उत्तर प्रदेश के पहाड़ी जिलों, जो अब उत्तराखंड राज्य बन गए हैं, में सबसे पहले सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण का काम आरंभ हुआ था। उसके विरुद्ध आंदोलन भी देश में सबसे पहले यहीं शुरू हुआ था। इसका आरंभ हुआ था टिहरी बाँध बनने के प्रस्ताव पर 1970 के दशक में, जब पता लगा कि इन पहाड़ों की सबसे उपजाऊ तथा समृद्ध टिहरी घाटी में सरकार बाँध बनाने के लिये खेती की भूमि का अधिग्रहण करेगी। उस पुरातन घाटी में एक पूरी सभ्यता बसी थी, जिसे बाँध बनाने के लिए समाप्त किया जाना था। यह नंदीग्राम, सिंगूर, ओड़िसा तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के भूमि अधिग्रहण से दशकों पहले की बात थी। तब से यहाँ के लोग उस अधिग्रहण के विरोध में लड़ाई लड़ते रहे हैं, जिसमें सैकड़ों लोगों ने जेल की यातनाएँ सहीं तथा जहाँ पर्यावरणविद सुंदर लाल बहुगुणा ने 76 दिन का उपवास किया, जिसे प्रधान मंत्री देवगौड़ा ने आकर तुड़वाया। टिहरी बाँध बन गया है, किन्तु यहाँ यह लड़ाई अभी भी जारी है। अभी इस वर्ष आरंभ में केदारनाथ घाटी के लोगों ने वहाँ बनने वाली जल विद्युत परियोजनाओं के विरोध में आंदोलन किया, जिसमें एक महिला सहित दो व्यक्तियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।
उत्तराखंड में जल विद्युत परियोजनाओं की बाढ़ सी आ गई है। 558 परियोजनायें बन रही हैं। इनके लिए बैराज, जहाँ नदियों का पानी रोक उसे सुरंगों में डाला जाएगा; सड़कें, आवास तथा बिजलीघरों के लिए भूमि की आवश्यकता होती है। इसके लिए भूमि किसानों से ली जाती है, पुराने 1894 के कानून के अनुसार, कम दामों पर। खेती के चले जाने पर किसानों के पास जीवनयापन का कोई अन्य साधन नहीं बचता है। भूमि ले लिए जाने पर जो पैसा लोगों को मिला है उससे कइयों ने मोटर गाड़ियाँ भाडे़ पर चलाने खरीद ली हैं। उन्हें इन लोगों ने योजना चलानेवाली कंपनियों को मासिक किराए पर दे दिया है। कुछ वर्षों बाद यह मोटर गाड़ियाँ काम करना बंद कर देंगी, जैसे सब मशीनें अपनी अवधि समाप्त होने पर करती हैं, और कबाड़ के रूप में बिकेंगी। तब ये किसान क्या करेंगे ? भूमि का जो मुआवजा मिला है, वह इतना नहीं है कि उससे वे कहीं और बसने के लिये भूमि खरीद सकें। भूमि अधिग्रहीत किए जाने पर उनके चरागाह तथा वन भी ले लिए या छीने जाने पर समाप्त हो गए। लेकिन गाँवों में रहने के उनके मकान बचे रहे। रहने की जगह होने पर वे गाँव छोड़ कर नहीं गए। जाने के लिए कहीं और जगह भी नहीं थी। उनके पास अब घर हैं किन्तु खेती अधिग्रहीत किए जाने पर जीवन-साधन नहीं हैं। जिन्होंने गाड़ियां खरीद ली हैं, उनको किराया मिला जाता है, जिससे वे जीवित रहते हैं। जिनको मुआवजे में गाड़ी खरीदने के लायक धन नहीं मिला, वे असहाय बैठे हैं और मज़दूरी कर रहे हैं।
यहाँ पहाड़ में भूमि अधिग्रहण के विरुद्ध लडाई कभी इतनी बड़ी नहीं बन पाई कि उसने ओड़ीसा, बंगाल या पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों की भाँति सारे देश का ध्यान आकर्षित किया हो। वह केवल एक कोने की स्थानीय लड़ाई रह गई। वह इस तरह के अन्य संघर्षों से नहीं जुड़ पाई। यदि भू-अधिग्रहण पर नया कानून बनता है तो तब संभव है कि पहाड़ी किसानों की और ज़मीन बच पाए, या जाए भी तो उन दामों पर जिनसे वह जीवन चलाने कुछ अन्य काम कर सकें। प्रधानमंत्री ने संसद के अगले सत्र में नया या संशोधित विधेयक लाने का आश्वासन दिया है। राष्ट्रीय लोक दल के प्रमुख चौधरी अजित सिंह ने प्रधान मंत्री से कुछ दिन पहले मिल कर माँग की थी कि सरकार एक आयोग का गठन करे जो पता लगाए कि अभी तक कितनी ज़मीन का अधिग्रहण, किसलिए किया गया, उसके लिए कितना मुआवजा दिया गया तथा उससे किसको फायदा हुआ। यह जानकारी पाना उत्तराखंड में अधिकृत की गई भूमि के बारे में बहुत आवश्यक है। तब पता लग पाएगा कि कितने सस्ते में पहाड़ की भूमि ले ली गई तथा कैसे यहाँ के किसान ठगे गए। पहाड़ के प्रति देश संवेदनशील नहीं है। जो कुछ यहाँ होता है उसके बारे में देश को जानकारी नहीं मिलती। यदि एक आयोग का गठन होता है तो पहाड़ के लोग उसके सामने उनसे ली गई भूमि और उसके लिए पाए मूल्य के बारे में कह पाएँगे तथा बता पाएँगे कि उनके साथ कितना अन्याय हुआ है। पहाड़ में खेती की भूमि बहुत कम है, कुल राज्य के क्षेत्रफल का केवल सात प्रतिशत। उसको अधिग्रहण द्वारा और कम करना सरासर अन्याय है। यहाँ विद्युत योजनाएँ बिजली बेच बहुत धन कमा रही हैं। उनमें कुछ ऐसी भी हैं जिनकी औसत आय एक करोड़ रुपया प्रतिदिन है। उनके चारों ओर फैले गाँववासियों की आय पचास रुपया दैनिक भी नहीं है।