सीमा सड़क संगठन राष्ट्रीय राजमार्ग 58 की लगभग चार किलोमीटर सड़क खा गया है। यह घटना जोशीमठ की है, जो लगभग 500 किलोमीटर लंबे दिल्ली-बदरीनाथ राजमार्ग पर स्थित है, बदरीनाथ से 40 किलोमीटर पहले। यहाँ यदि पूछिए कि राष्ट्रीय राजमार्ग कहाँ है तो कोई नहीं बता पायेगा। सीमा सड़क संगठन का जोशीमठ से पाँच किलोमीटर नीचे का मारवाड़ी क्षेत्र मुख्यालय भी नहीं!
चीन से 1962 के सरहदी झड़प के बाद जोशीमठ के ऊपर के डाडों गाँव के लोगों ने वहाँ एक भारतीय फौजी ब्रिगेड की स्थापना के लिए अपनी खेती की जमीनें दी थीं। तभी उन्होंने गाँव के नीचे अपने लिए दुकानें तथा एक बाजार अपनी ही भूमि पर बनाया। इसके बीच एक पतली सी सड़क पैदल खरीददारी करने वालों के लिए निकाली गई। यही तंग सड़क अब बदरीनाथ आने-जाने वाली बसों तथा अन्य गाड़ियों के लिए प्रयोग में लाई जा रही है। कहीं-कहीं पर यह इतनी पतली है कि इस पर दो गाड़ियाँ भी आर-पार नहीं जा पातीं।
सीमा सड़क संगठन को खुली सड़क बनाने के लिये भूमि दी गई थी। इस राजमार्ग, गुलाबकोटी से जोशीमठ तक की, सर्वे-पैमाइश 1945-50 के दौरान हुई। इसे तब उत्तर प्रदेश के सार्वजनिक निर्माण विभाग ने बनाना था। इस भूमि का गजेट नोटिफिकेशन 27 जून 1966 में हुआ और यह उत्तर प्रदेश सरकार के नाम से दर्ज की गई। इसका भुगतान 1966 में किया गया और हस्तांतरण सीमा सड़क संगठन को 1962-63 में किया गया। लेकिन यह राजमार्ग जहाँ बनना था, वहाँ नहीं बनाया गया। खरीदी भूमि को छोड़, उसे कुछ ऊपर, 1962-63 में, खीमानंद सती, टीसी. पी. बज़ार, जोशीमठ की 0.020 हेक्टर (एक नाली) भूमि, खेत संख्या 2035 से ले जाया गया। तबसे श्री सती अपनी भूमि वापस माँग रहे हैं, जो तरह-तरह के बहाने बनाकर उनको नहीं दी जा रही है।
आश्चर्य यह है कि राजमार्ग के लिए खरीदी इस भूमि के रिकॉर्ड गायब कर दिए गए और तब वह फिर कुछ प्रमुख व्यक्तियों को बेच दी गई। यह जमीन इस तरह दो बार बेची गई है। पहले उत्तर प्रदेश के सार्वजनिक निर्माण विभाग को बदरीनाथ जाने के लिए सड़क बनाने और फिर कुछ व्यक्तियों को, जिन्होंने उस पर अपने मकान बना लिए हैं। खरीदने के बाद सरकार ने उसे फिर कैसे बेच दिया ? यह सब सरकारी कागज़ातों में की गई जालसाजी के द्वारा हुआ है। साक्ष्य मिटाने उसके खाता-खतौनियों को भी राजस्व अभिलेखागार से गायब कर दिया गया है, ताकि पता न लग सके कि सरकार द्वारा खरीदी भूमि को उसने ही फिर कैसे बेच दिया।
दूसरा आश्चर्य यह है कि सीमा सड़क संगठन ने उसको सार्वजनिक निर्माण विभाग द्वारा राजमार्ग बनाने हस्तांतरित की गई भूमि में सड़क नहीं बनाई। राजमार्ग को शहर के आरंभ में पड़ने वाली चुंगी से लेकर थाने के चौराहे तक उतरते हुए जाना था। लेकिन उस पर निर्माण नहीं किया गया और पुरानी सड़क पर ही यातायात चलने दिया गया। थाना चौराहे से पुरानी सड़क जोशीमठ के निचले बाजार को जाती है। यह राजमार्ग का वह भाग है, जिसे छोड़ सीमा सड़क संगठन गाँव वालों के बनाए मार्ग का इस्तेमाल कर रहा है। वह इस नीचे जाने वाली सड़क, जो राजमार्ग का भाग है, का रखरखाव भी नहीं कर रहा है और वह अत्यंत दुर्दशा में है। साल भर से कुछ पूर्व एक बस जो उस पर खड़ी थी, उसके नीचे की दीवार पुरानी और कच्ची होने के कारण बैठ गई और पूरी बस नीचे गिर गई। गनीमत थी कि बस में सवारियाँ नहीं थीं।
जिनको यह भूमि दूसरी बार बेची गई, उनमें से एक ने उस पर बना अपना मकान कुछ वर्ष पहले किसी अन्य को होटल बानाने बेच दिया। खरीददार को जब उसपर राजमार्ग बनाने की पहली बिक्री के बारे में मालूम हुआ तो उसने 7.11.2003 को इस विषय पर चीफ जूडिशियल मजिस्ट्रेट की अदालत में मुकदमा दाखिल कर दिया। किन्तु बेचनेवाले अत्यंत प्रभावशाली व्यक्ति थे, इसलिए यह मुकदमा वापस ले लिया गया। इस बड़ी जालसाजी पर बहुत सारे प्रार्थना पत्र दिए गए हैं, सीमा सड़क संगठन से लेकर राज्य के मुख्यमंत्री तक को, लेकिन किसी ने भी जाँच नहीं करवाई कि यह भूमि दो बार कैसे बेची गई तथा कौन इसके लिए उत्तरदायी है ? जिन्होंने यह किया उनके विरुद्ध कार्रवाई होनी चाहिए थी, जो नहीं की गई है।
अब कहा जा रहा है कि एक नया बाइपास बनाया जाये, जो शहर से बाहर होता हुआ निकल जाये। उसे बनाने के लिये सीमा सड़क संगठन से बात की जा रही है। लेकिन यह काम भूमि की कमी के कारण आसान न होगा। तब तक जोशीमठ शहर में गाड़ियों का जाम लगा रहेगा और आने-जाने की कठिनाई बनी रहेगी।
























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