12 मार्च को सदन में प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा पेश वर्ष 2011-12 के बजट में कुल अनुमानित वार्षिक बजट 19366.91 करोड़ रुपये में से योजनागत मद में मात्र 6564.29 करोड़ ही रखे गये हैं। बाकी 12802.62 करोड़ रुपये गैर योजनागत मद में हैं। यानी बजट का लगभग दो तिहाई खर्च इस शासन-प्रशासन को चलाने के लिए और एक तिहाई हिस्सा विकास के लिए रखा गया है। जबकि सच्चाई यह है कि बजट का यह एक तिहाई हिस्सा भी राज्य बनने के बाद कभी जमीनी स्तर पर पूरा नहीं लगा। हमारी सरकारी मशीनरी वित्तीय वर्ष के खत्म होने तक इस योजनागत राशि का 28 से 48 प्रतिशत तक खर्च ही नहीं कर पाती हैं। पिछले वित्तीय वर्ष में सरकार विकास योजनाओं के लिए रखे गये कुल मद का मात्र 52 प्रतिशत ही खर्च कर पायी। भीषण प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए राज्य सरकार केन्द्र से 21 हजार करोड़ रूपये की माँग करती रही, मगर केन्द्र से भेजे गये 650 करोड़ रुपये और अपने संसाधनों से जुटाये 25 करोड़ रुपये को मिलाकर आपदा मद में आये 675 करोड़ रुपये में से राज्य सरकार अब तक 267 करोड़ ही खर्च कर पायी है। जब राज्य के विधायक अपनी निधि,जो स्थानीय स्तर पर उनकी लोकप्रियता बढ़ाने का एक माध्यम है, का ही वर्ष 2010-11 में औसतन 40 प्रतिशत राशि का उपयोग न कर वापस करा चुके तो अन्य योजनाओं का अनुमान लगाया जा सकता है।
बजट प्रस्तावों में राज्य की कुछ सुनहरी तस्वीर दिखाने की कोशिश की गयी है। जैसे राज्य की आर्थिक विकास दर जहाँ वर्ष 2001-02 में 2.9 प्रतिशत थी, वर्ष 2010-11 में वह बढ़कर 11.30 प्रतिशत हो गई है, इसी दौरान राज्य में प्रति व्यक्ति वार्षिक औसत आय 15,000 रुपये से बढ़कर 56,794 रुपये हो गई है। लेकिन सरकार ने यह नहीं बताया कि आखिर राज्य के सकल घरेलू उत्पाद की स्थिति क्या है ? अगर राज्य की 25 प्रतिशत आबादी शहरी है और 75 प्रतिशत कृषि पर निर्भर ग्रामीण, तो इन 10 वर्षों में कृषि क्षेत्र ने राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में कितनी वृद्धि की है ? अगर राज्य में प्रति व्यक्ति औसत आय में लगभग पौने चार प्रतिशत की वृद्धि हो गई है तो फिर पर्वतीय क्षेत्र से इन दस वर्षों में रोजी-रोटी के लिए बड़े शहरों की ओर पलायन की रफ्तार में वृद्धि क्यों हुई है। इस बजट के लिए 14,325.69 करोड़ राजस्व लेखे से और 5,041.22 करोड़ पूँजी लेखे से जुटाने का लक्ष्य रखा गया है। मगर यह नही बताया जा रहा है कि कैसे यह लक्ष्य पूरा किया जायेगा।
एक रिपोर्ट के अनुसार इन दस वर्षों में राज्य सरकार पर कर्ज का बोझ लगभग सात गुना बढ़ गया है। राज्य बनते समय 3,449 करोड़ रुपये का कर्ज था। मगर 2011-12 में यह राशि बढ़ कर 21,720 करोड़ हो गयी है। खण्डूरी के कार्यकाल में अवश्य यह कर्ज 2008-09 में 13,037 करोड़ से घटकर 4,443 करोड़ रह गया था। मगर अब इसके 21,720 करोड़ हो जाने का अर्थ है कि इन दो वर्षों में कर्ज का बोझ 5 गुना बढ़ा है। बजट प्रस्ताव में 1812.30 करोड़ रुपये पुराने कर्ज का ब्याज चुकाने और 1638.73 करोड़ कर्ज की किस्त चुकाने के लिए हैं। मात्र एक करोड़ के आसपास की आबादी के छोटे से प्रदेश पर इतना बड़ा कर्ज क्यों ? यदि यह प्रदेश इतनी ही तरक्की कर रहा है तो फिर केन्द्र के विशेष आर्थिक पैकेजों की अपेक्षा क्यों है ?
बजट में कृषि के लिए मात्र 273.59 करोड़ रुपये का प्रावधान है। यानी औसत प्रति व्यक्ति 273.59 रुपये। यह वह क्षेत्र है जिस पर राज्य की 75 प्रतिशत आबादी की आजीविका मुख्य रूप से निर्भर करती है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार को बढ़ाने व ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति देने में पशुपालन, डेयरी विकास व मत्स्य पालन महत्वपूर्ण योगदान कर सकता है। मगर इसके लिए भी बजट में मात्र 116.14 करोड़ रुपये की ही व्यवस्था की गयी है। अटल खाद्यान्न योजना का ढोल पीटने वाली सरकार पिछले 2 वर्षों से एपीएल कार्ड धारकों को एक भी दाना चावल का उपलब्ध नहीं करा पायी है। इस अति महत्वाकांक्षी योजना के लिए भी बजट में मात्र 232.21 करोड़ रुपये की व्यवस्था है। अचरज की बात तो यह है कि उत्तराखण्ड जैसे शान्तिपूर्ण राज्य, जहाँ अपराध अन्य राज्यों की तुलना में नगण्य हैं, आन्तरिक सुरक्षा के नाम पर 738.71 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि रखी गयी है, जो कृषि, पशुपालन, डेयरी विकास, मत्स्य पालन, खाद्य एवं आपूर्ति के लिए आबंटित कुल राशि के योग से भी कहीं ज्यादा है। आखिर क्यों सरकार 75 लाख ग्रामीणों की आजीविका व जरूरतों से अधिक खर्च आन्तरिक सुरक्षा पर कर रही है ?
सरकार की औद्योगिक नीति राज्य की बेशकीमती व उपजाऊ कृषि भूमि को कंक्रीट के जंगल में बदलने पर केन्द्रित है। रोजगार के महत्वपूर्ण क्षेत्र पर्यटन पर मात्र 107.57 करोड़ रुपये रखा गया है। खेल एवं युवा कल्याण पर 40.20 करोड़ रुपये, पंचायती राज पर 74.35 करोड़ तथा वैकल्पिक ऊर्जा पर (जिसमें एक लाख सोलर लालटेन व 13 हजार सोलर स्ट्रीट लाइट लगाने का लक्ष्य है) मात्र 6.74 करोड़ रुपये की धनराशि का ही प्रावधान किया गया है। ये बजट प्रावधान रोजगार व ग्रामीण विकास योजनाओं के प्रति सरकार का उपेक्षा भाव ही दर्शाते हैं। अटल आदर्श गाँव के रूप में चुने गये 670 ग्रामों में से 584 को सड़क से जोड़ देने का विशेष उल्लेख मुख्यमंत्री ने अपने बजट भाषण में किया। मगर सच्चाई यह है कि अटल आदर्श ग्रामों के रूप में उन्हीं गाँवों को मुख्य रूप से चयनित किया गया है, जो पहले से सड़क से जुड़ें हैं। एक भी गाँव ऐसा नही होगा, जहाँ चयन के बाद सड़क बनी हो।
कुल मिला कर यह बजट प्रदेश की 15 प्रतिशत आबादी के अनुकूल और 85 प्रतिशत आबादी के प्रतिकूल है। इससे उत्तराखंड में कृषि क्षेत्र तबाह होगा और पहाड़ों से पलायन की गति और तेज होगी।