नई दिल्ली। चुनाव आयोग ने 20 अक्टूबर को ‘पेड न्यूज’ की प्रवृत्ति के खिलाफ एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए राष्ट्रीय परिवर्तन दल की बिसौली (उ.प्र.) से विधायक उमलेश यादव को अयोग्य घोषित करते हुए उन्हें तीन वर्ष तक किसी भी चुनाव में भाग लेने से रोक दिया है, क्योंकि उन्होंने अपने चुनाव व्यय में उन विज्ञापनों पर किये खर्च का ब्यौरा नहीं दिया था, जो हिन्दी दैनिक अखबारों, दैनिक जागरण और अमर उजाला में खबरों के छद्म रूप में प्रकाशित हुए थे।
मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी और चुनाव आयुक्तों वी.एस. सम्पथ और एच.एस. ब्रह्मा के पूरे आयोग ने तय किया कि रिप्रसन्टेशन ऑफ दि पीपुल एक्ट, 1951 के सेक्शन 10 ए के तहत सुश्री यादव अयोग्य हैं, क्योंकि उन्होंने 21,250 रुपयों का कोई हिसाब नहीं दिया था जिस कारण उनके 20 अक्टूबर 2011 से तीन वर्षो के लिये संसद या प्रदेश विधान सभा या परिषद् का चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी गयी है।
आयोग ने उनके इस तर्क को खारिज कर दिया कि उन्होंने 17 अप्रेल 2007 को प्रकाशित 21,250 रुपये के ‘विज्ञापन या पेड न्यूज’ के लिये खर्च किया था या अधिकृत किया था। उच्चतम न्यायालय के विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए आयोग ने कहा कि अधिनियम की धारा 78 के तहत इस खर्च को उनके हिसाब में आना चाहिये था।
आयोग ने इस मामले की सुनवाई 31 मार्च 2010 में प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा उपरोक्त दो हिन्दी दैनिकों में अप्रेल 2007 के विधान सभा चुनाव में सुश्री यादव के पक्ष में ‘पेड न्यूज’ प्रकाशित होने की शिकायत की छानबीन के बाद मामला आयोग को सौंपने के बाद की थी। पीसीआई ने अपने आदेश में कहा था कि ‘समिति द्वारा रिकॉर्ड की छानबीन और जाँच समिति की रिपोर्ट देखने के बाद उसने जाँच समिति के इस तर्क को सही पाया है कि प्रतिवादी अखबार नैतिक मूल्यों के उल्लंघन के दोषी हैं। पीसीआई ने मीडिया को सावधान किया कि उसे विज्ञापन को खबरों के रूप में प्रकाशित करने से बचना चाहिये। पीसीआई ने अपने निर्णय और सम्बन्धित कागजात को उचित कार्रवाही के लिये चुनाव आयोग को भेज दिया था।
पीसीआई ने यह बात मानने से इंकार कर दिया है कि जो कुछ अखबार में प्रकाशित हुआ, वह मात्र विज्ञापन था किसी तरह की खबर नहीं थी।
चुनाव आयोग के अनुसार, पीसीआई ने पाया कि ‘‘विवादित सामग्री की बुनावट कुछ इस तरह की थी कि वह किसी सामान्य पाठक को खबर जैसी लगे। सामग्री के अन्त में छपा छोटा सा ‘विज्ञापन’ शब्द ऐसा लगता था मानो वह साथ में बाॅक्स में छपी प्रत्याशी की अपील का हिस्सा हो। इसमें कोई शक नहीं कि मतदान से एक दिन पूर्व, जब हर तरह का प्रचार बन्द हो चुका हो, यह मतदाताओं को भ्रमित करने का तरीका हो सकता है। यह न सिर्फ पत्रकारिता के मानदंडों के अंतर्गत अनैतिक हैं, बल्कि चुनाव संबंधी कानूनों का भी उल्लंघन है।’’
श्री कुरैशी ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यह चुनाव आयोग द्वारा ‘पेड न्यूज’ ताजा प्रवृत्ति, जिसने देश में निष्पक्ष और स्वतंत्र मीडिया के अस्तित्व को प्रभावित किया है, के खिलाफ पहला निर्णय है। उन्होंने उम्मीद जतायी कि यह फैसला आने वाले समय में उम्मीदवारों द्वारा ‘पेड न्यूज’ की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन देने की घटनाओं पर रोक लगायेगा।
एक अन्य वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि यह निर्णय एक अच्छी परम्परा की शुरूआत हो सकता है। आयोग ने अंतिम निर्णय तक पहुँचने से पहले समस्त सावधानियाँ बरतीं और तथ्यों का अच्छी तरह विश्लेषण किया।
एक दूसरे मामले, जिसमें चुनाव आयोग कुछ समय दे सकता है, झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और सिंघभूम के सांसद मधु कोडा, जो इसी तरह 2009 में लोक सभा चुनाव के दौरान खर्चों का ब्यौरा न देने और ‘पेड न्यूज’ को बढ़ावा देने का अभियोग झेल रहे हैं, का है। इस समय भ्रष्टाचार के मामले तिहाड़ जेल में होने के कारण कोडा ने इस मामले में अपना जवाब देने के लिये और वक्त माँगा है।
आयोग महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और भोकार से कांग्रेस विधायक अशोक के खिलाफ इसी तरह की शिकायत की सुनवाई के पहले ही 4 नवम्बर की तारीख मुकर्रर कर चुकी है। भाजपा ने शिकयत की थी कि चह्वाण ने अपने चुनाव प्रचार के लिये ‘पेड न्यूज’ को बढ़ावा दिया था और अपने चुनावी हिसाब में इस खर्चं का ब्यौरा नहीं दिया था।
एक चिन्तित नागरिक द्वारा जनहित में जारी