प्रस्तुति : राजेन्द्र गहतोड़ी
इतिहास की जड़ें काली कुमाऊँ में गहराई तक फैली हुई हैं। यत्र-तत्र मौजूद पुरातात्विक अवशेष अतीत की गौरव गाथा का वर्णन करते हैं। जिला मुख्यालय से लेकर प्रत्येक दिशा में जनपद के अन्तिम छोर तक बारहवीं सदी से लेकर ई.पू. तक का पुरातत्व बिखरा पड़ा है, जो ऐतिहासिक अध्ययन न हो पाने के कारण उपेक्षित पड़ा है। ऐसा ही स्थान एक पाटी विकास खण्ड भी है, जहाँ विभिन्न काल खण्डों का इतिहास समेटे अनेक पुरातात्विक सामग्री अन्वेषकों की बाट जोह रही है। लकीर पीटने वाले शोधार्थी इस सामग्री का मूल्यांकन करने में असमर्थ रहे हैं। उम्मीद से परे नये राज्य और नई प्रशासनिक इकाई के गठन के बाद तो ऐसी सामग्री की चोरी की घटनायें बढ़ी हैं। मंदिरों से घंटियां चोरी होना तो आम बात थी, मगर अब बेशकीमती मूर्तियाँ भी गायब होने लगी हैं।
बीते दिनों गरसाड़ी गाँव से रक्षादेवी व कराली देवी की मूर्तियों की चोरी का प्रकरण सामने आया, जो राजस्व पुलिस से चलते-चलते नियमित पुलिस तक पहुँचा। परिणाम ढाक के तीन पात! इस प्रकरण के बाद गरसाड़ी सहित आसपास के तमाम गाँवों के लोगों की प्रतिक्रिया जाननी चाही तो जड़ों से जुड़ाव की कहानी अटपटे रूप में सामने आई। गाँव के विद्वान डा. प्रेम बल्लभ शास्त्रीजी क्षेत्रीय राग-भाग के बारे में पुष्ट जानकारियाँ रखते हैं, जन विश्वास की बात को महत्व देते हैं परन्तु इस बारे में टालमटोल करते दिखाई दिये।
लोहाघाट देवीधूरा मोटरमार्ग पर गर्सलख से बायीं ढलान पर डेढ़ किमी की दूरी पर सुन्दर संकरी घाटी गरसाड़ी के उत्तरी छोर पर ऐतिहासिक प्राचीन मंदिरों के अवशेष विद्यमान हैं। खण्डहरों को देखने से प्रतीत होता है कि इस स्थान पर पंचायतन शैली का भव्य व विशाल मंदिर समूह रहा होगा। कुछ विद्वान मानते हैं कि अन्य मन्दिरों की भाँति यहाँ के मंदिर भी तुर्कों के आक्रमण का शिकार रहे होंगे। मंदिरों की विशालता का पता यहाँ बिखरे पड़े आमलकों से चलता है, जो मंदिर के शिखर पर रखे जाते थे। गरसाड़ी के लोग इस स्थान को रक्षादेवी का पवित्र स्थान मानकर पूजा करते हैं। मूर्तियों के अवशेषों को रक्षादेवी मानते हैं, जो लोक कल्याण की देवी मानी जाती हैं। मूर्तियाँ अन्यत्र की भाँति यहाँ भी सातवीं से नवीं शताब्दी की मानी जा सकती हैं। लेकिन स्थान की प्राचीनता ईसवी पूर्व की मानी जा सकती है, क्योंकि काली कुमाऊँ का क्षेत्र महाभारत से लेकर बौद्धकाल की तांत्रिक उपासनाओं से भी जुड़ा हुआ है। हो सकता है रक्षादेवी के स्थानीय उपासक मूल रूप से किन्हीं कारणों से यहाँ से पलायन कर गये हों और कालान्तर में यहाँ की नई बसासत ने पूजन अपना लिया हो। वर्तमान में रक्षादेवी, शिवालय और करालादेवी के पुजारी डैंडवाल ब्राह्मण के परिवार हैं, जो अपने आपको जोशी लिखते हैं।
रक्षादेवी की इन मूर्तियों में अन्यत्र की भाँति औदीच्य वेश की आत्यिनारायण मूर्तियाँ हैं जो कमलपुष्प हाथ में धारण किये हुए हैं। मगर इन मूर्तियों के साथ कोई गण या उपासक नहीं हैं, जबकि रौलमेल की सूर्यमूर्ति के साथ अन्य मूर्तियाँ भी उकेरी गई हैं। एक अन्य मूर्ति में लक्ष्मी के साथ श्री विष्णु भव्य रूप में विराजमान हैं। इनके अलावा अन्य खण्डित मूर्तियों के अवशेष भी जहाँ-तहाँ बिखरे पड़े हैं। अनुमान लगाया जा सकता है कि मन्दिर का मूल स्वरूप अति सुन्दर रहा होगा। लेकिन मन्दिर की पीठिका और आधार का पता अतीत के थपेड़ों के साथ कहीं गुम हो गया है। मंदिर की बड़ी-बड़ी शिलाएँ बसासत के निजी प्रयोग के साथ-साथ असहाय स्थिति में दूर-दूर तक बिखरी पड़ी हैं। कुछ शिलाओं को स्थानीय प्रयासों से एकत्र किया गया है। भारी-भरकम शिलायें भव्य सुन्दर विशाल मंदिर होने के प्रमाण की मूक गवाही हर आगन्तुक को देती हैं। इस स्थान से उत्तरी दिशा में कुछ दूरी पर स्वच्छ पानी का एक मनोहारी झरना है।
रक्षादेवी के इस प्राचीन स्थल के दक्षिण में आधा-पौन किमी की दूरी पर गाड़ के पश्चिमी किनारे पर एक शिवालय है, जिसके आंगन पर पड़ा एक बड़ा सा आमलक इस स्थान की प्राचीनता की साक्षी दे रहा है। अवशेष के रूप में कुछ शिलायें गाड़ के किनारों पर अतीत का दुखड़ा रोते हुए दिखाई देती हैं। शिवालय के दक्षिणी ओर दो किमी. की दूरी पर कराइदे नामक स्थान है, जहाँ पर कराली देवी के मन्दिर के भव्य स्वरूप के भग्नावशेष बिखरे पड़े हैं। इस स्थान पर मन्दिर के पूर्वी छोर पर एक बावड़ी भव्य रूप में आज भी विद्यमान है। इसके बारे में स्थानीय धारणा है कि यह बावड़ी दूध से भरी रहती थी। इस दूध से बनी खीर का भोग देवी को लगाया जाता था। एक साधू ने इस बावड़ी के दूध को जूठा कर दिया जिससे यह सूख गई। इस स्थल के आसपास के खेतों में भी मंदिर की शिलाओं को देखा जा सकता है। समीप ही प्राथमिक विद्यालय गरसाड़ी है। विद्यालय निर्माण के समय भी मंदिर की शिलाओं को भी प्रयोग में लाया गया। तब एक भव्य देवी की मूर्ति को विद्यालय के आंगन की दीवार के साथ लगाया गया था। एक मूर्ति मन्दिर में थी। बाद में दोनों को एक साथ रख दिया गया था। हाल के दिनों में ये मूर्तियाँ चोरी हो गई हैं।
पाटी के उत्तर-पूर्व में, चौड़ाकोट गाँव में भी प्राचीन देवी मन्दिर के अवशेष बिखरे पड़े हैं। वर्तमान हाईस्कूल के पास पड़े आमलक से प्रतीत होता है कि प्राचीन मंदिर का स्वरूप विशाल रहा होगा। चौड़ाकोट के आगे पीपलछीना से करीब चार किमी दूर खिमशिरा नामक स्थान पर प्राचीन शिवमंदिर के भग्नावशेष बिखरे पड़े हैं। कुछ दूरी पर श्मशान होने के कारण लोग शिव रूप में इस स्थान की मान्यता देकर पूजन करते हैं। पाटी के उत्तरी ढलान की तलहटी में प्राचीन बालेश्वर शिव विराजमान हैं। इस मंदिर में नित्य प्रति शिव को खीर का भोग लगता है। भैरव मंदिर में बलिदान की प्रथा है। बलिदान करते समय मंदिर के कपाट बंद कर दिये जाते हैं। बेलोचनी गंगा के एक तट पर मंदिर है और दूसरे तट में गोलना सेरी गाँव स्थित है। प्राचीनकाल की गूँठ व्यवस्था इस मंदिर के लिए भी थी, जिसमें मंदिर की व्यवस्था के लिए गाँव को राजा द्वारा मंदिर को अर्पित किया जाता था। पुजारी का मानना है कि यह गाँव राजा विरोचन की गूँठ है। अवषेश गवाही देते हैं कि यहाँ पर अनेक मंदिरों का समूह रहा होगा। पुजारी यहाँ पर बाईस मंदिरों का समूह बताते हैं, जो दैवीय अथवा मानवीय आपदा का शिकार रहे होंगे। अब टूटी हुई शिलायें अतीत के बिखराव पर आँसू बहा रहीं हैं। यहाँ एक भारी भरकम ताम्रपत्र था, जिसे तत्कालीन जिला मुख्यालय अल्मोड़ा में मँगा लिया गया था। भूमिदान से सम्बन्धित था इस ताम्रपत्र की प्रतिलिपि मंदिर के पुजारी के पास है। यह इस प्रकार है:- ‘‘कल्याण हो। श्री षाके 1345 उत्तरायण में पौर्णमासी के दिन फल्गु नक्षत्र आषाढ़ के अन्त में इस पृथ्वी पर चूंड़ामणि की भाँति जिसके युगपद सुषोभित हैं, उसी राजा के द्वारा चम्पावती कुमञां में कुन्ज को भूमि दी गई । यह ब्राह्मण जो मायासेरी का उपभोग करता आ रहा है, वह प्रसन्न हो गया। राजा विक्रमचंद्र दान देने में कल्पवृक्ष की भाँति होवे। यह भूमि पूर्व में उदारमना राजा क्राचाचल्ल द्वारा दी गई थी। यह भूमि दुष्ट लोगों के उपद्रवों से न छीनी जाए, इसलिए इसका जीर्णोद्धार कर दिया गया इत्यादि। इसके साक्षी हैं, रूदु चौंकियाल, प्रभु बीष्ट, जनु महुणि इत्यादि।’’
देवीधूरा के उत्तरी ढाल पर रीठाखाल चाल्सी पट्टी का प्रमुख केन्द्र है। यहाँ से कुछ दूरी पर टीले में अद्भुत सौन्दर्य से भरपूर गर्ग आश्रम है जो गगरचूला कहलाता है। मान्यता है कि यहाँ पर ऋषि गर्ग ने तपस्या की थी। मंदिर में प्राचीन स्वयंभू शिवलिंग है। मान्यता है कि ऋषि गर्ग की तपस्या के फलस्वरूप सिद्धि प्राप्त होने से स्वयं भूलिंग प्रकट हुआ। यह लिंग शिव स्वरूप सिद्ध कहलाया। इस के पास ही ऐड़ी देव लिंग रूप में विद्यमान हैं। कालान्तर में गर्ग का अपभ्रंश गगर हो गया। काली कुमाऊँ में अन्यत्र की भांति यहाँ भी ब्यानधूरा से ऐड़ी आये हैं। मंदिर में काले बलुवा पत्थर की बनी कत्यूर शैली की गणेश, हरगौरी एवं शेषशायी विष्णु की मूर्तियाँ विद्यमान हैं। लिंग और मूर्तियों के काल में शताब्दियों का अन्तर प्रतीत होता है। ऐसा प्रतीत होता है कि ये मूर्तियाँ कहीं अन्य से लाकर यहाँ रखी गईं। कालान्तर में यहाँ पर ब्यानधूरा ऐड़ी की स्थापना भी कर दी गई, जिसकी पूजा काली कुमाऊँ में सिद्ध रूप में की जाती रही है। गगरचूला मंदिर की रेखदेख स्थानीय सहयोग से पुजारी चिन्तामणी भट्ट कर रहे हैं। अनेक निर्माण कार्य किये जा रहे हैं, लेकिन पानी की गंभीर समस्या है।
रीठाखाल के पीछे की ओर बनौली गाँव है। यहाँ पर एक सुन्दर नौला है। नौले के एक लेख में राजा कल्याणचन्द का उल्लेख है। लेख पूरा पढ़ा नहीं जा सकता। इसमें शाके सोलह सौ इक्यावन लिखा है। नौले में जलदेवी की मूर्ति स्थापित है, जिसके हाथ में शंख है, दूसरे हाथ से जलधारा प्रवाहित हो रही हैं। पास ही कुछ अन्य खण्डित मूर्तियों के अवशेष भी पड़े हैं। चाल्सी पट्टी में मण्टाडे गाँव काली कुमाऊँ के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यहाँ एक प्राचीन देवालय के आँेगन के चबूतरे में गरुड़ारूढ़ विष्णु, लक्ष्मी नारायण, गणेश, ब्रह्मा आदि देवताओं की अनेक खण्डित मूर्तियों के अवशेष रखे हैं, जो कत्यूरी वास्तु शिल्प के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
मूर्तियों और शिलालेखों के अतिरिक्त यहाँ की राग-भाग इतिहास को जानने के प्रमुख स्रोत हैं। इस इतिहास को खँगालने का एक प्रयास डॉ. राम सिंह ने किया, जिसे आने वाली पीढ़ियाँ याद रखेंगी। पिथैारागढ़ के साहसिक पथ अन्वेषक विश्वदेव पाण्डे ‘वासु’ एवं ‘रियल’ संस्था के राकेश जोशी, विजय राय आदि पाटी विकास खण्ड में धार्मिक पर्यटन को साहसिक पर्यटन के साथ जोड़कर पर्यटन के मानचित्र में स्थान दिलाने के प्रयास में मेहनत से जुटे हैं।

























rajendra ji; namskar; aap ne kumaou ke vishay me kafi bahtarin jankari uplabdh karai hai, utrakhand govt. ko aapni prachin dharohar ko shamhal kar rakhne hatu yojna banna chahiye. jaise chhatishgarh govt. ne MUKTAGN bnaya hai. shath shath SIRPUR ke BUDHKALIN puratatva Shamgri ko sheja hai. BHATT AK