25 मार्च की तिथि आती है तो उत्तराखंड के पत्रकार, रचनाधर्मी किसी एक स्थान पर एकत्र होकर पत्रकार उमेश डोभाल के नाम पर नारा लगाना नहीं भूलते कि ‘उमेश डोभाल एक व्यक्ति नहीं, एक धारा थी एक धारा है’। अब से बीस वर्ष पूर्व इसी पच्चीस मार्च को पौड़ी का पत्रकार उमेश डोभाल जन सरोकारों की पत्रकारिता करता हुआ जनपक्ष के मोर्चे पर शराब हत्याओं के हाथ मर कर शहीद हुआ था। तब से लेकर अब तक उमेश डोभाल की शहादत को लेकर उमेश की विरासत को मानने वाले हर साल एक बार मिलते तो हैं, लेकिन क्या उमेश डोभाल एक नारे तक तो सीमित नहीं रह गया है ?
उमेश के न रहने के इन दो दशकों में पर्वतीय पत्रकारिता में क्या परिवर्तन हुए हैं, यह उनके समकालीन भलीभाँति समझते हैं। जनपक्षीय पत्रकारिता अब बहुत कमजोर हो गई है, यह किसी से छुपा नहीं है। उस दौर में शराब माफिया ने उमेश का कत्ल कर उसकी कलम बन्द की थी तो नवोदित उत्तराखंड में माफियाओं के कई स्वरूप और संस्करण हैं, जो कमाऊ कलमघिस्सुओं की कलम को जकड़ देते हैं। 25 मार्च 1988 को तो उमेश के मरने के बाद पत्रकारिता नये रूप में जीवित हुई थी, लेकिन अब तो जीवन्त पत्रकारिता भी रोज-रोज मर रही है।
बीते वर्ष जब रामनगर में उमेश डोभाल स्मृति समारोह मनाया जा रहा था तो बागेश्वर से आये वरिष्ठ पत्रकार रमेश पाण्डे ‘कृषक’ ने कहा कि, ‘‘मेरे एक दोस्त का लड़का तीन मर्तबा हाईस्कूल में फेल हो गया तो उन्होंने मुझ से कहा कि यह लड़का हाईस्कूल पास करने से तो रहा। क्यों न तुम इसे पत्रकारिता में लगा दो ?’’ ऐसा ही वक्तव्य 12 दिसम्बर को कोटद्वार में विधान सभा में नेता प्रतिपक्ष हरक सिंह रावत का था। कांग्रेस पार्टी के सम्मेलन में उन्होंने कटाक्ष किया, ‘‘मुख्यमंत्री तथा उनकी सरकार की सुन्दर छवि व जनता की नजरों के बीच अब बस मीडिया ही पर्दा बना हुआ है।’’ रावत की यह टिप्पणी बेशक राजनीति से प्रेरित और अपनी खीझ निकालने वाली है, मगर आज की पत्रकारिता पर सटीक टिप्पणी करती है।
परिवर्तनशील समय के साथ पत्रकारिता का रूप बदलना भी अवश्यम्भावी है, लेकिन भूमंडलीकरण के दौर में उसका स्वरूप नकारात्मक हो जाये, यह तो स्वीकार नहीं किया जा सकता। आज उत्तराखंड की राजनीति में बहुत कम लोगों का कलेजा होगा कि जनता की बात करने के लिये सत्ताधारियों की नाराजगी मोल ले सकें। कुछ वर्ष पूर्व नैनीताल में सुप्रसिद्ध पत्रकार प्रभाष जोशी ने उमेश डोभाल समारोह के दौरान पत्रकारिता के बारे में जो कुछ कहा था, वह एक निहायत कटु सत्य है। उन्होंने कहा था, ‘‘आज जो दब रही है, वही खबर है।’’ मंत्री व अफसरों से दोस्ती आज की पत्रकारिता की सबसे बड़ी कमजोरी है। जबकि उमेश डोभाल कभी भी प्रेस विज्ञप्तियों के आधार पर अथवा नेताओं की बात सुन कर खबर नहीं बनाता था।
पहाड़ में कहावत है कि ‘आलू व डोटियाल (नेपाली मजदूर) हर जगह मिल जाते हैं’। लेकिन इतने महत्वपूर्ण होने पर भी लोग इनकी कद्र कम करते हैं। अब इनके साथ एक नाम और जुड़ गया है। वह है पत्रकार का, जो हर धार- खाल, कस्बे- बाजार में मिल जाते हैं। लेकिन इस पत्रकारिता का स्तर कैसा है, इसे सब जानते हैं। उमेश डोभाल को याद करते हुए पत्रकारिता के इस स्वरूप पर गंभीर चर्चा होनी चाहिये।

























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