| एक बार फिर हम भिक्षा पात्र फैला कर आपके सामने आये हैं- इस बार लगभग आठ वर्ष बाद। इसे चमत्कार ही कहा जाना चाहिये कि आर्थिक दृष्टि से, शुरू से ही लड़खड़ाते हुए निकलने वाले नैनीताल समाचार के लिये ये पिछले आठ वर्ष कैसे बगैर झमेले के निकल गये ! लेकिन इस बार वास्तव में खतरा बहुत बड़ा है। इस झटके को हम नहीं झेल सके तो नैनीताल समाचार का अस्तित्व खत्म हो जायेगा। सबसे चिन्ताजनक बात यह है कि कहने को ढेर सारे नाम गिनाये जा सकते हैं, बहुत सारे लोग कहते भी हैं कि वे नैनीताल समाचार से ‘निकले हुए’ या ‘जुड़े हुए’ हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि अब हम एक-दो ही लोग नैनीताल समाचार को निकालने के लिये रह गये हैं और हम लोग भी समाचार के अलावा अनेक राजनैतिक-सामाजिक कामों में उलझे हुए हैं।
हमारे बहुत सारे पाठकों और उत्तराखंड के अनेक हितैषियों ने हमसे उम्मीदें पाली थीं कि राज्य बनने के बाद हम पाक्षिक से दैनिक बन कर पत्रकारिता में आ गये बड़े से शून्य को भर देंगे। उस दिशा में तो हम पूरी तरह निकम्मे साबित हुए ही, अब इस अखबार को किसी भी रूप में जिलाये रखने के ही लाले पड़ गये हैं। 1982 में, जब समाचार को छपते हुए पाँच वर्ष भी पूरे नहीं हुए थे, हमें एक बार लगा था कि हम अपनी आक्रामकता खोने लगे हैं। तब हमने अपने पाठकों से नैनीताल समाचार का प्रकाशन बन्द करने की अनुमति माँगी थी। लेकिन पाठकों ने हमें इतनी बुरी तरह से फटकारा कि हमें अपना इरादा बदलना पड़ा। अब परिस्थितियाँ उल्टी हैं। उम्र के साथ जो ढीलापन आने लगता है, उसका असर है कि एक ओर तो नैनीताल समाचार की वह शुरूआती आक्रामकता तिरोहित हो गई है और दूसरी ओर वह निस्संगता भी नहीं रही कि यदि नहीं निकाल पा रहे हैं तो दिल कड़ा कर के खुद ही बन्द कर डालो। जब आप कुछ करने के लायक रहे ही नहीं तो फिर क्यों चिपके रहना चाहते हो ? हमें मालूम भी नहीं कि व्यापक समाज में अब नैनीताल समाचार का क्या स्थान है। लोग नैनीताल समाचार के बारे में क्या सोचते हैं। क्या वे चाहते हैं कि वह निकले ? हमारे पास प्रतिक्रियायें बहुत कम आती हैं। छिटपुट रूप से कभी मिलने पर या कभी फोन पर कुछ लोग फटकारते अवश्य हैं और उत्साह भी बढ़ाते हैं कि हमें जुटे रहना चाहिये। उस वक्त क्षणिक रूप से ‘नैनीताल समाचार’ की उपयोगिता पर आस्था होती है। मगर नये चेहरे अब इस तरह के कामों की ओर फटकना भी नहीं चाहते। उन्हें ललचाने के लिये दुनिया में बहुत कुछ है। कुछ नये लोग नयी उमंग और नये विचारों के साथ जुड़ते तो हम शायद इस तरह मरणासन्न स्थिति में नहीं होते। इसीलिये हम आठ साल के बाद एक बार फिर आपकी शरण में आये हैं, आपसे मदद माँगने। यदि आपको लगता है कि नैनीताल समाचार को निकलना चाहिये तो तत्काल हमें सहारा दें। हम चाहते हैं कि आप हमें किसी भी तरह से 2000 रु. की मदद दें। यह मदद वार्षिक/आजीवन सदस्यता अथवा विज्ञापन के रूप में भी हो सकती है और महज दान-दक्षिणा के रूप में भी। थोड़ा पैसा जुटेगा तो हम कुछ समय तक के लिये निश्चिन्त हो जायेंगे और हो सकता है कि इस बीच इसका प्रकाशन ठीकठाक करने के लिये कोई रास्ता निकल ही आये। लेकिन यह मदद करना या न करना आपके ऊपर है। हम कोई दबाव नहीं डाल सकते। दबाव इस बात के लिये अवश्य डालना चाहते हैं कि पत्र जरूर लिखें, लिखते रहा करें। आपकी चुप्पी सब से ज्यादा खतरनाक है। हाँ, इस अंक से हम ‘नैनीताल समाचार’ का सदस्यता शुल्क भी बढ़ा रहे हैं। अब इसका सदस्यता शुल्क 100 रु. वार्षिक तथा 1,000 रु. आजीवन होगा। 14 वर्ष बाद यह बढ़ोतरी करने के लिये आप हमें क्षमा करेंगे। |


























Back home I had noticed some imortant permanant columns in your printed editions, but I find these missing in the internet editions. I think ” Tithi Tyar” and “Kitaabon ki smeeksa” are of no less importance that you choose to neglect them.
yours,
Ek Hiteishi