आपका सम्मानित पाक्षिक (15-30 अप्रैल 2010) का अंक मुझे कुछ साथियों ने उपलब्ध कराया। आपकी ओर से अक्सर मुझे यह समाचारपत्र मिल जाता था, पर इस बार जानबूझकर, या अनजाने यह महत्वपूर्ण अंक मुझे डाक से अब तक नहीं मिला।
आप जानते होंगे कि पिछले कुछ वर्षो से आपसे तथा आपके अखबार से मेरा कोई खास सम्बन्ध नहीं है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि आपके साथ बिताये गये समय ने मुझे इस निष्कर्ष पर पहुंचने को बाध्य किया कि आप उतना ही लोकतन्त्र बरदाश्त कर पाते हैं, जहाँ तक आप की तारीफ हो। आप संगठन में गुटबाजी करने तथा कमजोर नेता को वश में कर अपनी मनमानी करने के आदी रहे हैं। अगर मैं यह कहूँ कि अपनी इन हरकतों से उत्तराखण्ड लोक वाहिनी को पथभ्रष्ट करने और डुबाने में आपने प्रमुख भूमिका निभाई तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है। इसलिए मेरा मानना है जिन्हें किसी भी रूप में समाज का काम करना है, उन्हें आगे बढ़ने के लिए आपसे दूरी बनाकर चलना चाहिए। मैं ही नहीं वरन सभी समझदार साथी इस बात को समझते हैं कि आप दो-तीन महानुभावों के कॉकस में तू मेरी तारीफ कर, मैं तेरी तारीफ करुँगा की होड़ रहती है। और बात चाहे संघर्ष की हो, पत्रकारिता की या संस्कृति की, दिन-रात मरने-खपने वाले साथियों के काम से भी अपना नाम चमकाने में आपको महारथ हासिल हो चुकी है। यदा-कदा जब कभी आपके इस व्यवहार को चुनौती मिली तो आप लोगों ने हर किसी को अपने शातिर अंदाज में निपटाने की भरपूर कोशिश की है।
इसमें कोई शक नहीं है कि एक व्यवसायी परिवार में जन्म लेने तथा उसमें पल़ने-बढ़ने के दौर में आपने अपने हित-लाभ सुरक्षित करना अच्छी तरह सीखा। आपकी पत्रकारिता भी इसका अपवाद नही है। पिछले अनेक वर्षो से आप दिन-रात यह रोना रो रहे हैं कि ’’सहकारिता के आधार पर उत्तराखण्ड का पाक्षिक’’ जन सहयोग एवं आर्थिक दिक्कतों के चलते कभी भी बंद हो सकता है। आपने इस दर्दनाक अपील से काफी कुछ प्राप्त भी किया है। मित्रवर बहुत अच्छे, ऊंचे संपर्कों, अच्छी आर्थिक पृष्ठभूमि के बावजूद आपने ‘नैनीताल समाचार‘ को चलाने की जिम्मेदारी होशियारी से ’’सहकारिता’’ के हवाले कर दी है और संपादक के रूप में हर प्रकार का श्रेय लेने का महान उत्तरदायित्व अपने ऊपर ले लिया है। एक ऐसे दौर में जब प्रतिबद्ध लोग अभावों से जूझते हुए अपने साधनों से पत्र-पत्रिकायें प्रकाशित कर रहे हैं, तब अपने दायित्व दूसरों पर सफलतापूर्वक डाल पाने के आपके हुनर को मैं सलाम करता हूँ।
यहाँ मैं यह अवश्य कहना चाहता हूँ कि न्यायपालिका पर भी कलम चलाने का साहस दिखाने वाले आप, अपने समाचार पत्र में नैनीताल के होटल मालिकों के शोषण, पर्यटकों को ठगने, उनसे जमकर वसूली करने की रोज बरोज होती घटनाओं और इन्हीं होटलों में मजबूरी और अभाव से खटने के लिए मजबूर साधारण कर्मचारी की ओर दृष्टिपात नही कर पाते। साहजी आप इस मामले में कुछ कह पायें या न कह पाए हम आपकी मजबूरी को समझते हैं और हमें आपकी इस मजबूरी से सहानुभूति भी है। कम से कम आप हमारी तरह मूर्ख तो नहीं हैं जो असहमत होने पर घर परिवार के लोगों से भी वैसी ही महाभारत कर बैठते हैं जैसा कि बाहर के लोगों से। आपके इस कौशल पर निश्चय ही कुमाऊं विश्वविद्यालय को कुछ शोधपत्र प्रकाशित कराने चाहिए।
राजीवदा अब मैं थोड़ा मुद्दे की बात पर आता हूँ जिसके कारण आपके प्रति तटस्थ भाव को छोड़कर मुझे यह खत लिखने को मजबूर होना पड़ा है। आपने अपेल 2010 के द्वितीय अंक में अपने नाम से पेज 3 पर अल्मोड़ा ……लाजवाब लिखा है। इस लेख में अल्मोडा़ नगर और उसके कुछ सरोकारों के लिए आपने वर्षों से चली आ रही अपनी कुंठाओं को जहाँ सार्वजनिक किया है वहीं कुछ आड़े-तिरछे व्यंग्य बाणों से अपने बौद्धिक अहंकार को भी प्रदर्शित किया है।
साहजी इस लेख को कम से कम दो बार पढ़ने के बाद भी मेरी समझ में यह नहीं आ पाया कि आखिर आप कहना क्या चाहते हैं? आपने लिखा है कि 1984 में यहाँ (नगर) से उठे नशा नहीं रोजगार आंदोलन ने पूरे देश में अपनी धमक पहुँचायी थी।) जबकि मेरे जैसे लोग समझते हैं कि इस आन्दोलन का प्रारम्भ बसभीड़ा (चौखुटिया) जैसे गांवों की पीड़ा से हुआ था। इस आंदोलन का श्रेय लेने में आप और आपके ’’वरिष्ठ आंदोलनकारी साथी कभी पीछे नहीं रहे’’ पर आपने कुटिल व्यंग्य से मेरे ऊपर यह झूठा आरोप मढ़ दिया कि ’’इस बार शराब माफिया की ओर पीठ फेरे खड़े थे।’’ आपकी बातों से साफ लगता है कि आप लड़ाई लड़ने के लिए नहीं वरन मात्र श्रेय लेने के लिए पैदा हुए हैं। वरना इतना बड़े सामाजिक राजनीतिक मुद्दे पर आप मेरा ठेका होने जैसी बात नहीं करते।
राजीव दा मेरी ओर इशारा करते हुए आपने लिखा है कि अब भी यहाँ उस दौरे के एक वरिष्ठ आंदोलनकारी हैं जो शराब माफिया को लेकर अपने कड़े रुख के कारण पूरे उत्तराखंड में विख्यात हैं। शराब माफिया पर उनके हमले लगातार जारी रहते हैं। और खिझा हुआ शराब माफिया भी जब-तब उनके खिलाफ गुमनाम रूप से चटपटे पर्चे बाँटता रहता है। इस बार वो शराब माफिया के खिलाफ पीठ फेरे खड़े बैठे थे और अपने एक पुराने आंदोलनकारी साथी के खिलाफ पर्चे बांट रहे थे कि वे सांप्रदायिक मंचों पर जाकर भाषण दे रहे हैं। और इस प्रकार देश की साम्प्रदायिक एकता के लिए बहुत बडा़ खतरा बन गये हैं। उनके ईमेल अटलांटिक महासागर पारकर पृथ्वी ग्रह के दसरे सिरे तक पहुँच रहे थे। इधर शराब माफिया अपना खेल खेल रहा था। उक्त अनरगल बातें लिखकर आपने मुझ पर बडा़ उपकार किया है। पहली बात मैं स्पष्ट कर दूं कि हम एक शराब माफिया की नहीं वरन सभी शराब माफियाओं की बात करते हैं सोचने की बात यह है कि जब हम नशे के सवाल को व्यापक संर्दभों में उठाते हैं तक आप लोग शराब माफियाओं की तर्ज पर इस लडाई को सुनियोजित रूप से व्यक्तिगत लड़ाई बताने की कोशिशा में लग जाते हैं। इसलिए आपको आपके शब्दों में खीझा हुआ कथित शराब माफिया पर गुस्सा नहीं आता, वरन उससे सहानुभूति होती है। और उसके द्वारा निकाले गये अनर्गल बेनामी पर्चे आपको चटपटे लगते हैं। मुझे लगता है कि अपनी इस सांस्कृतिक चेतना व पक्षधरता के लिए शराब माफियाओं को आपको
अवश्य सम्मानित करना चाहिए। इसके बावजूद मैं इतना जरूर कहना चाहूँगा कि जो भी असामाजिक तत्व गुंडें व माफिया आम जनता व आन्दोलनकारियों के साथ चोरी और फिर सीनाजोरी की कोशिश करेगा उसे सबक सिखाने में हम कभी न पहले पीछे थे न आगे पीछे रहेंगे। भले इसके लिए हमें अपना सर्वस्व ही क्यों न दाव में लगाना पड़े मैं मानता हूँ कि इससे कम तेवरों में हम लोगों में से किसी को भी खुद को आंदोलनकारी कहलाने का हक नही है।
साहजी अपने लेख के दूसरे हिस्से में आपने एक महाझूठ को सच की तरह पेश कर मुख्य सवाल से ध्यान बंटाने की कोशिश की है। मुझे आश्चर्य है कि स्वतंत्र व निष्पक्ष पत्रकारिता के आप जैसे धुरन्धर ने नैनीताल समाचार में इस सूचना को स्थान क्यों नहीं दिया ? पर अल्मोड़ा में आने वाले सभी प्रमुख अखबारों में 21 मार्च को फोटो सहित खबर लगी थी कि 20 मार्च को आपके खास कथित पुराने आंदोलनकारी विश्व हिंदू परिषद द्वारा आयोजित एकल शिक्षक अभियान के कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए और उन्होंने इस अभियान की जमकर तारीफ की।
मित्रवर! अनेक मामलों में गंभीर वैचारिक, रणनीतिक मतभेद होने के बावजूद इस खबर पर सहसा विश्वास करना हमारे लिए भी कठिन था। पर यह कड़वी सच्चाई थी जिसका खंडन करना आपके बूते की बात नहीं है। मैने इन समाचारपत्रों की कतरनों को पौड़ी में आयोजित उमेश डोभाल स्मृति समारोह में उपस्थित साथियों को दिखाया और उत्तराखण्ड व देश के कुछ अन्य साथियों, पत्रकारों को भी इसकी प्रमाण सहित जानकारी दी। मेरे जैसे व्यक्ति की दृष्टि में यह घटना एक आन्दोलनकारी के वैचारिक पतन की पराकाष्ठा है। मेरा मानना है कि इस तरह की घटनाओं से एक व्यक्ति नहीं आन्दोलन की पूरी एक धारा भी कलंकित होती है। यदि अपने लोगों को इस सूचना को देना गलती माना जाता है तो इस गलती को बार-बार दोहराने में मुझे आपत्ति नहीं होगी। पर आपने इस खबर में पर्चे बाँटने जैसे जिस सफेद झूठ का कथन किया है, क्या आप इसे साबित कर सकते हैं ? मुझे आश्चर्य है कि ऐसा निराधार व झूठा प्रचार आप कथित ’’सहकारिता के आधार पर निकाले जा रहे पाक्षिक’’ से क्यों कर रहे हैं? क्या सहकारिता में शामिल आपके सभी साथी आपके इस लेखन से सहमत हैं।
इसके आगे आपने पत्रकारों को आबकारी विभाग से कथित दावत, उसके किस्से, कहानियों का बखान कर इस गंभीर मामले को हंसी में उड़ाने की कोशिश की। यहाँ पर आपने चालाकी से यह जताने की कोशिश की है कि बाकी पश्चातवती घटनाएं जैसे मेरी प्रत्यक्ष व परोक्ष सहमति से घटित हुई हों जबकि इस घटनाक्रम में मैं किसी जगह उपस्थित भी नहीं था। कृपया बताएं आप जैसा बुद्धिजीवी ऐसा क्यों करता है ? जहाँ तक पत्रकारों को शराब पिलाने की बात है, आप खुद जानते हैं कि उमेश डोभाल स्मृति समारोह जैसे आयोजनो में भी आप जैसे महारथी जो नशा नहीं रोजगार दो आंदोलनों का श्रेय लेने की भी भरपूर कोशिश करते हैं, खुलेआम शराब पीते व पिलाते हैं, तब दूसरों पर टिप्पणी करने का आपका क्या अधिकार है ? रही बात कोई सूचना का अधिकार के तहत पूछे तो स्पष्ट हो जाय, तो यह अधिकार आपको तथा आपके वरिष्ठ पुराने आंदोलनकारी को भी प्राप्त है। आप स्वयं यह काम क्यों नहीं करना चाहते ? आपके लेख में उक्त दावत में एक एस.डी.एम. की टिप्पणी कि रिसोर्ट ही अवैध है भी बहुत मजेदार है।
राजीव दा मैंने सुना है कि नैनीताल में जहाँ आपके होटल चलते रहे हैं वह जगह पूर्व में आपके परिवार को एक अन्य स्थान छोड़ने के एवज में गैर व्यावसायिक उपयोग के लिए मिली थी। पर आप लोगों ने पहली जमीन को तो छोड़ा नहीं और दूसरी जमीन का व्यावसायिक उपयोग शुरू कर दिया। मित्रवर! सच्चाई क्या है, इसे आप बेहतर जानते होंगे पर मैने सुना है कि इस मामले की फाइल भी नैनीताल नगरपालिका कार्यालय से आपके कुछ हमदर्दों ने गायब करवा दी है। तब आप अपने व्यवसाय को कितना वैध कहेंगे इस पर आपको स्वयं विचार करना चाहिए। ![]()
मित्रवर! आपको शायद मालूम न हो पर सभी आंदोलनकारी शक्तियाँ जानती हैं कि हम शराब, राजस्व, सियासत के रिश्तों को बेनकाब करने के लिए अभियान चलाये हुए हैं। इसलिए हमने इस समस्या की ओर आपकी तरह पीठ नहीं फेरी है। न आपके व आपके मित्रों की तरह शराब के धंधेबाजों को किसी भी रूप में अपने कार्यक्रमों में बुलाने का पाप किया है। आपका यह लिखना भी सफेद झूठ है कि बसौली में चलने वाले शराब विरोधी आंदोलनों को पत्रकार का सहयोग नहीं मिल पा रहा है।
साहजी कहने को तो बहुत है पर मै जानता हूँ कि आप मुझसे इसलिए नाराज हैं कि वर्षों पहले प्रशासनिक अकादमी नैनीताल में झुसिंया दमाई के नाम पर आयोजित एक कार्यक्रम में हुए फर्जीवाड़े को मैं डॉ. आर. एस. टोलिया के संज्ञान में ले आया था। उत्तराखण्ड लोक वाहिनी के साथ आप लोगों द्वारा एक बड़े एनजीओ के संचालक रवि चोपड़ा से किये गये घालमेल और उमेश डोभाल स्मृति समारोह न्यास में आप लोगों के अलोकतांत्रिक रवैये पर टिप्पणी करने पर भी आप मुझसे खुश नहीं हैं। पर मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। बहुत सी और भी बातें हैं पर इस समय पत्र लंबा नहीं करना चाहता।
इस पत्र को मैं केवल आपको भेजना चाहता था। पर मुझे लगता है कि आप इसको अपने समाचार पत्र में प्रकाशित करने का साहस नहीं करेंगे। इसलिए इस पत्र को कुछ अन्य साथियों को भेज रहा हूं ताकि यदि वे चाहें तो इस पर आंदोलनकारीयों व समाज के बीच में खुली चर्चा हो सके। आशा है आप कुशल होंगे।
पी.सी. तिवारी
धारानौला, अल्मोड़ा
नैनीताल समाचार का ताजा अंक 15 से 30 अप्रेल 2010 मिला और आदत्न एक साथ पूरा समाचार पत्र पढ़ गया। सम्पादक जी द्वारा लिखे गये ‘अल्मोड़ा लाजवाब !’ को पढ़ कर लिखने का मन किया। मुझे लगा कि यह लेख सम्पादकजी ने स्वस्थ मानसिकता के साथ नहीं लिखा। मार्च में हमेशा ही शराब निलामी होती रही है तथा नैनीताल और अल्मोड़ा में अभी हाल के वर्षों तक विरोध होता रहा है चाहे प्रतीकात्मक ही सही। सम्पादक जी की यह टिप्पणी कि ‘इस बार वे शराब माफिया की ओर पीठ फेरे खड़े थे…’ इंगित करता है कि जैसे वे शराब विरोधी आंदोलन के एकमात्र ठेकेदार हों – शराब विरोधी आन्दोलन में तो कई नामी-ग्रामी लोग थे। उन्हीं पर यह टिप्पणी क्यों ? समझ से परे है। शराब माफिया द्वारा बाँटे गये पर्चों की चर्चा करते हुए आपने लिखा है कि ‘जब जब उनके खिलाफ गुमनाम रूप से चटपटे पर्चे बांटे जाते रहे हैं।’ माने कि वे पर्चे आपको बेहद चटपटे लगे और आपको आनंद की अनुभूति हुई – यहाँ पर कहना चाहूँगा कि आप भी सदैव संघर्षों में रहे हैं और बढ़-चढ़ कर भागेदारी करते रहे हैं – क्या इस तरह किसी सक्रिय आंदोलनकारी का उपहास उड़ाना आपको शोभा देता है। आपने यह भी लिखा है कि ‘एक पुराने आन्दोलनकारी साथी के खिलाफ पर्चे बाँट रहे थे’ – आपके पास भी वह पर्चा मौजूद होगा उस पर्चे का मजमून क्या है ? कहाँ प्रकाशित हुआ है ?
अन्त में एक बात और कहना चाहता हूँ कि पुराने साथी जो साम्प्रदायिक मंच पर गये उनके बारे में तो आपने एक पंक्ति भी नहीं लिखी क्यों ? यह भेद क्यों किया आपने। जहाँ तक समझ पा रहा हूँ आप………के केन्द्रीय पदाधिकारी/सक्रिय सदस्य हैं……तभी न ?
दो वरिष्ठ सक्रिय आन्दोलनकारियों के विवादों को तूल देना और बहस-मुबाहस करना समाचार का काम नहीं ही होना चाहिये। किसी भी सक्रिय आन्दोलनकारी पर फूहड़ टिप्पणी करना समाचार की गंभीरता को समाप्त करना है। नैनीताल समाचार की एक-एक पंक्ति और एक-एक कॉलम की कीमत है – पाठक गंभीरता से पढ़ता है। आप क्या लिख-छाप रहे हैं। क्या संदेश भेज रहे हैं, पाठक समझता है। शेष फिर कभी। पुनश्च: अधिक कड़ुवा लिखा गया तो क्षमा चाहूँगा।
सतीश जोशी
तुलसी नगर, हल्द्वानी
यह सब देखकर मन क्षुब्ध हो गया. आखिर इस शीतयुद्ध को जारी रखने का क्या नतीजा निकलेगा? करबद्ध निवेदन है कि पुन: एकजुट होकर जनमुद्दों को सामने लाने का और जनता को कुशल नेतृत्व देने का प्रयास करें, जिसकी इस समय सख्त जरूरत महसूस हो रही है.