(प्रशासन के लिए सरदर्द और जनता के लिए आतंक का पर्याय बन चुके उत्तराखण्ड के 29 कुख्यात नरभक्षियों को मात्र नौ वर्ष की अवधि में, अपनी बंदूक का निशाना बनाने वाले शिकारी लखपत सिंह मूलतः शिक्षक हैं। प्रस्तुत है उनसे देवेश जोशी की छवीं बथ। )
प्रश्न:- कलम और पुस्तक एक शिक्षक के स्वाभाविक साथी माने जाते हैं फिर बन्दूक कैसे रास आई ?
उत्तर:- सन 2000 मे आदिबद्री-गैरसैण में नरभक्षी गुलदार सक्रिय था। बड़े-बड़े शिकारी आये, परन्तु नरभक्षी इतना चालाक हो गया था कि 7 साल तक उसे नहीं मारा जा सका। इसे मारने हेतु मुझे भी 30 अगस्त 2001 को परमिट जारी किया गया। आठ माह के अथक प्रयास के बाद मैं उसे मार सका। तब तक वह बारह बच्चों और एक वृद्धा की जान ले चुका था। सारे बच्चे 6 से 14 आयु वर्ग के थे।
प्रश्न:- अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में कुछ बताइए।
उत्तर:- मैं जनपद चमोली के गैरसैंण कस्बे से सटे ग्राम ग्वाड़ मल्ला का निवासी हूँ। मेरा जन्म 15 जनवरी 1964 को हुआ। दो बहिनों का अकेला भाई हूँ। मेरे पिता त्रिलोक सिंह रावत अध्यापक थे तथा तीनों चाचा सेना में कार्यरत थे। हाईस्कूल की पढ़ाई के दौरान पिताजी का आकस्मिक निधन हो गया था। विज्ञान-गणित विषयों के साथ मैंने वर्ष 1982 में प्रथम श्रेणी में इण्टरमीडिएट तथा 1984 में बी.टी.सी. किया। अगस्त 1984 से मैं जनपद चमोली में शिक्षक तथा वर्ष 2003 से सर्व शिक्षा अभियान में समन्वयक के रूप में कार्यरत हूँ। मेरे परदादा लक्ष्मण सिंह पूर्व सेनानी व बेहतरीन शिकारी थे। अंग्रेजं उन्हें शिकार के लिए अपने साथ ले जाते थे। दादा की शिकार कथाओं तथा चाचाओं के सेना के रोमांचक किस्सों को सुनकर मैं बचपन से ही सेना में भर्ती होने का सपना देखने लगा। परन्तु घर में अकेला बेटा होने के कारण माँ मुझे सेना में भेजने के लिए तैयार नहीं हुई।
प्रश्न:- 29 मानवभक्षी गुलदारों का शिकार आपकी अचूक निशानेबाजी का प्रतीक है। क्या आपने कभी विधिवत कोई प्रशिक्षण लिया ?
उत्तर:- 1984 में मैंने बी.टी.सी. परीक्षा देने के बाद एस.एस.बी. के गुरिल्ला प्रशिक्षण में भाग लिया तथा सर्वश्रेष्ठ शूटर चुना गया।
प्रश्न:- उत्तराखण्ड के पहाड़ी क्षेत्रों में गुलदारों के नरभक्षी होने के पीछे आप क्या कारण मानते हैं ?
उत्तर:- वन, वन्य प्राणी और मानव परस्पर एक दूसरे के पूरक हैं। परन्तु शहरीकरण, औद्योगीकरण और वनों के अन्धाधुन्ध कटान ने बाघों (गुलदार) का प्राकृतिक आवास और आहार छीना तो वहीं प्राकृतिक सन्तुलन पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ा। आवास और आहार की कमी हिंसक पशुओं को मानव बस्तियों के नजदीक खींच लाई। पहाड़ों से बढ़ते पलायन व सुविधाभोगी प्रवृत्ति के कारण पशुपालन में कमी आ रही है। पूर्व में अलाभप्रद जानवर जंगल में छोड़ दिये जाते थे, परन्तु अब इन्हें लोभवश औने-पौने दामों में बेचा जाता है। गाँवों के आस-पास बढ़ती लैन्टाना की झाड़ियाँ भी बाघों को सुरक्षित आवास प्रदान कर रही हैं। बाघों के शिकार पर लगी रोक का कड़ाई से पालन होना तो बाघों की असामान्य वृद्धि का कारण है ही।
प्रश्न:- एक नरभक्षी को मारने के लिए क्या तैयारी करनी पड़ती है ?
उत्तर:- पहले प्रभावित क्षेत्र की सम्पूर्ण जानकारी लेना आवश्यक होता है। क्योंकि यह कार्य केवल रात को ही किया जा सकता है, अतः स्थानीय भूगोल का ज्ञान होना आवश्यक है।
प्रश्न:- एक अच्छा शिकारी बनने के लिए वन्य जीवों के मनोविज्ञान का अच्छा ज्ञान आवश्यक है। आपने यह ज्ञान कैसे अर्जित किया ?
उत्तर:- यह ज्ञान मुझे अनुभव से ही प्राप्त हुआ है। शिकार पुस्तकों को पढ़ कर और प्रत्येक नरभक्षी को मारने के बाद उसके व्यवहार के अध्ययन से भी इस मनोविज्ञान की समझ बढ़ी है।
प्रश्न:- प्रसिद्ध वन्यजीव प्रेमी एवं शिकारी जिम कार्बेट के बारे में आपके क्या विचार हैं ?
उत्तर:- जिम कार्बेट निस्संदेह महान थे। मैंने उन पर बनी फिल्म डिस्कवरी चैनल पर देखी थी। आज हमारे पास अच्छी सर्चलाइटें है। कभी-कभी मैं कल्पना करता हूँ कि जब टॉर्च तक नहीं थी तो उन्होंने कैसे बाघों को मारा होगा।
प्रश्न:- क्या आप समाज को मानवभक्षी गुलदारों के आतंक से मुक्त करने के अपने योगदान में प्रशासन/ वन विभाग /शिक्षा विभाग की भूमिका से संतुष्ट हैं?
उत्तर:- प्रशासन का योगदान इसमें शून्य है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण यह है कि मेरे द्वारा 26 नरभक्षी मारने के बाद भी केवल दो बार पाँच हजार और दो हजार का पुरस्कार प्राप्त हुआ, जबकि एक नरभक्षी को मारने में मेरे लगभग 20 से 25 हजार रुपये खर्च होते हैं। वन विभाग केवल भोजन की व्यवस्था करता है। हाँ, शिक्षा विभाग बड़ा मददगार रहा है। सर्व शिक्षा अभियान में अत्यधिक बोझ के बाद भी जरूरत पड़ने पर मुझे कार्य मुक्त कर दिया जाता है, ताकि मैं प्रभावित क्षेत्र को अपनी सेवा दे सकूँ।
प्रश्न:- ऐसे अभियान में किसी निर्दोष पशु के शिकार की आशंका नहीं रहती ?
उत्तर:- जब तक नरभक्षी की पूरी तरह पुष्टि नहीं हो जाती है तब तक उसे शूट नहीं किया जाता। नरभक्षी की आदतों का पूरा ज्ञान होना आवश्यक है। वह प्रायः निश्चित समय पर सायं एवं सुबह ही वार करता है। साथ ही वह हमेशा बस्ती में ही मारा जाता है।
प्रश्न:- व्यक्ति की रुचि का क्षेत्र ही अगर उसका पेशा भी हो तो उसकी सफलता की संभावना बढ़ जाती है। इस पर आप क्या कहना चाहेंगे ?
उत्तर:- निश्चित रूप से सेना या निशानेबाजी में होने पर मुझे बेहतर अवसर प्राप्त हो सकते थे। तब मेरे लिए नौकरी और रुचि भी एक दूसरे के पर्याय से हो जाते। किन्तु समाज को अभय प्रदान करने का मेरा मिशन भी कम संतुष्टिकारक नहीं है।
प्रश्न:- क्या अलग-अलग क्षेत्रों के मानवभक्षी गुलदार एक सा व्यवहार करते हैं या इसमें भी कुछ भिन्नता होती है ?
उत्तर:-प्रत्येक नरभक्षी के शिकार करने के तरीके, ढंग तथा समय में समानता के बावजूद अलग-अलग क्षेत्रों व भौगोलिक परिस्थिति के अनुसार उनके व्यवहार में भी पर्याप्त भिन्नता दिखाई देती है। आदिबद्री का नरभक्षी ढोल-बाजों की आवाज सुनकर शादी, सगाई, त्यौहार वाले घरों में शाम होते ही पहुँच जाता था। वह जानता था कि ऐसे घरों में लोग छोटे बच्चों की ओर से लापरवाह हो जाते हैं। उसके द्वारा पाँच वारदातें इसी प्रकार की गई। उत्तरकाशी का नरभक्षी सीढ़ियों से चढ़कर दुमंजिले में पहुँच कर अन्दर से छोटे बच्चों को उठाकर नीचे फेंक देता था। उत्तरकाशी के नरभक्षी एवं आदिबद्री के नरभक्षी के दूसरे क्षेत्र में चले जाने से यह पता चलता है कि नरभक्षी बनने के बाद गुलदार का कोई निश्चित क्षेत्र नहीं रहता है। चम्पावत के मण्डलक में मारे गये बाघों में देखा गया कि नरभक्षी जोड़े में शिकार करते थे, जबकि दोनों मादायें थीं। जखोली का नरभक्षी हमेशा वारदात से एक दिन पूर्व शाम को उस क्षेत्र में देखा गया, जहाँ उसके द्वारा दूसरे दिन वारदात की गई। मानो वह एक पेशेवर अपराधी की तरह आगामी वारदात की जगह तथा वहाँ की हलचलों का निरीक्षण कर पूर्व तैयारी करता हो। धनपुर के खरसाई गाँव में मारा गया नरभक्षी इतना शातिर था कि वह शिकारी दल की टोह ले रहा था। गोपेश्वर में मारा गया एक नरभक्षी केवल दिन में ही वारदात कर रहा था। उसका व्यवहार अन्य नरभक्षियों से बिल्कुल अलग था।
प्रश्न:- नरभक्षी को मारने पर पीड़ित समुदाय की प्रतिक्रिया कैसी रहती है ?
उत्तर:- लोगों के चेहरे से मिटी चिंता की लकीरें स्पष्ट दिखती हैं। वे एक हीरो सरीखा मान-सम्मान भी देते हैं। मगर कई बार मारे जाने के बाद भी कुछ लोग उसे नरभक्षी मानने को तैयार ही नहीं होते हैं। अधिक पीड़ा तब होती है, जब ऐसे व्यक्ति भी बाघ मारने के तरीके सिखलाने लगते हैं, जिन्होंने मुश्किल से ही जीवन में कभी बाघ देखा होगा।
प्रश्न:- आप लोगों को नरभक्षियों से बचने के लिए क्या सावधानियाँ बरतने को कहेंगे ?
उत्तर:- नरभक्षी अधिकतर सायं 6 बजे से 8 बजे के लगभग ही शिकार करता है। अतः इस समय छोटे बच्चों को अकेला बाहर न जाने दें। शौच आदि के लिये अकेले न जाएँ। घर के आसपास की लेण्टाना की झाड़ियाँ काट दें। नरभक्षी हमेशा आक्रमण पीछे से करता है, अतः झाड़ी वाले स्थानों की ओर अधिक ध्यान दें। केवल सही सूचनायें ही शिकारी दल को दें। शिकारी दल के पहुँचने से पूर्व किसी भी प्रकार नरभक्षी को डराने व भगाने हेतु फायर न करें, न पटाखे छोड़ें। विद्यालयों में नरभक्षी बाघ विशेषज्ञों को बुलाकर उसके व्यवहार सावधानियों पर बच्चों एवं अभिभावकों का संवेदीकरण करवाना चाहिये। नरभक्षी के व्यवहार एवं बचाव सम्बन्धी साहित्य को स्कूली पाठ्यक्रम में जोड़ा जाना चाहिए। प्रशासन द्वारा किए जाने वाले आपदा प्रबधन/ प्रशिक्षणों में भी इस विषय को सम्मिलित किया जाना चाहिए।