तड़ित घिल्डियाल
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त्तराखण्ड राज्य बनने के बाद से पौड़ी नगर की घोर उपेक्षा के कारण स्थानीय जनता बेहद हताश है। उल्लेखनीय है कि इसी नगर से पहली बार राज्य की लड़ाई को गति मिली थी। यह नगर राज्य आन्दोलन की उर्वर धरती थी इसलिये नगर के लोगों ने सेाचा था कि राज्य बनने के बाद इस नगर को लाभ होगा किन्तु राज्य बनने के साथ जहाँ इस नगर के नेताओं ने बहुत प्रगति की वहीं यहाँ से चुने जाने के बाद से उन्होंने इस नगर की ओर आँख भी नहीं उठाई।
राज्य बनने से पहले इस नगर की दशा अच्छी थी किन्तु राज्य बनने के बाद इस नगर का पतन होता चला गया। इसके लिये पहले इस नगर का महत्व कम किया गया। प्रभावशाली लोगों व नेताओं के पौड़ी से निकलने के कारण नगर की दुर्गत होती चली गई।
पौड़ी को महत्व मिले इसके लिये सबसे पहले 2000 में अधिवक्ता संघ ने अभियान चलाया था। उसके बाद पौड़ी बचाओ संघर्ष समिति के तहत एक लम्बा संघर्ष किया गया। लेकिन सरकार ने आश्वासनों को देकर इस आन्दोलन को समाप्त करा दिया। कांग्रेस के काल में पौडी, खिर्सू, लैसडौन सर्किट योजना बनाई गई थी। लोगों को लगता था कि यह क्षेत्र एक पर्यटन सर्किट के तौर पर विकसित होगा किन्तु कांग्रेस के जाते ही यह योजना जमीन पर आ गई। इसके तहत नगर में सौन्दर्यीकरण के नाम पर बनी घटिया रेलिंग व स्ट्रीट लाइट आज भी उ0प्र0 निर्माण निगम के कार्य की पोल खोलती है। इस पर 1 माह तक लाइट दिखी उसके बाद इसके तहत लगे 60 खम्भों पर कभी भी बल्ब नहीं जले। आज इसके खम्बे उखड़ते चले जा रहे हैं व भूमिगत बिजली की लाइन का अता-पता नहीं है।
वर्ष 2007 में भाजपा सरकार आई जो पिछली सरकार की सारी बातें भूल गई। लोगों को लगता था कि पौड़ी नगर के निवासी जनरल बी.सी. खण्डूरी ने जैसा काम सड़क परिवहन मन्त्री के तौर पर किया मुख्यमन्त्री बनने पर वे नगर के लिये कुछ न कुछ करेंगे। उन्होंने स्थानीय रामलीला मैदान में हुई अनेक जनसभाओं में अपनी कर्मस्थली पौड़ी के लिये कुछ करने की बात भी की और इस मैदान पर हर बार अपने गिल्ली डण्डा खेलने का उल्लेख करते हुए अपने गृह प्रेम का इजहार किया। उनके कार्यकाल में उनकी पौड़ी तक रज्जू मार्ग लगाने, राँसी में एक पर्यटक आवास गृह व झील बनाने की योजना धरातल पर उतरती इससे पहले उनकी गद्दी खिसक गई। नगर के लोगों को इससे दुःख तो हुआ किन्तु जब निशंक जी को कुर्सी मिली तो उनको लगा कि निशंक जी की पौड़ी कर्मस्थली रही थी इसलिये वे जरूर इस नगर के प्रति कुछ सहानुभूति रखते होंगे और कुछ मूलभूत योजनाओं को देकर कुछ ऐसा करेंगे जिससे मण्डल मुख्यालय का स्वरूप खो चुके इस नगर का महत्व बढेगा। लेकिन उनकी सरकार के डेढ साल के काल में ऐसा कुछ नहीं दिखा है। नगर में एफिलियेटिंग विश्वविद्यालय की मांग हुई थी लेकिन उस पर ध्यान नहीं दिया गया। नगर में एक राष्ट्रीय स्तर के संग्रहालय को खुलवाने की मांग हुई किन्तु उस पर कुछ न हुआ। इसी प्रकार पूर्व मुख्यमन्त्री कार्यकाल की योजनाओं को भुला दिया गया।
इस बीच में नगर की यहाँ तक दुर्गत हो गई कि यहाँ का स्थानीय जिला अस्पताल लगभग डाक्टर विहीन हो गया। राज्य बनने से पहले तक इस अस्पताल में न केवल पूरे डाक्टर होते थे बल्कि विशेषज्ञ चिकित्सक होते थे। डाक्टर विहीन होने के कारण स्थानीय लोगों को जब पेट दर्द तक के लिये श्रीनगर रैफर किया जाने लगा तो जाकर पौड़ी के लोग आज नागरिक संघर्ष समिति के तहत आन्दोलित हुए। पहले तो उनका आन्दोलन एक सूत्रीय था और अस्पताल में डाक्टरों की मांग को लेकर था किन्तु अब वह दूरगामी दृष्टिकोण रखते हुये अपना आन्दोलन चला रहा है।
इसे लेकर समिति के द्वारा मई से अगस्त के बीच 75 दिन तक जिला अस्पताल में धरना दिया गया। समिति के लोग जिसमें स्थानीय विधायक यशपाल बेनाम भी थे मुख्यमन्त्री को मिले और आश्वासन के बाद आम राय से धरना स्थगित कर दिया गया। इस के तहत दो-तीन डॉक्टरों को पौड़ी के अस्पताल से सम्बद्ध किया गया। और बाकी डॉक्टरों की समस्या के लिये आश्वासन दिया गया कि उनकी समस्या सुलझा दी जायगी। इसके बाद सचिव स्तर से 5 डॉक्टरों का इस अस्पताल के लिये स्थानान्तरण कर दिया गया जिनमें एक महिला डाक्टर ने पौड़ी में ज्वाइनिंग दी लेकिन वे भी छुट्टी लेकर दोबारा यहाँ पर नहीं आईं। बाकी डाक्टरों ने एप्रोच लगाकर अपना स्थानान्तरण देहरादून व हरिद्वार में ही रुकवा दिया। खैर किसी तरह से दो चार डॉक्टरों को इधर-उधर से अटैच कर व कुछ संविदा वाले डाक्टर यहां पर तैनात कर कामचालाऊ व्यवस्था लागू कर दी गई।
इस समस्या पर नागरिक संघर्ष समिति द्वारा व्यापक विचार किया गया और विगत 5 दिसम्बर से कलक्ट्रेट पर धरना आरम्भ कर दिया गया है। अब यह तय हुआ है कि केन्द्रीय विश्वविद्यालय का परिसर होने के नाते यदि उनका मेडिकल कॉलेज यहाँ पर खुल जाता है तो इससे नगर को एक संस्थान मिल जायेगा और डॉक्टरों की समस्या अपने आप ही दूर हो जायेगी। हालांकि इस बीच में राज्य सरकार ने इसे कोटद्वार में जमीन देने की बात की है जिसे लेकर इन दिनें पौड़ी बनाम् कोटद्वार की लड़ाई चल रही है।
गौरतलब यह कि टिहरी में ऐफिलियेटिंग विश्वविद्यालय खुलने के बाद पौड़ी व श्रीनगर परिसरों में इसे खुलवाया जा सकता है। अब चूँकि श्रीनगर में पहले से ही मेडिकल कॉलेज है इसलिये पौड़ी का दावा किया जा रहा है। विश्वविद्यालय के कर्मचारी भी पौड़ी के समर्थन में है। नगर के लोगों में इस बात पर आक्रोश है कि इस मामले में यहां के सारे ही नेतागण चुप्पी साधे हैं ओर इसे अपने राजनीतिक नफा-नुकसान के दृष्टिकोण से ले रहे हैं। उधर प्रशासन इसे तोड़ने के लिये पैंतरेबाजी में लगा है। उधर आपसी लड़ाई में उलझी नगर भाजपा के नेता अपने स्वार्थ के कारण इसमें कूदने से बचते रहे हैं।