वर्तमान में बेरोजगारों के साथ जो छलावा हो रहा है, उसका प्रत्यक्ष प्रमाण है ‘शिक्षा प्रेरक’। शिक्षा का अधिकार अधिनियम-2010 एवं सर्व शिक्षा अभियान के अन्तर्गत ‘साक्षर भारत मिशन-2010’ के कार्यक्रम के अन्तर्गत माह जून 2010 से प्रत्येक ग्राम पंचायत के दो शिक्षित युवक-युवतियों को शिक्षा प्रेरक एवं सह प्रेरक के रूप में सरकार द्वारा नियुक्त किया गया तथा माह जून 2010 में और माह सितम्बर में उन्हें तीन-तीन दिवसीय प्रशिक्षण भी दिया गया। इनको प्रौढ़ शिक्षा, सर्वशिक्षा का कार्य तथा स्थानीय प्राथमिक विद्यालयों में भी सहयोग देने हेतु कार्य दिया गया और माह जून से ही इनको नियुक्ति दी गयी और प्रतिमाह मानदेय रु. 2000 तय किया गया। पर आश्चर्य की बात है कि आज आठ माह हो जाने के पश्चात भी इन्हें मानदेय नहीं मिल पाया है जबकि ये अपना कार्य बड़ी ईमानदारी से करते आ रहे हैं। आज ये आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहे हैं और सरकार के उपेक्षित रवैये से क्षुब्ध और दुःखी हैं। एक ओर जहाँ सरकारें शिक्षा के प्रचार पर करोड़ों खर्च कर रही है वहीं आज ये प्रेरक अपना मेहनतनामा रु. 2000 भी प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं। यह हाल पूरे बागेश्वर जनपद का है जिसमें गरुड़, बागेश्वर और कपकोट तीनों विकासखण्ड आ जाते हैं। यदि सरकारी अध्यापक या शिक्षकों के विभिन्न फेडरेशन या संघ जरा भी हल्ला करते हैं तो सरकार के पसीने छूट जाते हैं वहीं दूसरी ओर ये शिक्षित बेरोजगार ‘शिक्षा प्रेरक’ के रूप में सरकार की उपेक्षा का दंश झेल रहे हैं। यदि यही आलम रहा तो ये प्रेरक अपना मौन तोड़कर सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरने को मजबूर होंगे। अतः इस ओर सरकार को ध्यान देना चाहिए।
सन्तोष, ग्राम एैचर, पो. ड़ंगोली, जिला-बागेश्वर, (उत्तराखण्ड)