एक तरफ, वर्षों से शोषित व उत्पीड़ित आदिवासी जनता ने माओवादियों के नेतृत्व में अपने अधिकारों को हासिल करने के लिये लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को नाकाफी समझते हुये हथियार उठा लिये हैं। दूसरी तरफ, असंतोष के कारण उपजे विद्रोह के मूल में विद्यमान ढाँचागत हिंसा, लचर न्याय व्यवस्था, विषमता व भ्रष्टाचार को खत्म करने के बजाए केंद्रीय व राज्य सरकारों ने अपने सशस्त्र बलों के जरिये विद्रोह को कुचलने की प्रक्रिया शुरू कर दी। सरकार नक्सलवाद को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिये सबसे बड़ा खतरा मान रही है और नक्सलवादी मौजूदा सरकारी तंत्र को इंसानियत के लिये सबसे बड़ा खतरा मान रहे हैं। हालाँकि, यह जगजाहिर है कि सारी लड़ाई विकास की अलग एवं परस्पर विरोधी अवधारणाओं को ले कर है। विकास किसका, कैसे और किस मूल्य पर ? इन्हीं प्रश्नों के आधार पर देश के न जाने कितने ही लोगों ने स्वयं को आपस में अतिवादी साम्यवादियों और अतिवादी पूँजीवादियों के खेमों में बाँट रखा है। यह अतिवाद और कुछ नहीं, हिंसा के रास्ते को सही मानने और मनवाने का एक तरीका है बस। ऐसे में, देश का आंतरिक कलह गृहयुद्ध का रूप ले रहा है। इस गृहयुद्ध में छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, झारखंड, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल व विदर्भ में फैला हुआ एक बहुत बड़ा आदिवासी बहुल इलाका जल रहा है। लोग एक-दूसरे के खून के प्यासे बन गये हैं।
इस विकट परिस्थिति से उद्वेलित, देश के लगभग पचास जाने-माने बुद्धिजीवी 5 मई 2010 को छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में इकट्ठा हुए। ‘आजादी बचाओ आंदोलन’ के संयोजक प्रो. बनवारी लाल शर्मा की पहल पर कुछ दिन पूर्व ही यह फैसला लिया गया था कि छत्तीसगढ़ में फैली अशांति और हिंसा के विरोध में रायपुर से दंतेवाड़ा तक ‘शांति-न्याय यात्रा’ की जायेगी, जिसका उद्देश्य हर तरह की हिंसा की निंदा करते हुए सरकार और माओवादियों, दोनों ही से, राज्य में शांति और न्याय बनाये रखने की अपील करना होगा। इस आयोजन में कई चिंतक, लेखक, पत्रकार, वैज्ञानिक, न्यायविद, समाजकर्मी शामिल थे, जिनमें गुजरात विद्यापीठ के कुलाधिपति नारायण देसाई, विश्वविख्यात वैज्ञानिक व यू.जी.सी. के पूर्व अध्यक्ष प्रो. यशपाल, वर्ल्ड फोरम ऑफ फिशर पीपुल्स के सलाहकार थामस कोचरी, बंधुआ मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष स्वामी अग्निवेश, सर्व सेवा संघ के पूर्वाध्यक्ष अमरनाथ भाई, गांधी शांति प्रतिष्ठान की अध्यक्ष राधा बहन, रायपुर के पूर्व सांसद केयूर भूषण, लाडनू जैन विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति व पूर्व सांसद प्रो. रामजी सिंह, आईआई.ए.म. अहमदाबाद के प्रो. नवद्वीप माथुर, ‘नैनीताल समाचार’ के संपादक राजीव लोचन साह आदि प्रमुख थे।
यात्रा शुरू करने से पहले इन लोगों ने रायपुर के नगर भवन में इस यात्रा के उद्देश्य, देश में शांति की अपनी राष्ट्रव्यापी आकांक्षा व विकास की वर्तमान अवधारण को बदलने के प्रस्ताव को रायपुर की शांतिप्रिय जनता के सामने व्यक्त करने के लिये एक जनसभा का आयोजन किया। जनसभा के दौरान कुछ उपद्रवी तत्व सभा स्थल में ऊलजलूल नारे लगाते पहुँचे और कार्यक्रम में व्यवधान डालना चाहा। प्रदर्शनकारियों ने इन लब्धप्रतिष्ठित हिंसा-विरोधी वक्ताओं को नक्सलियों का समर्थक बताते हुये छत्तीसगढ़ से वापस जाने को कहा। उन्हें विशेष रूप से ‘ऑपरेशन ग्रीन हंट’ के विरोध पर आपत्ति थी। उनका कहना था कि नक्सली विकास नहीं होने देते और पूरे राज्य में हिंसक माहौल बनाये हुए हैं। अतः इन्हें चुन-चुन के मार गिराना चाहिए। प्रदर्शनकारी ऐसे में किसी तरह की शांति पहल को नक्सलवादियों का मौन समर्थन समझ रहे थे। हालाँकि, यह बात काबिल-ए-गौर है कि इस प्रदर्शन में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के साथ व्यापारिक समुदाय के मुट्ठी भर लोग थे। इनके साथ मूल छत्तीसगढ़ी जनता नहीं दिखी। इस खींचातानी के माहौल के बाद भी सभा विधिवत चलती रही और सुनने वाले अपने स्थान पर टिके रहे।
तमाम तरह की धमकियों की परवाह किये बगैर यात्री अगली सुबह महात्मा गांधी की प्रतिमा के आगे संक्षिप्त प्रार्थना करने के बाद आगे बढ़े। तीसरे पहर जगदलपुर में काफिला रुका, जहाँ भोजनोपरांत एक प्रेस वार्ता का आयोजन किया गया था। शांति यात्री ज्यों ही पत्रकारों से मुखातिब हुए, दो-तीन दर्जन नौजवानों ने विरोध में नारेबाजी शुरू कर दी। इस उग्र भीड़ ने वही सारे तर्क-कुतर्क किये जो रायपुर में प्रदर्शनकारियों ने किये थे। फर्क इतना था कि ये कहीं ज्यादा आक्रामक थे और इन के सर पर खून सवार था। इन्होंने यात्रियों की बस के टायरों की हवा निकाल कर ड्राइवर को धमका कर भगा दिया।
इस हो-हल्ले के बीच पत्रकार वार्ता चलती रही। प्रो. बनवारी लाल शर्मा ने कहा कि यह अशांति सिर्फ छत्तीसगढ़ की ही नहीं, बल्कि पूरे देश की समस्या है। सरकार को चाहिए कि वह जनहित को ध्यान में रखते हुए भारतीय प्रकृति व जरूरतों के हिसाब से विकास की नीतियों का निर्माण करे। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि हिंसा से सत्ता बदली जा सकती है, व्यवस्था नहीं। अतएव नक्सलवादियों द्वारा की जाने वाली प्रतिहिंसा को भी स्वीकार नहीं किया जा सकता। नारायण भाई ने कहा कि शांति का मतलब यह नहीं होता कि आप किसी से न डरें, बल्कि जरूरी यह भी है कि आपसे भी कोई नहीं डरे। हम शांति का आह्वान इसलिये कर रहे हैं, क्योंकि हम निष्पक्ष, अभय और निर्वैर हैं। थॉमस कोचरी ने हिंसा के तीनों ही प्रकारों- ढाँचागत, प्रतिक्रियावादी व राज्य प्रायोजित- की भर्त्सना की।
प्रेस क्लब के बाहर प्रदर्शनकारियों को देशद्रोह लग रही थीं। उनके नारे भी उसी अनुपात में उग्र और अश्लील होते गये। प्रेस वार्ता के बाद की जाने वाली आमसभा रद्द कर दी गई। अन्ततः इन प्रबुद्ध यात्रियों के प्रस्ताव पर पुलिस अधीक्षक सुंदरराजन के समझाने-बुझाने पर प्रदर्शनकारियों और यात्रियों के बीच लंबी बातचीत हुयी। यात्रियों के तर्कों से कन्विंस दिखाई देने के बाद भी, भाजपा-कांग्रेस के इन अराजक नौजवानों का रवैया बाद में फिर से आक्रामक हो गया और उन्होंने शांति यात्रियों को दंतेवाड़ा न जाने की धमकी दे डाली।
7 मई को यह काफिला दंतेवाड़ा को रुख्सत हुआ। जगदलपुर के एस.पी. ने शांति यात्रियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी लेते हुए पुलिस की एक गाड़ी यात्रियों के वाहन के साथ लगा दी थी। बावजूद इसके रास्ते में अराजक तत्वों ने दहशत का माहौल बनाने का भरसक प्रयास किया। वाहन चालक को धमकी दी कि अगर वह एक इंच भी गाड़ी दंतेवाड़ा की ओर बढ़ायेगा तो बस को फूँक दिया जायेगा। तभी दंतेवाड़ा डी.एस.पी. ने आकर सुरक्षा की कमान संभाल ली और यात्रियों से अपना कार्यक्रम जारी रखने का आग्रह किया। इसके बाद काफिला दंतेवाड़ा के शंखनी और डंकनी नदियों के बीच में स्थित माँ दंतेश्वरी के मंदिर में जाकर ठहरा, जहाँ नारायण भाई की अगुआई में छत्तीसगढ़ में शांति एवं न्याय के स्थापना के लिए एक प्रार्थना की गई। फिर एक पत्रकार गोष्ठी व जनसभा का संयुक्त आयोजन किया गया, जहाँ स्थानीय व्यापारियों ने नक्सलवाद के कारण अपनी परेशानियों से शांतियात्रियों को परिचित करवाया। तत्पश्चात् इन लोगों ने आस्था आश्रम में भी शिरकत की, जो कि नक्सलवाद से अनाथ हुए बच्चों का राज्य संचालित विद्यालय है। आश्रम के बाद शांति यात्री सी.आर.पी.एफ. के शहीद जवानों को श्रद्धांजलि देने उनके कैंप में गये। दंतेवाड़ा में शांतियात्रियों का आखिरी पड़ाव चितालंका में विस्थापित आदिवासियों का शिविर था। पुलिस के अनुसार इस शिविर में बारह गाँवों के 106 विस्थापित परिवार गुजर बसर कर रहे हैं। पुलिस की उपस्थिति में इन आदिवासियों ने नक्सलवादी हिंसा के कारण उन पर हुए अत्याचार का दुखड़ा रोया। गौर करने लायक बात है कि इस शिविर में ज्यादातर पुरुषों को नगर पुलिस व सलवा जुडूम के विशेष पुलिस अधिकारी (एस.पी.ओ.) की नौकरी मिल गयी है, तो कुछ सरकारी कार्यालयों में चतुर्थ श्रेणी के रूप में काम कर रहे हैं। औरतों के लिये संपन्न लोगों के घरों में काम करने का विकल्प खुला हुआ है।
अपने दंतेवाड़ा तक की यात्रा में शांति यात्रियों का हिंसा-प्रतिहिंसा के दूसरे पक्ष नक्सलवदियों से कोई संपर्क नहीं हो सका। हुल्लड़बाज राजनीतिक कार्यकर्ताओं व व्यापारिक समुदाय के छिटपुट नुमाइंदों के अलावा आदिवासी मूल के किसी छत्तीसगढ़ी प्रतिनिधि से बातचीत करने में शांतियात्री कामयाब नहीं रहे। फिर भी, इस शांति व न्याय यात्रा को एक पहल के रूप में याद रखा जायेगा।

























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