रमा पाण्डे
‘‘गणतंत्र अपने बच्चों को मारने की इजाजत नहीं देता।’’ सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय मेरे लिए एक उम्मीद की किरण की तरह है। मैं अपने बेटे के हत्यारों को फाँसी के फंदे पर लटका हुआ देखना चाहती हूँ। उन अनेक लोगों के लिए यह फैसला थोड़ा अजीब होगा, जो अब तक केवल एक ही पक्ष सुन रहे थे। इससे उन लोगों को भी धक्का लगेगा, जो पुलिस की बताई कहानी लिखते हैं और छापते हैं। मगर इस बयान के बाद मेरे बेटे की शहादत के मायने मजबूत होते नजर आते हैं। उसकी मौत से ही सही, एक सवाल तो खड़ा हुआ है। इसका जवाब केन्द्र सरकार को छह सप्ताह के भीतर देना ही पडे़गा।
जवाब कुछ भी हो, पर मुझे यकीन है कि मेरा बेटा हथियार नहीं उठा सकता। पैदा होने के बाद से 1 जुलाई 10 को हैदराबाद के आदिलाबाद में एक फर्जी मुठभेड़ मे उसके मारे जाने के बीच मुझे कोई ऐसा वाकया याद नहीं आता, जिसमें वह कभी हिंसक दिखा हो। बेहद जिम्मेदार था मेरा बेटा। सामान्यतः हर बच्चे पर उसके माता-पिता का प्रभाव पड़ता है, लेकिन मेरे बेटे ने हमें प्रभावित किया था। कुछ बातों में मेरा जरूर उससे विरोध था, इसके बावजूद वह अपना धर्म पूरी तरह निभाता था। समाज से जुड़े रहने की उसकी चाह ही थी कि घोर नास्तिक होते हुए भी वह पूजापाठ जैसे कार्यक्रमों में भाग लेता था।
वह बचपन से ही होशियार था। कई काम एक साथ करने की उसे आदत थी। कक्षा नौ में रहा होगा, जब हम रामपुर में रहते थे और हमारा परिवार आर्थिक तंगी से गुजर रहा था। उसने अपने लिए लॉटरी के टिकटों पर मोहर लगाने का काम खोज लिया था। छोटी सी उम्र में उसकी कमाई से परिवार को बड़ा सहारा मिला था। एक साबुन फैक्ट्री में भी उसने काम किया। उसकी योग्यता को देखकर फैक्ट्री स्वामी उसे गोद लेने की बात कहने लगे थे। काश मैंने इन्कार न किया होता तो शायद आज मेरा बेटा मेरे पास होता!
इसके बाद हम अपने गाँव देवलथल चले आए थे। यहाँ भी संसाधनों का अभाव था। पर पहाड़ तो पहाड़ है। जीवन किसी तरह चल रहा था। इन बदलावों और अभावों को मैं तो जी रही थी, लेकिन वह इन अभावों के कारण खोजने लगा था। यही वह दौर था, कक्षा 11 या 12 में वह रहा होगा, जब उसने कोर्स से बाहर की किताबें भी पढ़नी शुरू कर दी थीं। सामान्यतः युवा अपना कोर्स तक पूरा नहीं कर पाते। इसी बीच उसने नियमित पूजा-पाठ करना भी छोड़ दिया, लेकिन मैं संतुष्ट थी क्योंकि मेरा बेटा आज के आम युवाओं से बिलकुल अलग था। जिस दौर में युवाओं को अपने कैरियर की चिंता सताती है वह उस दौर में सताये हुए गरीब लोगों की चिंता करने लगा था। मुझे अच्छी तरह याद है कि गाँव में अवैध खड़िया खनन के खिलाफ पहली बार उसी ने आवाज उठाई थी। उसके पापा बहुत नाराज हुए थे, लेकिन वह कभी नहीं डिगा। इस खनन में ठेकेदार गरीब दलितों की जमीन कौड़ियों के भाव खरीदते हैं और खोदकर छोड़ देते हैं।
बी.ए. करने के लिए वह पिथौरागढ़ चला गया। पहली बार वह परिवार से दूर गया था। इसके बाद वह जब भी घर आया, हर बार सयाना लगता गया। उसका अध्ययन लगातार बढ़ रहा था। अब उसके पास हर अवैज्ञानिक बात के खिलाफ तर्क थे। घर की परिस्थितियों की चर्चा करते हुए मैंने कई बार उसे नौकरी के लिए कहा, लेकिन उसने सरकारी नौकरी के लिए कभी आवेदन नहीं किया। हाँ, इसके बाद उसने घर से खर्च के लिए मिलने वाली राशि लेना कम कर दिया। स्कूली बच्चों को पढ़ाकर अपना खर्च चलाने लगा। अब पिथौरागढ़ में होने वाले छात्र आंदोलनों से लेकर जन आँदोलनों तक का वह भागीदार बन गया था। पहली बार इसका पता मुझे तब चला, जब हमने अखबार में उसका फोटो देखा। इस बार भी उसके पापा बहुत नाराज हुए थे। लेकिन मैं इस बार भी खुश थी। उसकी लड़ाई लगातार तेज हो रही थी और हमारा जीवन उसी मंथर गति से चल रहा था। अब वह बड़े-बड़े सेमिनारों का हिस्सा बनने लगा था। इन सेमिनारों के फोटो वह मुझे अक्सर दिखाता और बताता, मम्मी मैं इस विषय पर बोला। कई लोगों ने मुझसे कहा था कि तुम्हारा बेटा बहुत अच्छा भाषण देता है। सुनने का मौका ही नहीं मिला और वह खामोश हो गया।
कॉलेज खत्म होने के बाद भी वह अपनी पढ़ाई में मस्त रहा। रोजगार तो उसके लिए कभी संकट था ही नहीं। अखबारों में उसके लेख छपने लगे थे। कहा करता था, मम्मी एक शब्द नहीं काटा है। वह क्या लिखता था, मेरी समझ में कभी नहीं आया। इसके बावजूद मैंने उसका हर लेख पढ़ा। उसके लेखों में किसानों, बेरोजगारों और बढ़ती महंगाई की चिंता को मैंने जरूर महसूस किया था। ऐसे युवा को क्यों गोली मार दी गई, इसका जवाब मिल पाएगा क्या कभी ? जवाब मिल भी जाए तो क्या हेम जैसे युवाओं की क्षतिपूर्ति कर सकती है पुलिस ? अकेला हेम नहीं, उससे पहले भी कई लोग हैं जिनकी माताओं के पास अपनी बात लिखने के साधन तक नहीं। मैं कहीं तो भाग्यशाली हूँ, जो अपनी बात कह पा रही हूँ। इसलिए जरूरी है कि यह सुनिश्चित किया जाए कि मेरे बाद किसी माँ को यह दर्द न मिले। वरना फिर किसी बेगुनाह को गरीबों, दलितों और पिछड़ों की बात करने पर गोली मार दी जाएगी।
| गणतंत्र के बच्चे |
| पान सिंह बोहरा
‘‘जनतंत्र में अपने ही बच्चों की हत्या की अनुमति नहीं दी जा सकती,’’ यह टिप्पणी 4 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने माओवादी नेता आजाद व हेम चन्द्र पाण्डे के तथाकथित एनकाउंटर की जाँच के लिये दायर एक याचिका पर सुनवाई के दौरान की। चेरकुटी राजकुमार (आजाद) और हेम पाण्डे की आंध्र प्रदेश स्पेशल इंटेलीजेन्स ब्रांच ने 1 अगस्त 2010 को नागपुर (महाराष्ट्र) से अपहरण कर लिया था और 1-2 अगस्त की रात्रि को उनकी क्रूरतापूर्वक हत्या कर शव आदिलाबाद के पास जंगलों में फेंक दिये थे। बाद में इन हत्याओ को मुठभेड़ के रूप में प्रचारित किया गया था। इस घटना की न्यायिक जाँच की माँग को लेकर हेम की पत्नी बबीता व स्वामी अग्निवेश द्वारा याचिका दायर की गयी थी। याचिका में सी.डी.आर.ओ. (कॉर्डिनेशन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स ऑर्गेनाइजेशन) द्वारा तैयार की गयी फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट व पोस्टमार्टम रिपोर्ट का आधार लिया गया है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट स्पष्ट रूप से संकेत करती है कि दोनों को काफी नजदीक से गोली मारी गयी। सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र व आंध्र प्रदेश सरकार को छः हफ्ते के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश देते हुए कहा कि ‘‘हम उम्मीद रखते हैं कि वे कोई संतोषजनक जवाब देंगे।’’ इन हत्याओं के विरुद्ध देश भर में तमाम संगठनों, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, लेखकों ने विरोध प्रदर्शन किये थे तथा इस हत्याकांड की जाँच कर दोषियों को सजा देने की माँग की थी। अब तक गृहमंत्री पी. चिदंबरम इस माँग को लगातार नकार रहे थे। आजाद व हेम पाण्डे की हत्या भारतीय राज्य द्वारा उसकी नीतियों के विरुद्ध उठ रहे जनाक्रोश को समाप्त करने की योजना का ही हिस्सा है, जिसके तहत एक ओर सलवा जुडूम, ग्रीन हंट के नाम पर लाखों गरीब आदिवासियों को उजाड़ दिया जाता है ताकि लुटेरे बहुराष्ट्रीय निगमों की लूट निर्बाध हो सके। दूसरी ओर शान्ति वार्तां का प्रपंच भी रचा जाता है। चेरुकुरी आजाद अपनी मृत्यु से पूर्व सी.पी.आई. (माओवादी) की ओर से केन्द्र सरकार के साथ शान्ति वार्ता के लिये प्रयासरत थे। |