेगा तब तक यह देश विश्व का नम्बर एक देश नहीं कहला सकता। चाहे कितने ही राष्ट्रमण्डल खेल क्यों न हो जायें।’
मोहित, कक्षा 10, बिशप शॉप इंटर कालेज, नैनीताल।
‘यहाँ सौ करोड़ की जनसंख्या में से सरकार 26 करोड़ को भूखा छोड़ देती है और दूसरी ओर इस वर्ष भारत में अक्टूबर में राष्ट्रमण्डलीय खेल हैं… जब यह देश पहले से भूखा पड़ा है तब सरकार यहाँ गेम्स करा कर कौन सा तीर मारना चाह रही है।’
गौरव कुमार, कक्षा 10, पार्वती प्रेमा जगाती सरस्वती विहार, नैनीताल
‘हमारे देश में परतन्त्रता तो चली गयी परन्तु इसकी छाया को हम आज भी राष्ट्रमण्डलीय खेलों के माध्यम से देख सकते हैं।’
गौरव नैनवाल, कक्षा 11, पार्वती प्रेमा जगाती सरस्वती विहार, नैनीताल।
‘जिस-जिस देश ने किसी बड़े खेल का आयोजन किया है उसकी अर्थव्यवस्था में भारी उछाल आया है…बीजिंग ओलम्पिक के बाद चीन को काफी फायदा हुआ, अब बारी भारत की है… आयोजक देश की छवि बन जाती है व उसकी शक्ति का अहसास होता है।’
शुभम सिंह कैंतूरा, कक्षा 11, पार्वती प्रेमा जगाती सरस्वती विहार, नैनीताल।
‘जो खिलाड़ी एक दो राज्यस्तरीय या किसी बड़े खेल समारोह में खेलते हैं वे भी कुछ समय बाद आर्थिक तंगी के चलते यह मार्ग छोड़ देते हैं तो ऐसे परिदृश्य में क्या राष्ट्रमण्डल खेल जरूरी हैं या इन स्थितियों में सुधार… पहले हमें इन स्थितियों को सुधारना होगा तभी यह खेल हमारे देश के लिए जरूरी होंगे।’
कु. दिव्या भट्ट, कक्षा 11, लेक्स इंटरनेशनल स्कूल, भीमताल।
आजकल ईमानदारी नाम की चीज बहुत कम हो गयी है। इसी कारण देश के हित के लिये किये जाने वाले राष्ट्रमंडल खेल देश के लिये एक बड़ी समस्या बन गये हैं। लोगों के बारे में न सोच कर नेता केवल अपनी जेब भरने की कोशिश में लगे हुए हैं….लाखों करोड़ों रुपये केवल खेल पर खर्च को पसंद नहीं आ रहा है। उन का मानना है कि इतने रुपये व्यर्थ के खेलों में न लगाकर समाज के निर्माण तथा गरीबों को रोजगार आदि काम में लगाने चाहिये। ऐसे खेल किस काम के जिनका लाभ सभी लोगों को न मिल कर कुछ की जेबों में जा रहा है।
कु. हरसिमरन कौर रैना, कक्षा 11, मोहन लाल साह बाल विद्या मंदिर, नैनीताल।
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दौड़ते हैं तो दौड़ने लगता है चाँद नाचते हैं तो नाचने लगती है पृथ्वी
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- मदन कश्यप