निर्मल अब इस दुनिया में नहीं है। 18 फरवरी को वह हमें छोड़ कर चला गया। जब-जब इस बात का अहसास हो रहा है, एक कसैली सी अनुभूति के साथ एक गहरी उदासी मन में छा जाती है।
खुद वह कमबख्त एक भरपूर जिन्दगी जिया। एक मस्तमौला स्टूडैन्ट जो पढ़ाई में कम नाटक व संगीत में ज्यादा व्यस्त रहा। कॉलेज से निकलते ही दो-तीन साल सरकारी नौकरी की (बेरोजगारी नहीं झेलनी पड़ी)। फिर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में चला गया। बाहर निकला तो विदेश चला गया। वापस आया तो शुरूआती फिल्म से ही ग्लैमर की बुलंदियों पर पहुँच गया। पत्र-पत्रिकाओं, रेडियो-टी.वी. पर इंटरव्यू व राह चलते लोगों को ऑटोग्राफ-फोटोग्राफ देने की दुनियां में आ गया। खुद वो 47 की उम्र में यह सोच कर दुनिया से चल दिया कि मैने सब कुछ देख लिया…..पा लिया………। मगर निर्मल की हमें, हमारे पूरे समाज को और खास तौर पर उत्तराखण्ड को बहुत जरूरत थी। उसकी विलक्षण प्रतिभा न जाने कितनों को राह दिखा सकती थी। उत्तराखण्ड में एक नाटक रैपर्टरी की स्थापना का उसका सपना था। अगर वह सपना सच हो जाता तो उसकी अपार क्षमता से उत्तराखण्ड लाभ उठाता। मगर वह चल दिया। एकदम अचानक! ……….वैसे उसने कई काम अचानक ही किये।
श्रीमती रेबा व श्री हरीश चन्द्र पांडे के मध्यवर्गीय परिवार मे जन्मा निर्मल 1983 में डी.आर.डी.ए. में बाबू बन गया। नौकरी के ऐसे तंत्र में वह आया, जहाँ घुस कर न जाने कितनी प्रतिभाएँ समाप्त हो जाती हैं। मगर उसे आगे जाना था। सो 1986 में एक दिन अचानक वह नौकरी से इस्तीफा देकर एन.एस.डी. में अभिनय सीखने चला गया।
उसका नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में जाना एक पंछी को खुला आकाश मिलने जैसा था। निर्मल वहाँ से एक तराशे गये हीरे की तरह बाहर आया। यहाँ देश के रंगकर्म की नामचीन हस्तियों, बी.एम शाह, ब.व. कारंत, भानु भारती, प्रसन्ना, सुधा शिवपुरी, रोबिन दास, के.एम पनिक्कर, रतन थियम व विश्व के जाने माने निर्देशकों, जैसे जॉन क्लार्क, फ्रिट्ज बैनेविट्ज व मैगसुई जैसों के साथ काम कर उसे वह शिक्षा मिली जिसने उसके अन्दर मौजूद असीम ऊर्जा को रास्ता दिखा किया।
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में अध्ययन के दौरान वह छुट्टियों में नैनीताल में अपनी मातृ संस्था ‘युगमंच’ के साथ लगभग एक नाटक जरूर करता। सराय की मालकिन, अनारो, अजुवा बफौल उसके कुछ अविस्मरणीय नाटक हैं। पढ़ाई पूरी करने के बाद उसने उत्तराखण्ड के लोक संगीत पर एन.एस.डी. से मिले एक प्रोजेक्ट के तहत काम किया। इसी बीच उसे टीवी सीरियल व फिल्मों में छोटे बड़े रोल मिलने लगे। मणि कौल की फिल्म ‘ईडियट’ में इसी दौरान काम किया। मगर तभी पता चला कि वह इंग्लैड जा रहा है। वहाँ के नामी गिरामी थियेटर ग्रुप ‘तारा आर्ट्स’ में उसका चयन हो गया। इसके निर्देशक जयंत वर्मा ने करीब सौ आवेदकों से सिर्फ दो को चुना था। लंदन में उसने हीर रांझा, मिट्टी की गाड़ी (लिटिल क्ले कार्ट) व शेक्सपियर के एक नाटक में काम किया।
निर्मल में थियेटर का एक गजब का टेलेंट था। वह एक अच्छा एक्टर, अच्छा डाइरेक्टर, अच्छा गायक व अच्छा संगीत निर्देशक था। जिन लोगों ने उसके नाटकों को देखा है, वे जानते हैं कि संगीत उसके नाटकों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होता था या कहें इसकी जान होता था। लेकिन जिन लोगों ने उसके नाटकों मे काम किया है, वे जानते हैं कि वो संगीत कैसे मजे-मजे में तैयार करता था। किस कलाकार से क्या निकलवाना है, इसकी बड़ी तीक्ष्ण समझ उसमें थी। मुझे याद है, उसके नाटक अजुवा बफौल के दिल्ली प्रदर्शन को प्रख्यात नाट्य समीक्षकों, कविता नागपाल व दीवान सिंह बजेली ने आड़े हाथों लिया, मगर वे भी इसके संगीत के मुरीद हुए बगैर नहीं रह सके। उसकी यही अदभुत नाट्य प्रतिभा थी कि उसके द्वारा निर्देशित युगमंच के नाटक ‘जिन लाहौर नहिं देख्या’ की लोकप्रियता आज 16 वर्ष बाद भी बनी हुई है। कुछ वर्ष पहले जब उसने अपनी मुम्बई की नाट्य संस्था से नाटक ‘अंधायुग’ का मंचन किया तो फिल्मी दुनिया के महानायक अमिताभ बच्चन ने भी इसकी बहुत तारीफ की और जब यह नाटक राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के ‘भारत रंग महोत्सव’ में किया गया तो ‘इंडिया टुडे’ ने इसे समारोह का दूसरा सर्वश्रेष्ठ नाटक बताया।
संभवतः थियेटर की दुनिया ही उसे बुलंदियों तक ले जाने के लिए पर्याप्त थी, मगर उसे फिल्मी दुनिया की सृजनात्मकता व ग्लैमर भी इसी उम्र में देखना था। शेखर कपूर की फिल्म ‘बैडिंट क्वीन’ के हिट होते ही वह स्टार बन गया और बकौल मनोज वाजपेयी वह एक हवा के झोंके की तरह आया और मुम्बई ने उसे सिर आँखों पर बैठा लिया। वह एक ऐसा दौर था कि जब भी हम टी.वी. खोलते तो किसी न किसी चैनल में उसके बारे में कुछ न कुछ आ रहा होता या वह हमसे खुद टी.वी. के माध्यम से रू ब रू होता। पत्र-पत्रिकाओं में उसके बारे में छपता रहता। इसी दौरान उसने ‘औजार’, ‘शिकारी’, ‘हम तुम पै मरते हैं’, ‘वन टू का फोर’, ‘इस रात की सुबह नही’, ‘जहाँ तुम ले चलो’, ‘हद कर दी आपने’ जैसी अनेक फिल्मों में फिल्म जगत की ऊँची हस्तियों के साथ काम कर बॉलीवुड की दाँवपेंच भरी दुनिया में बगैर किसीगॉड फादर के छा जाने की कोशिश की। ‘औजार’ में उसके सशक्त अभिनय के बारे में कहा जाता है कि सलमान खान के भाई व फिल्म के निर्देशक सुहेल खान को उसके कई शॉट काटने पर मजबूर कर दिया, क्योंकि डर था कि कहीं उसका अभिनय सलमान खान के किरदार को फीका न कर दे। वहीं दूसरी तरफ उसने लीक से हट कर बनने वाली फिल्मों, जैसे ‘ट्रेन टु पाकिस्तान’, ‘दायरा’ व ‘गॉडमदर’ जैसी फिल्मों के माध्यम से उसने चुनौतीपूर्ण रोल किये व अपनी एक अलग पहचान बनानी चाही। उसके स्टार बनने के पहले तीन सालों तक हर साल उसकी कोई न कोई फिल्म फिल्म महोत्सवों में जाती रहीं। ‘दायरा’ के रोल के लिये फ्रांस में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिलना उसकी अनोखी उपलब्धि थी। ऊँर्चाइंयों के इस सफर के दौरान ‘टाइम्स म्यूजिक’ ने उसकी अपनी आवाज में एक एलबम ‘जज्बा’ रिलीज किया।
उसे संगीत नाटक व अभिनय की दुनिया में रस मिलता था। बाँकी सभी चीजें उसके लिए दोयम दर्जे की थीं। उसके रंगकर्म के लगाव को याद करते हुए युगमंच के वरिष्ठ साथी जितेन्द्र बिष्ट कहते हैं कि रिहर्सल के दौरान उसकी सख्ती व अनुशासन बेहद कड़क होता था। किसी की क्या मजाल कि वह फूहड़पन दिखाये या रिहर्सल के लिये आने में
दस मिनट भी लेट हो जाये। मगर जैसे ही रिहर्सल खत्म होती, वह उसी पुराने रूप में आ जाता। सीधा-सादा बच्चों सी सरलता वाला निर्मल। बतौर निर्देशक जब वह कास्ट सैलेक्सन करता तो हमें लगता कि फलाँ पात्र के चुनाव करने में इसने गलती कर दी। मगर निर्मल के साथ आकर वह व्यक्ति भी अपने किरदार को बखूबी निभाने लगता। ऐसा लगता था कि मानो लोहे को पारस से छुआ दिया गया।
उसे अपनी टीम से बेहद प्यार होता था। किसी को अपमानित वह कभी नहीं करता था। अगर किसी को रिहर्सल के दौरान कड़क डाँट पिलाता तो बाहर आते ही उसके गले मे हाथ डालकर कहता भाई तुझे डाँटा, बुरा तो नहीं लगा तुझे। अपनी लोकप्रियता के शिखर पर जब वह था और बच्चों को ऑटोग्राफ दे रहा था तो एक बच्चा, जिसके हाथ मे चोट
लगी थी, को सहलाते हुए बोला बेटा चोट कैसे लगी। वह पूरी तरह मानवीय था। कोई बच्वा जब अपने फलाँ के बेटे/भतीजे होने का संदर्भ देता तो वह उसके पिता/चाचा के हालचाल पूछने लगता। उसकी सादगी एक भ्रम पैदा करती, क्या यह वाकई यह एक इतनी ऊँचाई पर बैठा कलाकार है।
मनोज वाजपेयी, जो फिल्मी दुनिया का जाना माना कलाकार है, निर्मल के साथ ही एन.एस.डी. में था। उसने निर्मल के बारे में अपने ब्लॉग मे लिखा है, ‘‘वह नैनीताल के पहाड़ से आया था और मुंबई में भी पहाड़ ढूँढता रहा। ये शहर की मारधाड़, काटाकाटी उसे पसंद नहीं आती थी।’’ संभवतः इसी कारण से वह फिल्मी दुनिया की कृत्रिमता, झूठ, कुछ होने और कुछ दिखाने की जद्दोजहद से दूर रहा और इसकी कीमत भी उसे चुकानी पड़ी।
1994 की बात है। एक दिन वह और मैं घूमते हुए नैनीताल के लैंड्स एण्ड की तरफ चले गये। थोड़ी देर में बड़ी तेज बारिश शुरू हो गयी। हम पास के एक टिन शैड, जो एक दुकान भी थी, की तरफ भागे। दुकानदार ने हमें अंदर नहीं आने दिया। हम बस सिर छुपाने लायक जगह में खड़े रहे। बारिश तेज होती गयी। हमने दुकानदार से चाय बनवायी, कुछ खाया भी मगर उसने हमें कोई तरजीह नहीं दी। हमें भीतर नहीं बुलाया। जब निर्मल का ध्यान कहीं और लगा था, तो मैंने दुकानदार से कहा, जानते हो यह कौन है ? अभी-अभी यह मशहूर निर्देशक शेखर कपूर की फिल्म में हीरो का रोल करके आया है (बैंडिट क्वीन तब तक रिलीज नहीं हुई थी)। उस खूसट दुकानदार पर इसका कोई फर्क नहीं पड़ा। उल्टा उसने मुझे ऐसे भाव से देखा, मानो कह रहा हो हुँह, मुझे बेवकूफ समझा है ? ऐसे होते हैं हीरो, ? अरे उनका तो एक रौब होता है…….. खास अंदाज होता है……..नक्शेबाजी होती है।
जो लोग निर्मल को उसके फिल्मी जीवन के उतार-चढ़ाव, सफलता या असफलता को मापना चाहते हैं, वे लोग मुझे उस खूसट दुकानदार की तरह नजर आते हैं जो हमें लैण्डस एण्ड में मिला था। अगर मुम्बई की दुनिया निर्मल को एक धूर्त, तिकड़मी, रौबदाब और नक्शेबाजी वाला हीरो बना देती तो तमाम सफलता के बावजूद वह उसके जानने वालों के लिए कब का मर चुका होता। वह अपने चाहने वालों, जानने वालों के बीच जिन्दा है और जिन्दा रहेगा तो सिर्फ इसलिए, क्योंकि अपार प्रतिभा के बावजूद वह एक भला आदमी था। एक जिन्दादिल इंसान। भले ही वह अपने समय की सर्वोच्च हस्तियों के बीच जा पहुँचा था, पर जब हम उससे मिलते तो वह हमें एक सीधा सरल पहाड़ी भाई लगता। अपनी आत्मा को मार कर बनावटी जिन्दगी जीने वाला हीरो नहीं।
47 साल की उम्र में ही वह इतनी यादें छोड़ गया है कि उसे भुलाना नामुमकिन है। वैसे तो बिना वजह कोई 100 साल जी कर भी क्या कर लेता है। मगर हम जानते हैं कि अगर उसे दीर्घ जीवन मिलता तो वह समाज को बहुत कुछ दे सकता था। उसके जीवन वृत्त पर नजर डालें, तो किसी फिल्म का एक संवाद कानों में गूँजता है- दोस्त कि जिन्दगी बड़ी होनी चाहिये लंबी नहीं। उसकी सादगी पर यही कह सकते हैं-
मंजर इक बुलंदी पर,
और हम बना सकते,
अर्श से इधर होता
काश के मकाँ अपना।
























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