बाकी साल आये न आये, होली में पंडित जी की अक्सर याद आ जाती है। न जाने कैसे होंगे ? पता नहीं जिन्दा हैं भी कि नहीं। इन तीन-चार सालों में उनसे भेंट ही नहीं हो पायी। पिछली बार ही जब भेंट हुई, वे नब्बे से ऊपर थे और बीमार चल रहे थे। अगर मर भी गये होंगे तो पत्रकारों ने उधमसिंह नगर वाले पेज में खबर छाप कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर दी होगी। अखबारी खबरें जिलों की सीमा का अतिक्रमण नहीं करतीं और वह खबर इधर को आयी ही नहीं होगी। एक स्वतंत्रता सेनानी को इससे ज्यादा इज्जत और क्या बख्शी जा सकती है ? क्या वे ईशांत शर्मा या राखी सावंत हैं, जो उनके लिये पेज के पेज रंग दिये जायें ? बूढ़े और बेकार! क्या उनकी मजार बना कर सालाना मेला करना है ?
जब हम नये और फायरब्रांड पत्रकार थे तो अक्सर उनसे झड़प हो जाया करती थी। हम आन्दोलनकारी थे और वे आन्दोलनतोड़क। जंगल को लेकर या शराब को लेकर हम आन्दोलन करते तो वे उसकी तोड़ निकालते। कभी हम नगाड़े-निशान लेकर ग्रामीणों के साथ प्रदर्शन करते तो वे कुछ नेपाली मजदूरों को पैसे देकर एक समानान्तर विरोधी जलूस निकलवा देते। हम किसी अधिकारी पर दबाव बना कर कोई निर्णय करवाने की स्थिति में पहुँचते तो वे पीछे से न जाने कब उसका दिमाग घुमा देते। हम उन्हें प्रतिक्रियावादी समझते थे, जो स्वतंत्रता संग्राम की विरासत का अनुचित फायदा उठा कर एक मझोले कृषि फार्म के स्वामी बन गये थे और सत्ताधारी दल के वरिष्ठ सदस्य होने के कारण जनता को गुमराह करने और प्रशासन को दबा सकने में सक्षम थे। इसी कारण, जब कभी उनसे सामना होता तो हम अच्छे मुँह बात ही नहीं करते थे। एक बुजुर्ग होने के नाते जो उनका प्राप्य था, वह सम्मान उन्हें देने में हमने हमेशा कोताही बरती। बाद में एक धार्मिक ट्रस्ट में उनके साथ काम करने का मौका मिला तो हमने बैठकों में उनकी शतरंजी चालों का तोड़ ढूँढने की भरसक कोशिश की, लेकिन हमेशा मुँह की खाई। एक बार 42 के ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ की पचासवीं सालगिरह हो रही थी और अनेक स्वतंत्रता सेनानियों के संस्मरणों के साथ ‘विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झण्डा ऊँचा रहे हमारा’ सुनते हुए हम देशभक्ति में गोते लगा रहे थे तो अच्युत पटवर्द्धन के बारे में पंडित जी के अज्ञान से चिढ़ कर हमने उन्हें भरी सभा में फटकार लगा दी थी।
लेकिन फिर हमारी ऊर्जा भी घटने लगी। जनान्दोलनों में हिस्सेदारी कम होने लगी तो हमारे अपने ही साथी हमें ‘बौद्धिक माफिया’ कहने लगे, यानी ऐसे महानुभाव जो कुछ करते-धरते नहीं, अपने बुद्धि कौशल और शब्दों की बाजीगरी से सबको बेवकूफ बना खाते हैं। यह चिप्पी बेहद दिलचस्प है, लेकिन पीड़ा भी पहुँचाती है। क्या हम सचमुच ऐसे ही हो गये हैं ? फिर वे क्या हुए जो आन्दोलनों के दौर में बढ़-चढ़ कर क्रांतिकारिता बघारते थे, हमारी उदारता का मखौल बनाते थे और अब लालबत्तियाँ लगा कर सत्ता सुख भोग रहे हैं ?
हमारे पास ऐसे सवालों के जवाब नहीं होते और हम अनायास पंडित जी को याद करने लगते हैं। क्या उन दिनों वे भी ऐसी ही स्थितियों में रहे होंगे, जैसे में हम आज हैं ?
पता नहीं!
लेकिन हमें पंडित जी के वे गुण भी याद आते हैं, जिनके कारण हम बाद के सालों में उनके प्रशंसक हो गये और बार-बार राय-मशविरा करने के लिये उनके पास जाने लगे। पता नहीं कैसे पंडित जी को यह खामख्याली हो गई थी कि वे पूरे नगर के संरक्षक हैं। शहर में कोई गड़बड़ हो रही है तो उसे ठीक करना उन्हीं की जिम्मेदारी है। अब आजकल तो हालात यह हैं कि लोग अपने परिवार तक की जिम्मेदारी नहीं लेते। बच्चों ने मोटर साइकिल की डिमांड की तो मोटर साइकिल हाजिर, मोबाइल की डिमांड करी तो मोबाइल। अब वे तोड़ते रहें पैदल चलने वालों की टाँगें, बनाते रहें अश्लील वीडियो क्लिपिंग! हमें क्या मतलब ?
लेकिन पंडित जी अपनी तरह के खुदाई खिदमतगार थे। हमसे पंगा लेने के पीछे भी उनका ख्याल यही रहता था कि हम एक अच्छे-शान्त शहर की फिजाँ खराब कर रहे हैं और वे आपे से बाहर हो जाते थे। उनकी बुद्धि में यह नहीं आता था कि हमें आन्दोलन सामाजिक-आर्थिक विषमताओं के कारण करने पड़ते हैं और आन्दोलन होगा तो शहर को भी कुछ झेलना पड़ेगा ही। उस बार हुआ क्या कि शहर की फिजाँ वास्तव में खराब हो गई। राम शिलाओं ने गाँव-गाँव में रामनाम की धूम मचा दी थी और बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद मारुति वैन में साध्वी ऋतम्भरा के भड़कीले कैसेट लगाये, माथे पर भगवा पट्टा लपेटे शहर भर में घूमने वाले रामभक्त अपने प्रोफेसरों की ही ठुकाई करने लगे थे। दरअसल शहर भर के उचक्के, जिन्हें हनुमान चालीसा तक याद नहीं थी, रातोंरात रामभक्त बन गये थे। ऐसे आक्रामक हिन्दुत्व में जो विश्वास न करता, उसने समाजद्रोही होना ही था, भले ही वह इतिहास का प्रोफेसर ही क्यों न होता! इस बात पर भी कोई ताज्जुब नहीं था कि उस साल शहर में नमाजी टोपियाँ भारी संख्या में दिखाई देने लगी थीं। अब राम के भक्त हड़काई में उतर आयेंगे तो खुदा के बन्दों ने क्या चूड़ियाँ पहन ली हैं ? उससे पहले हमें मालूम ही नहीं पड़ता था कि कौन हिन्दू है और कौन मुसलमान।
उस साल तय किया गया कि जन्माष्टमी का डोला बहुत भव्य निकलेगा। निकलता हर साल ही था, लेकिन जब हिन्दू धर्म अपने उरूज पर हो तो डोला साधारण कैसे रह सकता था ? हर साल पीले अक्षतों से माथा पोते हुए श्रद्धालु ‘छोटी-छोटी गौएँ, छोटे-छोटे ग्वाल-बाल, छोटे-छोटे हमारे मदन गोपाल लाल’ गाते हुए मस्त होकर शहर की सड़कों-गलियों में निकल जाते थे। उस बार न जाने किसने तय किया कि बाल-गोपाल का डोला इतना साधारण नहीं हो सकता। ‘बहेड़ी ब्रास बैण्ड’ लाया जायेगा। जाहिर है कि इस सबके पीछे एक बदनीयत थी। उस तरफ से मुसलमानों ने कहा कि इस तरह से गाजेबाजे के साथ वे जन्माष्टमी का डोला मस्जिद के बगल से नहीं ले जाने देंगे। दोनों अपनी-अपनी जिद पर अड़ गये। शहर में तनाव फैल गया और प्रशासन के हाथ-पाँव फूल गये। उसे एक ही तरीका आता था, उसने बाहर से अतिरिक्त पुलिस बुला ली। पीले अक्षतों से माथा पोत कर ‘छोटी-छोटी गौएँ, छोटे-छोटे ग्वाल-बाल, छोटे-छोटे हमारे मदन गोपाल लाल’ गाने वाले श्रद्धालु घबरा कर ‘दधिकांदो’ के इस मेले से अलग हो गये और सारी व्यवस्था सर पर भगवा पट्टा लपेटने वाले कृष्णभक्तों ने ले ली।
यह खबर पंडित जी की बैठक में पहुँची तो वे आपा खो बैठे। सबसे पहले उन्होंने पुलिस कप्तान को फोन पर झाड़ लगाई और पुलिस को जन्माष्टमी के डोले से अलग रखने को कहा। फिर उन्होंने घोषणा की कि जन्माष्टमी के डोले के साथ बैंड कतई नहीं होना चाहिये और वे मेले के दिन मस्जिद में रह कर इस बात पर निगरानी रखेंगे कि कोई ऐसी-वैसी बात न हो। यह घोषणा इतनी जोर-शोर से की गई कि न मुसलमानों को यह कहने की हिम्मत हुई कि बगैर बुलाये आप मस्जिद में आने वाले कौन होते हैं और न ही भगवाधारियों की हिम्मत हुई कि कहें, आप हमें हुक्म देने वाले कौन होते हैं। शहर में एकाएक अमन लौट आये। जिन लोगों को कर्फ्यू लगने का डर था और अपने बच्चों से कह रहे थे कि मेले के दिन घर से बाहर मत निकलना, वे निश्चिन्त हो गये।
उसी दिन से हम पंडित जी के प्रशंसक हो गये। अब कहाँ हैं, ऐसे लोग ? आपके सामने कोई मनचला किसी लड़की को छेड़ दे, आप अनदेखा कर देंगे। मैं क्यों बुरा बनूँ! शहर का मुखिया समझना तो बहुत बुरी बात है। कुछ बुरा न बनने के चक्कर में समाज बुरा बनता रहता है। इस वक्त जब मुम्बई में ठाकरे कुल के कुलांगार पूरे उत्तरी भारत के खिलाफ जहर उगल रहे हैं और उस आग में पेट्रोल डालने के लिये मुलायम सिंह और अमर सिंह कमर कसे बैठे हैं; अथवा केरल से लेकर दिल्ली और देहरादून तक भगवा ब्रिगेड और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट एक दूसरे का सिर फोड़ रहे हैं, तब पंडित जी की याद ज्यादा आ रही है। जैसा कहा, अब घर में ही ऐसा कोई मुखिया नहीं है, जिसकी बात सारे लोग मानें तो पूरे देश में कौन होगा। गांधी तो दुबारा आने से रहा।

























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