धानारौली का रहस्य
नैनीताल जनपद के धारी ब्लॉक के धानारौली गाँव में हुए हादसे को दो हफ्ते होने को आ रहे हैं। लेकिन इस दुर्घटना का रहस्य अभी सुलझ नहीं पा रहा है। जबकि शुरू में यह एक ऐसा मामला लग रहा था, जिसे अपराध की भाषा में ‘ओपन एंड शट केस’ कहते हैं…..मामला जो घटते ही फटाफट सुलझ जाता है।
यह ऐसी घटना नहीं थी कि अपराधियों को ढूँढना मुश्किल होता। लेकिन दो सप्ताह का समय बीत जाने के बाद भी अब तक न जे.सी.बी. मशीन सील हुई है और न उस मशीन के चालक और मालिक का पता चल पाया है। सिर्फ इतना भर हुआ कि जिस मकान की बुनियाद खोदने के लिये जे.सी.बी. बुलाई गई थी, उसके मालिक को गिरफ्तार कर जमानत पर छोड़ दिया गया है। यह भी अखबार में छपी खबर है। सच तो यह है कि इस दुर्घटना की रपट प्रशासन की ओर से लिखाई गई थी और प्रशासन ही दावा कर रहा है कि महेश मेलकानी को गिरफ्तार किया गया। किसी ने उसे गिरफ्तार होते अपनी आँखों से नहीं देखा। मगर जे.सी.बी. मशीन और उसके मालिक व चालक को ढूँढने में क्या दिक्कत है, इसका पता नहीं चल पा रहा है। पुलिस तथा प्रशासन में कोई भी इस सवाल का जवाब देने को तैयार नहीं है। अधिकारियों से बातचीत करने पर लगता है कि उन्हें इस घटना में कोई रुचि ही नहीं रही। एक मामूली दुर्घटना थी, जो हो गई तो हो गई। इसे तूल देने की क्या जरूरत ? यहाँ तक कि दैनिक समाचार पत्र, जो कि घटना के पहले दिन रंगीन चित्रों के साथ डेढ़-डेढ़ पेज की भावपूर्ण खबरें लगा कर पाठकों को करुणाविगलित कर गये थे, अब एकदम चुप हैं। अमेरिका के टोही जहाजों की तरह जो संवाददाता यह तक पता लगा लेते थे कि एक निहायत निजी समारोह में अपने गाँव आये क्रिकेटर महेन्द्र सिंह धौनी के माँ-बाप ने नाश्ते में क्या खाया, वे पाँच हँसते-खेलते मनुष्यों की जीवनलीला समाप्त कर देने वाली हत्यारी जे.सी.बी. का सुराग पाने में अब तक असमर्थ रहे हैं। अफवाह है कि स्व. मोहनराम के परिवार में एकमात्र बचे उसके पुत्र दीवानराम को कुछ नकद पैसा और जमीन देकर चुप करवा दिया गया है। यह पैसा देने वाले कौन थे, यह भी समझ में नहीं आ रहा है। पश्चाताप स्वरूप दीवानराम को मुआवजे के रूप में यह मदद देने की बात तो समझी जा सकती है, लेकिन यह बात समझ से बाहर है कि एक आपराधिक मामले में राजीनामा कैसे किया जा सकता है ? हालाँकि प्रामाणिक सूचनाओं के अनुसार अब तक न तो प्रशासन के वादे के अनुसार दीवानराम को फी मृतक पच्चीस हजार (कुल एक लाख पच्चीस हजार) रुपये का मुआवजा मिला है और न इन्दिरा आवास योजना के अन्तर्गत मकान बनाने के लिये कोई मदद। चूँकि मृतक मोहनराम का अपने पिता से सम्बन्धविच्छेद हो गया था, इसलिये दीवानराम का रहने का भी कोई ठिकाना नहीं है। वह इधर-उधर मारा-मारा फिर रहा है।
कई राजनैतिक दलों के नेता भी धानारौली का दौरा कर चुके हैं। उनके लिये इस घटना में दलित कार्ड खेल कर आगामी विधानसभा चुनाव में राजनैतिक लाभ कमाने की पूरी सम्भावना थी। लेकिन भूमाफिया के वर्चस्व वाले इस भूभाग में आकर उन्हें भी जैसे साँप सूँघ गया। वे आये और उल्टे पाँवों लौट गये। अलबत्ता नैनीताल की शिल्पकार सभा ने जरूर इस मामले में एक कठोर प्रस्ताव पारित किया है। सभा ने इस दुर्घटना को दैवी न मान कर मानवकृत घोषित किया है और इसके लिये जिम्मेदार लोगों को दंडित करने की माँग की है। सभा ने मोहनराम के परिवार में एकमात्र बचे उसके पुत्र को सरकारी नौकरी दिये जाने की माँग की है।
एक गरीब दलित की इस चुपचाप मौत पर प्रख्यात शायर फैज अहमद ‘फैज’, जिनकी जन्म शताब्दी इन दिनों मनायी जा रही है, की कविता हम एक बार पुनः प्रकाशित कर रहे हैं। यह कविता हमने पहली बार तैंतीस वर्ष पूर्व नैनीताल समाचार के 15 अगस्त 1978 के अंक में प्रकाशित की थी- कहीं भी नहीं है,
****कहीं भी नहीं लहू का सुराग, न कातिल हाथ के नाखूनों में
न आस्तीनों पै कोई निशान, न सुर्खी है खून पिये कमीने होठों पै
न रंग है भालों की नोकों पै, न खाक पर कोई धब्बा,
न छज्जे पर कोई दाग
कहीं नहीं है कहीं भी नहीं
लहू का सुराग
न खर्च हुआ
बादशाह की खिदमत में खून
कि मुआवजा देते
न मैदाने जंग में बरपा
कि सनद रह पाती कि
झंडे पै लिखा जाता
पुकारता रहा बेआसरा यतीम लहू
किसी के पास न सुनने का वक्त था
न दिमाग
न मुद्दई न शहादत, हिसाब पाक हुआ
ये खून खाक के लिये था,
खाक को खुराक हुआ
**** मूल उर्दू
कहीं नहीं है कहीं भी नहीं लहू का सुराग़
ना दस्त-ओ-नाख़ून-ए-क़ातिल ना आस्तीं पे निशान
ना सुर्खियाए लब-ए-खंजर ना रंग-ए-नोक-ए-सीना
ना खाक पर कोई धब्बा ना बान पर कोई दाग़
कहीं नहीं है कहीं भी नहीं लहू का सुराग़
ना सर्फ-ए-खिदमत-ए-शाहान के खूं बहा देते
ना दी की नज़र के बे-आनाये जज़ा देते
ना रज़म गाह में बरसा के मोतबर होता
किसी आलम पे रक़म हो के मश्तहर होता
पुकारता रहा, बे आसरा, यतीम लहू
किसी को बेर-ए-समाअत, ना वक़्त था ना दमाग़
ना मुद्दा-ए, ना शहादत एशाब पाक हुआ
ये खून-ए-खाक नशीना था, रिज़क़-ए-खाक हुआ