स्वप्न किस तरह साकार होते हैं और इसके लिए किस तरह कारगर कोशिश की जा सकती है, यह ‘पहाड़’ की गतिविधियों को देख कर बखूबी महसूस किया जा सकता है। और, अगर ‘पहाड़’ की कार्यप्रणाली को समझने के लिए कोई समान उदाहरण देखना हो तो बिना थके लगातार जुनून के साथ काम में जुटी चींटियों की फौज को देखा जा सकता है। ‘पहाड़’ के रजत समारोह में हमने यह देखा। हमने यह भी देखा कि ‘सरग दिदी पांणि पांणि’ की तर्ज में किसी कर्ज या सरकारी अनुदान की आस लगाए बिना ‘पहाड़’ के स्वयंसेवकों की फौज हँसते-बोलते, एकजुट होकर किस तरह कितना-कुछ कर सकती है। हमने देखा ‘पहाड़’ एक भावनात्मक आंदोलन है, माँ के लिए किसी बच्चे के निश्छल भावनात्मक लगाव की तरह पहाड़ से जुड़ने और पहाड़ को समझने की एक पुरजोर कोशिश।
‘पहाड़’ ने अपने रजत जयंती वर्ष के सम्मान समारोहों की श्रृंखला में देहरादून, दिल्ली, पिथौरागढ़, अल्मोड़ा, चम्पावत और कोटद्वार के बाद ‘पहाड़ रजत समारोह-7’ का आयोजन चमोली जिले के एक दूरस्थ गाँव नागनाथ-पोखरी और जिला मुख्यालय गोपेश्वर में किया। इन दो स्थानों पर विभिन्न कार्यक्रमों के आयोजन के साथ-साथ 8 मई 2010 को प्रातः 7 से 9 बजे के बीच चमोली तथा रुद्रप्रयाग के ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित 31 राजकीय इंटर कालेजों में विभिन्न विषयों के लगभग 48 विशेषज्ञों ने विद्यार्थियों को संबोधित किया। ये व्याख्यान पर्वतीय विकास, संस्कृति, इतिहास, भूगोल, पर्यावरण, शिक्षा, वैज्ञानिक चेतना, पुरातत्व, जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक संसाधन, पर्वतारोहण व साहसिक अभियान, जैव विविधता, जल-जंगल, महिला तथा युवा सरोकार, लिंग भेद और जीवन में किताबों की भूमिका के साथ ही युवाओं की नई चुनौतियों, स्वप्न तथा उड़ान, संघर्ष और सफलता आदि विषयों पर दिए गए। यह अनोखा प्रयोग था, जिसमें 2 घंटे के भीतर दो जिलों के 15,000 से भी अधिक विद्यार्थियों को एक साथ संबोधित करके समाज और जीवन के विभिन्न पहलुओं से संबंधित संदेश दिया गया।
व्याख्यानों के तुरंत बाद विभिन्न इंटर कालेजों से विशेषज्ञ अतिथियों ने दूसरे सत्र के लिए नागनाथ-पोखरी की ओर प्रस्थान किया। यहाँ एक ऊँची रमणीक चोटी पर स्थित राजकीय इंटर कालेज, नागनाथ-पोखरी के प्रांगण में उत्तराखंड के मुख्य सूचना आयुक्त डॉ. आर. एस. टोलिया की अध्यक्षता में दोपहर 12.30 बजे पुस्तक विमोचन समारोह सम्पन्न हुआ। शेखर पाठक ने इस प्रसिद्ध नागपुर परगना क्षेत्र में जन्मे और शिक्षा प्राप्त विभूतियों- पातीराम परमार, शालिग्राम वैष्णव, नरेन्द्र सिंह भंडारी और चंद्रकुँवर बर्त्वाल की दुर्लभ पुस्तकों के पुनर्प्रकाशन की जरूरत पर प्रकाश डाला। चंद्रकुँवर बर्त्वाल शोध संस्थान, देहरादून के डॉ. योगम्बर सिंह बर्त्वाल ने 1854 से 1920 के बीच नागपुर क्षेत्र में जन्मे इन चारों नक्षत्रों को नमन करते हुए कहा कि इन्होंने अपनी मेधा, और संकल्प के बल पर ऊँचाइयों को स्पर्श किया। समारोह में कवि चंद्रकुँवर बर्त्वाल की ‘इतने फूल खिले’, नरेन्द्र सिंह भंडारी की ‘स्नोबॉल्स ऑफ गढ़वाल’, शालिग्राम वैष्णव की ‘उत्तराखंड रहस्य’ और पातीराम परमार की ‘गढ़वाल: एंशियंट एंड रीसेंट’ का विमोचन किया गया। इस समारोह में विशिष्ट अतिथियों के साथ ही बड़ी संख्या में स्थानीय जन-समूह ने भी भाग लिया।
तीसरे सत्र में सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए गए जिनमें कविता पाठ, लोकगीत गायन, थ्रीस कपूर के चुनिंदा 60 चित्रों तथा अरविंद मुद्गल की ‘रम्माण’ फिल्म का प्रदर्शन किया गया। लगभग इसी समय जिला मुख्यालय गोपेश्वर के जिला परिषद सभागार में सत्र-4 की शुरूआत हुई, जिसका संयोजन डॉ. योगेश धस्माना ने किया। इस सत्र में पत्रकार-पर्वतारोही डॉ. गोविंद पंत ‘राजू’ ने अंटार्कटिका में प्रवास के अनुभव, बी. बी. सी. के राजेश जोशी ने विश्व की दूसरी सबसे बड़ी नदी अमेज़न और वहाँ के जनजीवन व जंगलों तथा डॉ. शेखर पाठक ने तिब्बत की प्रकृति और संस्कृति का दृश्यानुभव कराया।
9 मई को पाँचवे सत्र में सुरेन्द्र सिंह पांगती, डॉ. जे.एस. मेहता, चंद्रप्रभा ऐतवाल, हर्षवंती बिष्ट तथा गोविंद पंत ‘राजू’ ने प्रातः पुलिस लाईन के मैदान में बड़ी संख्या में एकत्रित बच्चों से बातचीत की। ‘बच्चों से संवाद’ के इस विशेष कार्यक्रम में इन विशेषज्ञों ने बच्चों की जिज्ञासाओं का समाधान किया। उसके बाद 9 बजे पी. जी. कालेज सभागार में सत्र-6 के तहत ‘सीमांत के सवाल’ विषय पर संगोष्ठी हुई। वरिष्ठ प्रशासक सुरेन्द्र सिंह पांगती ने चीन के साथ व्यापार बंद होने के कारण जोहारघाटी में उजड़ गए गाँवों का दर्द बयाँ करते हुए कहा कि उनकी ग्राम पंचायत के जिस हरे-भरे जंगल से एक पत्ता भी तोड़ना मना था, वह आज बुरी तरह बर्बाद हो चुका है। बुग्यालों में सुनबुगी और बुगी घास नष्ट हो गई है। वहाँ से लोग पलायन कर गए हैं और वहाँ जैसे एक विशाल मोहन-जो-दड़ो शेष रह गया है। मैठाणी जी ने सूखती नदियों पर गहरी चिंता व्यक्त की तो डॉ. दाताराम पुरोहित ने पहाड़ की परंपरागत कलाओं के संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया। लोकगायक तथा कवि नरेन्द्र नेगी ने पहाड़ की संस्कृति के संरक्षण के लिए संस्कृति विभाग को गंभीर प्रयास करने की सलाह दी। डॉ. जे. एस. मेहता ने कहा कि चरान के लिए कभी ‘चौड़’ होते थे, जिनमें हिरन कुलाँचे भरते थे, वे आज मोनोकल्चर की भेंट चढ़ते जा रहे हैं। सरपंच श्रीमती कलादेवी ने अपनी दुधबोली गढ़वाली में कहा कि तुम लोग तो केवल बातें करते हो, हमारे महिला मंगल दल ने दिखा दिया कि जंगल कैसे लगाए जाते हैं। देवेन्द्र्र कैंथोला ने एक कथन का उद्धरण देते हुए कहा कि अगर आप समस्या का समाधान नहीं करते हो तो फिर आप स्वयं एक समस्या हो। डॉ. आर. बी. एस. रावत ने कहा कि हमें अपने प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण का संकल्प करना चाहिए। उन्होंने ‘पेमेंट फॉर इको सिस्टम’ यानी पारिस्थितिक प्रणाली के लिए भुगतान पर बल दिया। कुंवर सिंह ने बड़ी इलायची, शतावरी आदि नई फसलों की खेती से आर्थिक दशा सुधारने की बात कही और गैरसैण में सीमांत विकास प्राधिकरण बनाने का सुझाव दिया। उच्च शिक्षा निदेशक डॉ. बहादुर सिंह बिष्ट ने ज्ञान अर्जित कर चुके उत्तराखंडियों से वापस लौट कर अपना ज्ञान लोगों में बाँटने का आह्वान किया। डॉ. आर. एस. टोलिया ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि जितनी संस्थाएं ऊंचाइयों पर स्थित थीं, वे न जाने क्यों धीरे-धीरे नीचे उतरती चली र्गइं। उन्होंने कहा कि सीमांत जिलों के संसाधनों और आबादी के मानकों में संशोधन किया जाना चाहिए। संगोष्ठी के अध्यक्ष चंडी प्रसाद भट्ट ने कहा कि सीमांत केवल एक रेखा नहीं है, यह जीवन रेखा है जहाँ ऊँची पर्वतमालाएँ हैं; घाटियाँ, बुग्याल और ग्लेशियर हैं; जीवन है। उन्होंने कहा, यह देख कर आश्चर्य होता है कि बड़ी-बड़ी परियोजनाएँ पास हो जाती हैं, लेकिन जनोन्मुखी छोटी-छोटी परियोजनाएँ रह जाती हैं। उन्होंने नई प्रौद्योगिकी का लाभ उठा कर रोजगार के लिये पलायन को रोकने की बात भी कही। अंत में गोपेश्वर नगर पालिका अध्यक्ष प्रेम बल्लभ भट्ट ने धन्यवाद ज्ञापन किया। ![]()
दोपहर के भोजन के बाद एक सांस्कृतिक जुलूस निकाला गया, जिसमें स्थानीय लोगों के साथ बाहर से आए अतिथियों ने भी भाग लिया। पहाड़ रजत समारोह का सत्र-7 ‘पहाड़ रजत सम्मान समारोह’ पी.जी. कालेज सभागार, गोपेश्वर में दोपहर बाद 2.30 बजे शुरू हुआ, जिसकी अध्यक्षता चंडी प्रसाद भट्ट, सुरेन्द्र सिंह पांगती और प्रो.आदित्य नारायण पुरोहित ने तथा संचालन गोविंद पंत ‘राजू’ ने किया। अपने-अपने क्षेत्र में विशिष्ट काम करने वाले रुद्रप्रयाग और चमोली जनपदों की 10 विभूतियों को ‘टोपी’ पहना कर और शॉल ओढ़ा कर सम्मानित किया गया। ये विशिष्ट व्यक्ति थे: राधाकृष्ण वैष्णव, शिवराज सिंह रावत ‘निःसंग’, मुरारी लाल, गोकुलानन्द किमोठी, चन्द्रबल्लभ पुरोहित, जयन्ती देवी, संग्रामी देवी, लक्ष्मीदेवी जितवान, पुष्कर सिंह कंडारी तथा हरिश्चंद्र चंदोला। अस्वस्थ होने के कारण जयंती देवी तथा राधाकृष्ण वैष्णव समारोह में उपस्थित न हो सके। पहाड़ के साथियों ने उन्हें बाद में उनके घर पर जाकर सम्मानित किया। सभी उपस्थित सम्मानित व्यक्तियों ने अपने उद्गार व्यक्त करते हुए आशीर्वचन दिए।
समारोह के अंतिम सत्र, यानी सत्र-8 में पी.जी. कालेज के सभागार में सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया गया, जिसका शुभारंभ लोकगायिका बसंती देवी के गायन से हुआ। उसके बाद सम्पन्न कवि गोष्ठी में चंद्र बल्लभ पुरोहित, नरेन्द्र सिंह नेगी, उमा भट्ट, प्रभाकर किमोठी, जगदंबा चमोली, बसंती बिष्ट आदि ने काव्य पाठ किया। अन्त में गढ़वाली नाटक ‘वसुंधरा’, अरविंद मुदगिल की फिल्म ‘गमशाली का 15 अगस्त’ तथा अनूप शाह के 60 चित्रों का स्लाइड शो के साथ ‘पहाड़ रजत समारोह-7’ का यह अविस्मरणीय आयोजन सम्पन्न हुआ।
अद्भुत