5,92,971 किमी. भौगोलिक क्षेत्र में फैले 11 हिमालयी राज्यों की कुल जनसंख्या 6,36,62,309 है। इनमें 3,28,64,983 महिलाएँ और 3,07,97,326 पुरुष हैं। ये 20 नदियों का उद्गम स्थल है। यहाँ हजारों किलोमीटर में हिम ग्लेशियर फैले हैं और पानी का अपार भंडार मौजूद है। 100 से अधिक जीव-जन्तुओं की प्रजातियाँ और अथाह प्राकृतिक संसाधन मौजूद हैं। यह हिमालय आज संकट में है। विकास के नाम पर यहाँ जमकर लूट-खसोट चल रही है। यहाँ की सरकारें यहाँ के उपलब्ध संसाधनों को निजी हाथों में सौंप रही हैं। हिमालयी राज्यों में विकास सुविधा के नाम पर समस्या पैदा कर रहा है। यहाँ बनने वाली परियोजनाओं से बड़े स्तर पर विस्थापन हो रहा है। लोग अपनी जमीनों से अलग किए जा रहे हैं। पुनर्वास का महत्वपूर्ण सवाल उठ खड़ा हुआ है। संसद में हिमालय का प्रतिनिधित्व कमजोर है। लोकसभा में इन ग्यारह हिमालयी राज्यों का प्रतिनिधित्व कुल 40 है। उत्तराखंड से 5, जम्मू कश्मीर से 6, हिमाचल प्रदेश से 4, सिक्किम से 1, मेघालय से 2, असम से 14, त्रिपुरा से 2, मिजोरम से 1, मणिपुर से 2, नागालैंड से 1 और अरुणाचल प्रदेश से 2 सांसद निर्वाचित होते हैं। इनकी आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज ही साबित होती रही है। यहाँ की नीतियाँ संवेदनशील भौगोलिक स्थितियों के अनुकूल नहीं बन पा रही हैं। हिमालयी क्षेत्रों में बसे गाँव आबादीविहीन हो रहे हैं। रोजगार, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात व परिवहन जैसे मुद्दों पर लोग संघर्षरत हैं। विकास, खनन, रिजोर्ट के नाम पर जमीनों की सौदेबाजी हो रही है। जल, जंगल, जमीन पर रसूख वाले पाँव फैला रहे हैं। गाड़-गधेरे तक लीज पर दे दिये गये हैं। हिमालय के मूल निवासी का ललचा कर चंद रुपयों में जमीन बेचने को विवश कर दिया गया है।
हिमालय की तस्वीर कुछ यूँ बन रही है कि जहाँ परम्परागत गाँव और आबादियाँ हैं, वहाँ तो बुनियादी सुविधाओं का अकाल है तो दूसरी और जहाँ रिजार्ट व होटल बन रहे हैं वह सुविधाओं से लैस हैं, जबकि इन सुविधाओं का आम आदमी की जिंदगी से कोई लेना-देना नहीं होता। हिमालय में खड़िया, रेता, पत्थर बेचना रोजगार का मुख्य साधन बन रहा है। यहाँ का युवा इन धंधों में या फिर शराब-जुए आदि में धकेला जा रहा है। ऐसे व्यवसाय करने वालों की एक फौज ही खड़ी हो गई है। एक तरह से हिमालय में जनविरोधी विकास हो रहा है। लेकिन इन सब अनिश्चितताओं के बीच भी हिमालयी राज्यों से जुड़े चिंतक जिस तरह से एक मंच में आकर खड़े हुए हैं, उससे आशा बँधती है कि हिमालय को दरकने से शायद बचाया जा सके।
सामाजिक कार्यकर्ता सुरेश भाई कहते हैं, ‘‘सरकारें हिमालय का दोहन तो आक्रामक रूप से कर रही हैं, लेकिन यहाँ जल, जंगल, जमीन के वैज्ञानिक प्रबन्धन की नीति बनाने में वह नाकाम रही है। बाँध बन रहे हैं लेकिन विस्थापन का प्रबन्ध नहीं है। सड़कें काटने के लिये विस्फोट हो रहे हैं। जंगल कट रहे हैं लेकिन आवास, जल प्रबन्ध, बाढ़ नियंत्रण, आपदा राहत, कृषि, पशुपालन, पलायन, बेरोजगारी इत्यादि पर सरकारों का ध्यान नहीं है।’’ सुन्दर लाल बहुगुणा का मानना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में राज्य शक्ति का आधार जनता की शक्ति है। सरकारें सब कुछ नहीं हैं। हमें लोगों की इच्छाशक्ति को प्रकट करने के लिये आयोजन करने होंगे। पद्मश्री डॉ. अनिल जोशी कहते हैं कि पिछले 100 वर्षो में हिमालय में आये परिवर्तन, हमने क्या खोया और क्या पाया, यहाँ मानव संसाधन की हालत क्या है, इसका कोई स्पष्ट चित्र राज्यों के पास नहीं है।
मगर विकास की विडम्बना झेल रहे इन हिमालयी राज्यों के पास गर्व करने के लिये भी कुछ है। साक्षरता की दृष्टि से इन्होंने अच्छी प्रगति की है और लिंगानुपात बचाये रखा है। साक्ष्रता दर उत्तराखंड में 72.28, जम्मू कश्मीर में 54.46, हिमाचल प्रदेश में 75.91 सिक्किम में 69.68, मेघालय में 63.31, असम में 60.68, त्रिपुरा में 73.66, मिजोरम में 88.49, मणिपुर में 68.87, नागालैंड में 67.11 और अरुणाचल प्रदेश में 64.74 प्रतिशत है। लिंग अनुपात जम्मू व कश्मीर में 900, हिमाचल प्रदेश में 970, सिक्किम में 875, मेघालय में 975, असम में 915, त्रिपुरा में 950, मिजोरम में 938, मणिपुर में 978, नागालैंड में 909 व अरुणाचल प्रदेश में 901 होने से इन हिमालयी राज्यों की स्थिति ठीक कही जा सकती है।
yeh bilkul satya hai ki bahari log yeha aakar resort ke nam par bade dhadle ke sath jamin kharid rahe hain. yedi ish atikarman ko nahin roka gaya to ek din samast himalayi region main inhi logo ka raj ho jayega