ईश्वर जोशी
विगत वर्ष की अतिवृष्टि से हुए नुकसान की भरपाई की दिशा में सरकार द्वारा किये गये प्रयास निराशाजनक रहे हैं। भविष्य में होने वाली किसी आपदा से होने वाले नुकसान को कम किया जा सके, इसके लिए भी सरकार गम्भीर नहीं दिखायी देती। तमाम सरकारी दावों की पोल अतिवृष्टि के मात्र दो माह के भीतर ही तब खुल गयी थी, जब खेत एवं फसल के मुआवजे के तौर पर काश्तकारों को महज दो-चार सौ रुपये थमा दिये गये। भेटुली निवासी बिशन राम को बताया गया कि उसका मकान पूर्ण क्षतिग्रस्त होने के बावजूद उसे मुआवजा इसलिए नहीं मिल सकता क्योंकि उसके पास दूसरा मकान भी है। झिझाड़ के हरक सिंह ने अपना शौचालय धराशायी होने की रिपोर्ट दी तो उससे कहा गया कि आपदा राहत के मानकों में शौचालय तो आता ही नहीं। अब हरकदा कैसे समझाये कि 10 सालों की मेहनत से कैसे वह अपने शौचालय का सपना पूरा कर सका था। नारायण सिंह को भी गौशाला टूटने पर मानक के अभाव में राहत राशि नहीं मिल पायी। भनारीगैर निवासी महेश राम के आँगन और खेत बह गये। उसने भाई के घर शरण ली। लेकिन राहत राशि नहीं मिल पायी। उसका मकान तो क्षतिग्रस्त की परिभाषा में नहीं आ पा रहा है। उसके मकान में न तो दरार है, न उसकी कोई दीवार टूटी है और न ही छत नीचे आयी है। आखिर आंशिक, गम्भीर व पूर्ण क्षति के यही मानक तो पटवारियों को बताये गये हैं। फिर भला आनन्दी देवी को राहत कैसे मिलती ? उसका मकान तो बेनाप भूमि पर बना था। बार-बार अपनी बताने से जमीन उसकी तो हो नहीं जाती। खाता-खतौनी तो पटवारी के पास ठहरी।
टूट-फूट का पुनर्निर्माण मनरेगा के तहत किये जाने की सरकार की घोषणा के बाद प्रभावितों में उम्मीद जगी कि उनके टूटे आँगन एवं खेत की दीवारें देर-सवेर बन ही जायेंगी। मनरेगा में मजदूरी कम भी है तो कोई बात नहीं। आधा पैसा भी सरकार से मिल जायेगा तो बाकी वे मेहनत मजदूरी कर किसी तरह उसे पूरा कर ही लेंगे। लेकिन उन्हें कहाँ पता था कि सरकार की प्राथमिकता में क्षतिग्रस्त निजी संपत्ति का पुनर्निर्माण तो है ही नहीं। ऊपर से राज्य में मनरेगा कार्य संपादन हेतु आवश्यक कर्मचारियों की नियुक्तियाँ तो हुई नहीं हैं। एक ही जे.ई. को पूरा विकासखण्ड देखना है। नतीजतन, पुनर्निर्माण तो दूर, साल भर में एस्टीमेट तक नहीं बन पाये। क्षतिग्रस्त सार्वजनिक संपत्ति, रास्ते, पुल, चेकडैम, सिंचाई गूल के ठेके ऊपर से ही हो गये। सत्तासीन पार्टी के तमाम कार्यकर्ता ठेकेदार बन गये। काम खुद करने की उम्मीद पाले ग्राम प्रधानों ने इस कार्यवाही को पंचायत की तौहीन बताकर शोरगुल मचाया, लेकिन उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज बनकर रह गयी।
एक विशेषज्ञ समिति द्वारा गधोली, भेटुली, सीमा जैसे गाँवों, जहाँ जमीनें धँस रही थीं, का यह जानने के लिये भ्रमण किया गया कि ये जगहें रहने के लिए कितनी महफूज हैं ? उन्होंने क्या रिपोर्ट दी, न तो ग्रामीणों को पता चला और न ही प्रशासन को। अपनी सारी जमा-पूँजी आलीशान मकान बनाने में लगा देने वाले भेटुली के सेवानिवृत्त फौजी बचे सिंह मकान के क्षतिग्रस्त हो जाने के बाद साल भर पूछते रहे कि विशेषज्ञ टीम के अनुसार क्या वहाँ पुनः मकान बनाना सुरक्षित है ? उन्हें कोई जवाब नहीं मिला। आखिरकार उन्होंने पास ही नई जगह पर मकान बनाना शुरू कर दिया। अभी इसी माह में हुयी अतिवृष्टि से वह मकान भी भूस्खलन की चपेट में आ गया और उसकी दीवार ढह गयी।
बीमारी के मूल कारणों को नजरअंदाज कर तात्कालिक इलाज देकर पल्ला झाड़ लेना आज हमारे नीति-नियंताओं की आदत बन चुकी है। यह प्रवृत्ति आपदा में भी दिखायी देती है। भविष्य में किसी आपदा से होने वाली क्षति को कम से कम किया जा सके, इसके लिए कोई भी प्रयास नहीं हुए। आपदा राहत का सारा ध्यान सड़कों के पुनर्निर्माण पर केन्द्रित दिखायी दिया। इसके बावजूद अल्मोड़ा-भवाली जैसा महत्वपूर्ण मोटरमार्ग एक साल बाद भी सुचारु नहीं हो सका। अन्य सड़कों की टूटी दीवारें तो काफी हद ठीक कर दी गयीं, लेकिन नाली निर्माण व बंद कलमटों को खोलने में रुचि नही दिखायी। फलस्वरूप इस बरसात में वर्षा का सारा पानी सड़क व खेतों में बहकर उन्हें नुकसान पहुँचाता रहा। खतरे की जद में आये भवनों की सुरक्षा के कोई उपाय नहीं हुए। जिन 233 गाँवों को खतरनाक मानते हुए उत्तराखण्ड सरकार ने उन्हें अन्यत्र बसाने की बात कही थी, उनमें से एक को भी अब तक विस्थापित नहीं किया गया है। बेनाप भूमि को वन भूमि के दायरे से बाहर करने की मुख्यमंत्री की पहल से एक उम्मीद जगी थी कि आपदा के बाद ही सही, सरकार की समझ में एक जरूरी बात तो आयी। लेकिन यह उम्मीद महज एक सप्ताह तक ही कायम रही, जब इस मसले को राज्य सरकार ने विधि विभाग को सौंप दिया।
वनाधिकार कानून का प्रभावी क्रियान्वयन शायद आपदा से हुयी क्षति की भरपायी की दिशा में कुछ हद तक राहत देने वाला हो सकता था, लेकिन नौकरशाही से दबे हुए हमारे जन प्रतिनिधियों की समझ में यह बात नहीं आ रही है। इस कानून को राज्य में लागू करने के लिए जिम्मेदार समाज कल्याण विभाग के मंत्री मातबर सिंह कण्डारी ने देहरादून में एक बैठक में वनाधिकार कानून के क्रियान्वयन का जिम्मा सरकार द्वारा ग्राम पंचायतों को सौंप दिये जाने जैसी हास्यास्पद बात मंच से कह डाली। बिनसर में इको टूरिज्म मैप के लोकार्पण के अवसर पर आये पर्यटन एवं संसदीय कार्यमंत्री प्रकाश पंत द्वारा भी वनाधिकार कानून के 1000 मीटर से ऊपर लागू न होने तथा इसे वन पंचायतों के गठन वाला कानून बताने से सरकार की नासमझी का अंदाजा लगाया जा सकता है।
आपदा का एक साल बीत जाने के बाद नगशीला के बालम सिंह जैसे सैकड़ों लोगों के घरों के आगे भूस्खलन से आये रौखड़ इस वर्ष की बारिश के बाद और चौड़े हो गये हैं। प्राथमिक विद्यालय नगशीला का भवन ध्वस्त होने के एक साल बाद भी नये भवन के निर्माण की प्रक्रिया प्रारम्भ नहीं हुयी है। यहाँ के बच्चे पिछले एक साल से उसी ग्रामसभा में स्थित एक अन्य प्राथमिक विद्यालय में पढ़ रहे हैं। भेटुली निवासी बचे सिंह का परिवार आज भी उसी टैंट में रह रहा है, जिसे उसने पिछले साल सितम्बर माह में मकान क्षतिग्रस्त होने के बाद गाड़ा था। गत वर्ष जिन घरों के आगे-पीछे हुए भूस्खलन से मकानों को खतरा पैदा हो गया था, उनके परिवारजन साल भर आतंक में जीते रहे। एक बड़ा अन्तर यह अवश्य दिखायी दिया कि इस बार अगस्त माह में हुई वर्षा से हुयी क्षति की रिपोर्ट दर्ज कराने में अब ग्रामीणों ने कोई रुचि नहीं दिखायी। उससे क्या होने वाला ?