‘मेरा गाँव, मेरे लोग’ ने मुझे इतना अधिक अभिभूत किया कि मैं अन्तर्मन में उद्वेलित हो रहे भावों के प्रवाह में बह गया। देवेन्द्र मेवाड़ी जी के व्यक्तित्व-कृतित्व से मैं तनिक भी परिचित नही हूँ और न मेरा उनके साथ कभी कोई साक्षात्कार हुआ है। ‘तेजषां हि न वयः समीक्षते’ के आधार पर मैं उनकी लेखनी को नमन करता हूँ।
हम सब उसी अतीत की उपज हैं, जिसकी गहराई में मेवाड़ी गोते लगाते हैं और अन्तर्मन को छू जाने वाले बिम्बों द्वारा उसे प्रतिबिंबित करते हैं। हमारी आस्था और संस्कृति के बीज अब वृक्ष बनकर खड़े हैं। मगर हम हैं कि उनके स्वादिष्ट फलों के मधुर आस्वादन के लिए भी उनके निकट फटकना नहीं चाहते। हम तो वैश्विक विद्रूप और भौतिकवाद की अंधी दौड़ में फास्ट-फूड की तरह परोसे जा रहे वर्जनाहीन पश्चिमी सभ्यता व संस्कृति के लट्टू बनते चले जा रहे हैं।
अपनी समृद्ध सनातन-पुरातन संस्कृति को हेय समझकर पाश्चात्य के उपासक बनते चले जा रहे हैं। अपनी अस्मिता की रक्षा हेतु चिन्तित मेवाड़ी जल़, जमीन, जंगल में पले और बढ़े तथा जिस असीम मेधा को प्राप्त हुए वह हर किसी को प्राप्त नहीं होती। स्तम्भ ने मुझे भी स्तम्भित कर अपने उस बचपन में धकेल दिया, जब मेरे लिए इन्टरमीडिएट के बाद पढ़ने के लिए पारिवारिक परिस्थितियाँ बाधक बन गई थीं और मैं पाँच माह तक गाँव से दूर ‘खरक’ में जाकर गाय-भैंसों का ग्वाला बन गया था। नित्य सायं गोधूलि वेला में गाय-भैंसों के साथ जंगल से लौटता। उस समय एक लकड़ी का गट्ठा भी मेरी पीठ में शोभा पा रहा होता। जोंकों ने बार-बार काट कर पाँव पर बड़े घाव कर दिये थे। कपड़े हफ्ते में ही धुलते थे, बाँज की राख से। हमारे गाँव के ऊपरी भाग में तब सघन वन था, जैसा कि इधर मैंने गोपेश्वर से आगे मण्डल और उखीमठ के बीच देखा है। एक बार तो ‘हौल’ में मैंने दो बच्चों सहित लाल-लाल ‘हौलीबाघ’ को देखा। गायें पूँछ खड़ी कर फूँ-फूँ करतीं बिठुर कर इधर-उधर भागने लगी थीं। पता नहीं क्यों, उस समय मेरे मुख से आवाज ही नहीं निकली। साथ में भैंसों को देख कर शायद बाघ ने गायों पर आक्रमण नहीं किया होगा।
जंगल में ग्वाले कुछ न कुछ गाते रहते थे। ‘जोड़’ के माध्यम से दो ‘जोड़दारों’ में बहुत देर तक उत्तर-प्रत्युत्तर चलता था। अनपढ़ होते हुए भी वे नये-नये जोड़ों की रचना करते हुए दिखाई देते। मैं मन में सोचता- यहाँ हमारे गाँव-घरों में हर कोई कवि है। सो अब मैं ‘बड़्याठ’ के साथ कलम और नोटबुक लेकर जंगल जाने लगा। तब मेरी कुदरत ने जंगल के झुरमुट में गाय-भैंसों के मध्य ‘कुदरत’ लिख दी। जिसे दो वर्ष बाद उन्नीस सौ सत्तर में मैंने (दो सौ रुपए में तीन सौ प्रतियाँ) तत्कालीन इन्द्र प्रिंन्टिग प्रेस, अल्मोड़ा से प्रकाशित किया। यही कुदरत मेरा शैशवकालीन कुमाउनी काव्य संग्रह बना।
‘नैनीताल समाचार’ को मैं साधुवाद प्रेषित करता हूँ, जो सर्वदा जनहित के सरोकारों को प्राथमिकता देता है। पौ-पर्व में खुशियाँ बाटता है। संस्कृति के संरक्षण तथा कुमाउनी भाषा के उन्नयन के लिए उसमें आकुलता दिखाई देती है। तभी तो इसने देवेन्द्र मेवाड़ी की साधारण सी लगने वाली अति मार्मिक और कालजयी रचना से पत्रिका के कलेवर में चार चाँद लगा दिया है। मैं श्री मेवाड़ी को बधाई देते हुए निवेदन करूँगा कि आप नैनीताल समाचार पत्र में कुमाउनी शब्दों के सितारों से मातृ भाषा हिन्दी की शब्द-संपदा की श्रीवृद्धि कर ही रहे हैं तो क्यों नहीं विशुद्ध रूप से कुमाउनी में लिखना शुरू कर दें। इससे हमारी इस आंचलिक बोली की साहित्यिक वाग्धारा को नई ऊर्जा प्राप्त होगी।
दामोदर जोशी ‘देवांशु’ मालधनचौड़, रामनगर
नैनीताल समाचार परिवार कें हर्याल् भेजणाँक लिजि धन्यवाद। समाचार पत्रैकि प्रगति और दीर्घायु लिजि हमरि शुभकामना स्वीकार करिया। हम लोग देशविदेश में कै ले रूँन, मगर तुम लोगनाँक् सदा शुभचिन्तक भयाँ। हम लोग आपु कें उत्तराखण्डी कूँण में इतखै-उतखै बिखरिं टुकुड़ जास महसूस करनूँ। उत्तराखण्ड आन्दोलनकि भावना समझनेर भयाँ परन्तु उत्तराँचल शब्द में आँचल सुणिवेर मातृभूमिकि याद ज्यादा ऊनेर भै। चिट्ठी उले कुमाउनी में पैलबार भेजण लागि रयूँ गलती माफ करला।
उसि आजकल चिट्ठी-पत्रि लेखणक रिवाज ले खतम जस हैगो। सवै ई-मेल वाल है गेईं। नैनीताल समाचार ठीक समय पर ताँक हालचाल राजनीतिक और सामयिक विषयन पर अपुण निष्पक्ष विचार बतूनें रूँ। डॉ. डी.डी. पन्त ज्यूक विषय में लेख और श्रद्धांजलि पढ़ि बेर डी.एस.बी. कॉलेजाक पुराण दिन याद ऐ गेई। म्यार डा. पन्त ज्यू दिगाड़ विशेष रिश्त हुनेर भय। ऊँ म्यार बाबूक खास विद्यार्थी काँडा मिडिल स्कूल बटि और मि उनर नैनीताल कॉलेजाक विद्यार्थी भयूँ। उनून कै मैलि सदा आपुण आदर्श मानौ। हमर कॉलेज जब विश्वविद्यालय बणौ, अति खुशी भै। मगर आज जो हाल आपु लेखण लागि रौछा उ जाणि बेर दुःख भौ। ताँक साहित्यकार और राजनीतिक लोग हमन कै पलायनवादी कै बेर सम्बोधित करनी। म्यार विचार में यो वादविवाद करनै कि के जरूरत न्हाँ। हम लोग ताँकि संस्कृति, सुन्दरता और सरलता कैं चारों तरफ फैलूण में मदद करनेर भ्याँ। जबकि ताँक शासन या शिक्षण संस्थालि कबै हमन एक ग्वाल् या सुपारि दिबेर सम्मान करौ योस सुरण में नि आय। हमन कै हमेशा ताँक मैंस, चहागिलास, सिंगलपूरी, आलूगुटुक, भटौ रस, गहता डुबुक, लाइ गडेरि साग, निम्मूसानि, रंग्वालि पिछौड़, ज्योति पट्टा, चीर, देवदार, बाँज, बुरूँश, काफल, घुगुति त्यार, रामलिल, झवार, चाँचरि, ढोल, नंगार, देवी-देवता, हवा पाणि और सबै चीजनकि नराई लागनेर भै। तुमार समाचार पत्र बटि ताँक राजनीतिक और सामाजिक विषय नैकि जानकारी मिलणै रूँ। नय राज्य बण बेर सुधार ले काफि हैगो। सड़क व यातायात भल है गो मगर सड़क दुर्घटना में हर साल काफी लोग मरते रूनी यै विषय में ठोस कदम जरूरी छ।
एक बात दुविधा में डालणि यो छ कि राजनीति में माननीय गोविन्द बल्लभ पन्त, कृष्ण चन्द्र पन्त, नारायण दत्त तिवारी, मुरली मनोहर जोशी, हेमवती नन्दन बहुगुणा और अनेक स्वतंत्रता सेनानी तथा समाज सुधारक जाँ बटि राष्ट्रीय क्षेत्र में रईं, वाँ आज इनौर अकाल जस किले पड़िगो। राज्य कैं नई मुख्यमंत्रिज्यू मिलि गई। मुबारक ह्वाल। यो उलट-पलट किलै भो के समझ में नि आय। जनरल सैप भाल आदिम छी। देश में इमानदारी साथ खूब हायवे बणा इन मगर हम पहाड़िनैली उनन कैं भवर्यें बेर हायवे बटि ताल गध्यारौक् बाट देखैद्यो। खैर फौजी छन। जाँ ले रौल स्वस्थ और सुखी रौल। तुमलि नय मुख्यमंत्रीज्यू बार में लेखि राखिछयू, आब आँख कमजोर है गईं, पैलि मैलि ‘निशंक’ कै ‘त्रिशंक’ पढ़ौ। समझ मेनि आय यो सैप आज तक काँ लटकि रौछि। ये साल फरवरी में एक संगोष्ठी में देहरादून में दर्शन भैछी। बहुत मिलनसार लागि। अति प्यारलि सबन दगै हाथ मिला और खास-खास लोगन दिगड़ि गाल ले लागिं। संगोष्ठी विज्ञान व पर्यावरण विषय में छि। भाषण जोरदार द्यो। विषय गम्भीर छयु, परन्तु उनरि रुचि कला नाच, गान व नाटक और आवभगत में ज्यादा देखि। उनार चारों तरफ घुमड़ी चम्च व चम्चाणिन कैं देखि बेर अन्दाज ए गोछि कि इननू कै पंख लागनेर छन। डाक्टर सैपन के मेरि शुभकामना।
डॉ. गोविन्द बल्लभ पन्त, पंचवटी, पाषाण, पुणे-411008