स्थानीय नगर पालिका के लचर रवैये के कारण पौड़ी इन दिनों आवारा पशुओं की समस्या से जूझ रहा है। पर्यटक विहीन फिर भी पर्यटन नगरी कहे जाने वाले इस नगर में जिधर भी चले जायें वहाँ इन आवारा गोवंशीय पशुओं का बोलबाला दिखता है। कन्डोलिया, सर्किट हाउस, लक्ष्मीनारायण मन्दिर मार्ग हो या नगर का अपर बाजार, धारा रोड व एजेन्सी के अलावा जिला अस्पताल परिसर में भी इनकी भरमार है।
पशुओं के कारण वाहनों के आने-जाने में दिक्कत तो होती ही है साथ में यहां के संकरे मार्गों से वाहनों को निकलने में भारी समस्या आती है। जहाँ तहाँ गोबर के कारण पैदल चलने में समस्या का सामना करना होता है। समस्या तब बढ़ जाती है जब वर्चस्व की लड़ाई के लिये पशुपालन विभाग द्वारा छोडे़ गये सांड युद्ध करने लगते हैं। इससे कई बार बच्चे तो दूर बड़े लोग तक चोटिल हो जाते हैं। कई बार तो उनके दंगल से किनारे पार्क हुए दोपहिया वाहन तक गिर जाते हैं।
इस समस्या के लिये नगर पालिका राजेन्द्र प्रसाद टमटा के अध्यक्ष की उदासीनता को ही मुख्य कारण माना जा सकता है जो मात्र निर्माण कार्य में ही दिलचस्पी लेते हैं। आवारा पशुओं, कचरे की समस्या, नगर पाइपों के जाल की समस्या, पथ प्रकाश समस्या, प्लास्टिक कचरे की समस्या, सड़क का अतिक्रमण आदि उनको कहीं भी नजर नहीं आता है। जब वे अध्यक्ष नहीं थे और पैदल थे तो उनको भी इससे दो-चार होना पड़ता था लेकिन अध्यक्ष बनने के बाद जबसे सरकारी गाड़ी से आना-जाना हो गया उन्होंने इस ओर पूरी तरह से आंखें बन्द कर दी हैं।
अपने आपको राज्य मन्त्री हरीश रावत व नेता प्रतिपक्ष हरक सिंह रावत का दुलारा मानने वाले अध्यक्ष इन दिनों पौड़ी आरक्षित सीट से कांग्रेस उम्मीदवार बनने का सपना देख रहे हैं। जबकि उनकी दक्षता निर्माणाधीन बस अड्डे, पालिका भवन व दीनदयाल पार्क से दिखती है जिन पर न गुणवता से काम हो रहा है और न तेजी से ही। इससे इनकी लागत बहुत अधिक बढ़ गई है, फिर भी वे अपने आपको कुशल प्रत्याशी मान रहे हैं। ज्ञातव्य है कि श्रीनगर में भी इस समस्या के निवारण के लिये पालिका ने गौशाला बनाने का निर्णय लिया है लेकिन पौडी में इसके निबटारे के लिये पालिका चुप है।
अफसोस यह है कि नगर में भारी भरकम पशुपालन विभाग है लेकिन उसके द्वारा भी पशुओं की समस्या को देखते हुए कोई ऐसी योजना नहीं बनाई है जहाँ ये बेचारे पशु धूप-गर्मी में कही शरण ले सके व वहाँ उनको चारा भी मिल सके। उसे यह देखना चाहिये कि जंगल में खरपतवार न उगने के कारण घास की समस्या बेहद विकट हो चली है। इससे जंगल जाने की बजाय ये पशु बाजार में कागज, पुरानी सब्जी व कचरा खाकर अपनी जिन्दगी जी रहे हैं। इसके कारण कई पशु कूड़ेदानो के आसपास बने रहते है।
सुविधा शुल्क लेकर भी नहीं होता दाखिल-खारिज
भू दस्तावेजों के स्थानान्तरण के लिये दाखिल-खारिज एक जरूरी प्रक्रिया है। इसके लिये हस्तान्तरण होने पर दाखिल-खारिज़ फार्म को भर कर पटवारी को तहसील में जमा कराना होता है, जहाँ पर नियमानुसार उसे कम्प्यूटर में चढ़ जाना चाहिये। लेकिन पौड़ी तहसील में आने के बाद वे कागज इधर-उधर हो जाते हैं और दाखिल खारिज आर-6 में नहीं चढ़ पाता है। कई बार वह रजिस्टर में चढ़ भी जाता है, लेकिन कम्प्यूटर में नहीं चढ़ाया जाता है।
उल्लेखनीय है कि किसी व्यक्ति के मरने पर उसकी पैतृक भूमि उसके आश्रित के नाम हस्तान्तरित होने के लिये मृत व्यक्ति के नाम की भूमि को उनके आश्रितों के नाम चढाने एवं जमीन के खरीदने व बेचने के बाद उसका दाखिल खारिज करने पर ही उसकी कानूनी वैधता होती है। हालाँकि दाखिल खारिज़ कराने की जिम्मेवारी पटवारी को होती है, लेकिन वे सुविधा शुल्क लेकर भी इस काम को नहीं करते। लोगों को स्वयं तहसील जाने को कहते हैं। लेकिन तहसील में फार्म भरकर देने पर भी उस पर कार्यवाही नहीं होती। जबकि तहसील को यह सूचित करना चाहिये कि अमुक खाते का दाखिल खारिज हुआ है या नहीं, या होगा तो कब होगा। इसलिये मृतकाश्रितों से लेकर दूसरे तमाम लोगों को स्वयं ही तहसील में आना होता हैं, जहाँ उनसेे कहा जाता है कि फार्म नहीं है। इस पर ग्रामीण को फिर से पटवारी के चक्कर लगाने पड़ते हैं।
इस प्रणाली को इसलिये लागू किया गया था कि इससे जनता को सुविधा मिलेगी, उसे सुविधा शुल्क नहीं देना होगा। लेकिन यह प्रणाली भी चन्द लोगों की स्वार्थ सिद्धि का साधन बन गई है। अच्छा हो कि यहाँ जल्द से जल्द ‘सिटीजन चार्टर’ लागू किया जाये, ताकि आम जनता को यहाँ-वहाँ चक्कर काटने से निजात मिले।
माफिया पड़ा पत्रकार के पीछे
पत्रकारों के एकजुट संघर्ष के बाद आयुक्त कुमाऊँ मंडल कुणाल शर्मा ने मदकोट के पत्रकार पवन बत्रा का उत्पीड़न करने वालों के खिलाफ कार्रवाही करने के आदेश दे दिये हैं। श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के प्रान्तीय महामंत्री प्रयाग पांडेय के अनुसार आयुक्त ने पिथौरागढ़ के जिलाधिकारी से कहा है कि वे किसी वरिष्ठ मजिस्ट्रेट से इस घटना की जाँच करवायें। पिथौरागढ़ के पत्रकारों ने 24 घंटों के भीतर कोई कार्रवाही न होने पर प्रदेशव्यापी आन्दोलन छेड़ने का अल्टीमेटम दिया था।
मदकोट में प्रतिबंधित समय में खनन करने के बारे में समाचार प्रकाशित करने के कारण खनन माफिया पवन बत्रा से अत्यन्त नाराज था। इस माफिया का क्षेत्र में अत्यन्त आतंक है। दो लोगों ने उप जिलाधिकारी मुन्स्यारी कार्यालय के आगे खड़े पवन बत्रा को जबरन एक वाहन में बैठाने की कोशिश की। इस मामले में दो लोगों के खिलाफ नामजद रिपोर्ट लिखवाने पर भी प्रशासन द्वारा कोई कार्रवाही नहीं की गई। इन माफियाओं के हौसले इतने बढ़ गये हैं कि उन्होंने गुण्डे बुला कर पत्रकार व उसकी पत्नी को डराया-धमकाया। मदकोट की दो संस्थाओं ने खाप पंचायतों की तर्ज पर पत्रकार बत्रा को पाँच दिन के भीतर मदकोट छोड़ने का फरमान सुनाया। जिस प्राइवेट स्कूल में पत्रकार की पत्नी काम करती है, उसे वहाँ से निकालने तथा उसके बच्चों का वहाँ से नाम कटवाने के लिये उस स्कूल के प्रबन्धन पर दबाव बनाया गया। इस प्रकरण की पूरी जानकारी पुलिस अधीक्षक को देने पर भी आरोपियों के खिलाफ बहुत मामूली धारायें लगाई गईं तथा किसी की गिरफ्तारी नहीं की गई।